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अब कुपोषण से बचाने के होंगे समुचित उपाय

केंद्र सरकार ने बच्चों और माताओं में कुपोषण की व्यापक समस्या से निपटने के लिए अगले तीन साल के दौरान 9046.17 करोड़ रुपए के आवंटन से राष्ट्रीय पोषण मिशन का गठन करने की घोषणा की है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में हुई केंद्रीय मंत्रिमंडल की बैठक में इस आशय के प्रस्ताव को मंजूरी दी गयी। केंद्रीय वित्त मंत्री अरुण जेटली ने बताया कि सरकारी कार्यक्रमों की पांच स्तरीय निगरानी सूचना प्रौद्योगिकी के जरिए की जाएगी और आंगनवाड़ी और आशा कार्यकर्ताओं को मोबाइल फोन दिए जाएगें। अभी तक आंगनवाड़ी और आशा कार्यकर्ताओं को 50 हजार फोन दिए गए है। जिसके जरिए वे प्रत्येक बच्चे के स्वास्थ्य के बारे में रिकाई रखेंगे।
उन्होंने बताया कि अभी कुपोषण से निपटने की कुछ योजनाएं और कार्यक्रम कुछ राज्यों के 162 जिलों में चल रही है तथा वर्ष 2018-19 में इसे बढ़ाकर 235 जिलों में किया जाएगा। वर्ष 2020 में इसे 315 जिलों तक पहुंचा दिया जाएगा। उन्होंने बताया कि इस योजना को आधार से जोड़ा जाएगा और एक फोन नम्बर भी होगा जिसके जरिए कोई व्यक्ति कुपोषण से सम्बंधित शिकायतें दर्ज करा सकेगा। केंद्रीय मंत्री ने बताया कि कुल 3 वर्ष के लिए केंद्र सरकार 7400 करोड़ प्रदान करेगी जबकि राज्य सरकारों को 1700 करोड़ रुपए खर्च करने होंगे।
महिला एवं बाल विकास मंत्री मेनका गांधी ने कहा कि इस मिशन से यह पता चलेगा कि आंगनवाडी कार्यकर्ताएं बच्चों को जो भोजन दे रही है, वह उन्हें कितना मिला और वह कितना पोषक था। इस मिशन का उद्देश्य एकीकृत बाल योजनाओं को मजबूत किया जाएगा। इस मिशन का मकसद कुपोषण के स्तर को दो प्रतिशत तक लाना है। उन्होने बताया कि मिशन का उद्देश्य आपूर्ति व्यवस्था को ठीक करना, और केंद्र, राज्य, जिला, खंड और गांव स्तर पर निगरानी करना है। उन्होंने बताया कि इस मिशन के जरिए लाभ लेने वाले फर्जी नामों को हटाया जा सकेगा जो बच्चों पर फायदा उठा रहे थे। असम में 3 लाख ऐसे मामले सामने आए हैं जिससे 30 लाख रुपए प्रतिदिन का नुकसान हो रहा था। योजनाओं को आधार से जोडऩे से यह जालसाजी सामने आयी है। केंद्रीय महिला एवं बाल विकास मंत्रालय के सचिव राकेश श्रीवास्तव के अनुसार अब सरकार छह माह के बच्चों को भी आधार से जोडऩे जा रही है।
स्वास्थ्य मंत्री जगत प्रकाश नड्डा ने कहा कि कुपोषण और संक्रमण का गहरा संबंध है। इसके कारण जो कुपोषित है वहीं संक्रमण का शिकार होता है। इसलिए कुपोषण को दूर करने के लिए सरकार ने यह कदम उठाया है। उन्होंने कहा कि स्वास्थ्य मंत्रालय और महिला एवं बाल विकास मंत्रालय के बीच समन्वय होगा जिससे बेहतर परिणाम सामने आ सके। उन्होंने कहा कि नीति आयोग, पेयजल और स्वच्छता मंत्रालय भी इसमें सहयोग करेंगे। इस मिशन से 12 करोड 90 लाख माताएं और एक करोड़ 10 लाख बच्चों को लाभ मिलेगा।
जिस समाज में हर साल तीन लाख बच्चे एक दिन भी जिंदा नहीं रह पाते और करीब सवा लाख माताएं हर साल प्रसव के दौरान मर जाती हैं, उस समाज की दशा का अंदाजा लगाया जा सकता है। जब देश में आधुनिक चिकित्सा सुविधाओं की कोई कमी नहीं है, तब ऐसा होना शर्मनाक ही नहीं एक घृणित अपराध है। कुपोषण के मामले में भारत दक्षिण एशिया का अग्रणी देश बन गया है। भारत की बढ़ती जनसंख्या में बच्चे कुपोषण के कारण मर जाते हैं। यहां के कुछ क्षेत्र ऐसे हैं जहां कुपोषण एक तरह से जीवन का हिस्सा बन गया है। इस क्षेत्र के बच्चे या अन्य क्षेत्रों के कुपाषित बच्चे अगर बच भी जाते हैं, तो उपयुक्त पोषण न मिल पाने के कारण उनके शरीर और दिमाग को काफी हानि पहुंच चुकी होती है। 5 वर्ष से कम उम्र के लगभग 4 करोड़ 40 लाख बच्चों का विकास कुपोषण के कारण अवरूद्ध हो जाता है। वे पढ़ाई नहीं कर पाते और जल्दी ही जीविकोपार्जन में लग जाते हैं।
भारत सरकार की एजेंसी राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वे के ताजा आंकड़ों के अनुसार देश में कुल 93.4 लाख बच्चे गंभीर रूप से कुपोषण के शिकार हैं। देशभर के 25 राज्य और केंद्र शासित प्रदेशों में कुल मिलाकर 966 पोषण पुनर्वास केंद्र हैं। राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के तहत पोषण पुनर्वास केंद्र की स्थापना सार्वजनिक स्वास्थ्य सुविधाओं में की गई है, ताकि गंभीर रूप से कुपोषण से ग्रस्त और चिकित्सीय जटिलताओं वाले बच्चों के इलाज के लिए उन्हें भर्ती कराया जा सके।
हाल ही में जारी ‘‘द ग्लोबल न्यूट्रीशन रिपोर्ट 2017’ में 140 देशों की खाद्य पोषण की स्थिति का अध्ययन किया गया है। रिपोर्ट में बताया गया है कि भारत में मां बनने योग्य 50 प्रतिशत महिलाएं स्वयं अल्प पोषित हैं और खून की कमी से ग्रस्त हैं। बच्चों को कुपोषण की समस्या तब से प्रभावित करना शुरू करती है, जब वे मां के गर्भ में होते हैं। मां के कमजोर और एनिमिक होने के कारण गर्भस्थ शिशु को पर्याप्त खुराक नहीं मिल पाती। इससे उसके अंगों का विकास बाधित होता है और वह कमजोर, अल्पविकसित या कम वजन वाले शिशु के रूप में पैदा होता है। वह समय से पहले पैदा हो सकता है। ऐसे बच्चे बहुत जल्दी बीमारियों के शिकार बन जाते हैं या उनका मुकाबला नहीं कर पाते।
एक रिपोर्ट के अनुसार राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वे के 2015-16 आकड़ों में कहा गया है कि बिहार में छह से 23 महीने के 10 में से 9 बच्चों को पर्याप्त मात्रा में पोषण नहीं मिल पाता है। केन्द्रीय स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय की देख-रेख में हुए सर्वे में पता चला है कि बिहार में सिर्फ 7.5 प्रतिशत बच्चों को ही पर्याप्त आहार और पोषण मिल पाता है। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वे के आंकड़ों पर आधारित गैर सरकारी संगठन चाइल्ड राइट एंड यू क्राय के अध्ययन में पता चला है कि उत्तर प्रदेश में भी 10 में से 9 बच्चों को पर्याप्त आहार और पोषण नहीं मिलता। राज्य में महज 5.3 प्रतिशत बच्चों को ही पर्याप्त आहार और पोषण मिल पाता है। यह आंकड़ा पूरे देश में सबसे कम है। अध्ययन में यह बात भी सामने आई है कि उत्तर प्रदेश में जन्म के पहले घंटे में चार में से तीन बच्चों को मां का दूध नहीं मिल पाता। राज्य में जन्म लेने वाले छह से 59 महीनों के दो तिहाई बच्चे एनीमिया के शिकार होते हैं।
यूनिसेफ की रिपोर्ट के अनुसार भारत में कुपोषण के कारण पांच साल से कम उम्र के करीब दस लाख बच्चों की हर साल मौत हो जाती है। सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि कुपोषण को चिकित्सीय आपातकाल करार दिया जाए क्योंकि ये आंकड़े अति कुपोषण के लिए आपातकालीन सीमा से ऊपर हैं। रिपोर्ट में कहा गया है कि कुपोषण के शिकार बच्चों की संख्या भारत में दक्षिण एशिया के देशों से बहुत ज्यादा है। भारत में अनुसूचित जनजाति 28 फीसदी, अनुसूचित जाति 21 फीसदी, अन्य पिछड़ा वर्ग 20 फीसदी और ग्रामीण समुदायों 21 फीसदी में कुपोषण के सर्वाधिक मामले पाए जाते हैं।
राजस्थान के बारां और मध्यप्रदेश के बुरहानपुर में एक नए अध्ययन से पता चला है कि देश के गरीब इलाकों में बच्चे ऐसी मौतों का शिकार होते हैं, जिन्हें रोका जा सकता है। यह रिपोर्ट कुपोषण की स्थिति पर रोशनी डालती है। इसमें उन स्थितियों का विश्लेषण किया गया है, जिन्हें रोका जा सकता है, पर इसके कारण भारत में नवजात शिशुओं और बच्चों की मौत होती है। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वे की तीसरी रिपोर्ट के अनुसार चालीस प्रतिशत बच्चे ग्रोथ की समस्या के शिकार हैं, साठ फीसद बच्चों का वजन कम है। इस समस्या के समाधान के लिए युद्ध स्तर पर रणनीति बनाना जरूरी है।
सेव दि चिल्ड्रन द्वारा एडिंग न्यू-बॉर्न डेथ्स शीर्षक से जारी रिपोर्ट के अनुसार दुनिया भर में हर साल दस लाख से अधिक बच्चे एक दिन से ज्यादा जीवित नहीं रह पाते। रिपोर्ट ने प्रशिक्षित स्वास्थ्यकर्मियों और जन्म से जुड़ी जटिलताओं को इन मौतों की सर्वाधिक प्रमुख वजह माना है। जन्म के समय उचित देखभाल और प्रशिक्षित स्वास्थ्य कार्मिकाओं की जरूरत तमाम स्वास्थ्य और सामाजिक कार्यकर्ता रेखांकित करते रहे हैं। इस बात को रिपोर्ट में भी स्वीकार किया गया है कि अगर जन्म के समय प्रशिक्षित स्वास्थ्य कर्मी मौजूद हों, तो लगभग आधी मौतों को टाला जा सकता है। स्वास्थ्य सेवाओं के जानकार मानते हैं कि अधिकतर गरीब देशों में, जहां ये सुविधाएं उपलब्ध नहीं हो पातीं, शिशुओं के लंबे समय तक जीवित रहने की संभावना भी बहुत कम होती है। भारत की स्थिति भी इस मामले में बहुत अच्छी नहीं है। यूनिसेफ की नई रिपोर्ट बताती है कि बच्चों के स्वास्थ्य के मामले में अभी बहुत कुछ किया जाना है।
संयुक्त राष्ट्र बाल कोष के अनुसार भारत में प्रतिदिन 3000 बच्चे कुपोषण के कारण मौत का शिकार हो जाते हैं। भारत को विश्व की तेज गति से बढ़ती अर्थव्यवस्था वाले देशों में गिना जा रहा है, किन्तु दूसरी ओर यह विश्व में सबसे ज्यादा कुपोषण से ग्रस्त देश भी है। कुपोषण पर विजय प्राप्त करके किसी देश के सकल घरेलू उत्पाद को 2-3 प्रतिशत बढ़ाया जा सकता है। भारत में कुपोषण को दूर करने के लिए अनेक प्रयास किए जा रहे हैं। स्वच्छ भारत मिशन की सफलता ने भी कुपोषण की राह में एक कदम आगे बढ़ाया है। कुपोषण दूर करने के लिए माताओं में जागरूकता लाने की आवश्यकता है। शिशु के जन्म के तुरन्त बाद से छ: मास तक मां का दूध और उसके बाद मां के दूध के साथ ही पौष्टिक और सुरक्षित भोजन देना जरूरी है। उम्मीद है कि कुपोषण की शर्मनाक स्थिति से भारत जल्दी ही छुटकारा पा सकेगा। देश में स्वास्थ्य सेवाओं को दूरस्थ गांव-देहात तक पहुंचाना होगा और देश के हर नागरिक को समय पर पर्याप्त चिकित्सा सुविधा मिलना सुनिश्चित करना होगा। तभी भारत में नवजात शिशुओं की मौत पर रोक लगाई जा सकती है।

रमेश सर्राफ धमोरा
स्वतंत्र पत्रकार

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