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आधुनिकता की चकाचौंध में स्वार्थी व आत्मकेन्दित होता इन्सान ?

आधुनिकता की चकाचैंध मे आदमी इतना व्यस्त हो गया है कि उसे दूसरों के बारे मे सोचने का समय ही नहीं है,कि कौन मर रहा है और कौन जी रहा है। एक समय था कि आदमी ही आदमी के काम आता था मगर आज ऐसी हवा चल पडी़ है कि कोई किसी का नहीं है। हर इन्सान मौकापरस्त हो गया है काम निकल जाने पर पहचानने से इन्कार करता है। आज अच्छा करने वाले कम तो बुरा करने वाले अधिक है।जरुरतमंद इन्सान की सहायता करना सबसे बड़ा धर्म है मगर आज लोगों के पास अनैतिक व अवैध कार्याें के लिए समय है मगर एक मजबूर व लाचार की सहायता के लिए समय नहीं है।कुछ दोहरे चरित्र के लोग जो समाजसेवक का चोला ओढ़ते है और समाज के हितैषी बनने का ढौग रचते है अपने काम कि लिए तो साम,दाम दंड,भेद की नीतियां अपनाते है मगर दूसरों के कामों के लिए समय नहीं है। रिश्वत व अवैध कार्य करके अपने बच्चों काम करवा रहे है जबकि एक प्रतिभावान पिछड रहा है।आज इन्सान स्वार्थी व आत्मकेन्द्रित होता जा रहा है वह अपने घर तक ही सीमित होकर रह गया है।कहते है कि किसी का अच्छा करने के लिए बड़ा दिल होना चाहिए।आज कोई किसी को अच्छी सलाह तक देने से गुरेज करता है। आज का इन्सान खुदगर्ज बनता जा रहा है,आज एक गरीब व प्रतिभासम्पन्न आदमी की कोई कद्र नहीं है।आज के आधुनिक इंसानों में संवेदनाएं मरती जा रही है और संवेदनहीनताएं बढ़ती जा रही है। इंसान माया के जाल में इतना उलझा हुआ है कि उसके आगे इंसान को बौना समझता है।इस माया के तराजू पर रिशते तोले जा रहे है।माया के लिए न तो समाज की परवाह है और नही भगवान का डर है।आज माया के कारण रिश्ते टूटते जा रहे है। मगर कहते है कि रिश्ते अगर एक बार टूट जाए और बाद में मिल भी जाए तो दरारें कभी नहीं भरती।माया के कारण इंसान अंधा होता जा रहा है और अपना विवेक खो चुका है। माया इकठठी करने के चक्कर में आज आदमी इतना व्यस्त है कि रोटी खाने के लिए समय नहीं है। यह घटिया किस्म के माया के भूखे लोग एक दिन भूखे ही मर जाएगें। पैसे से बड़ा चरित्र होता है मगर माया के अन्धे लोगों को इससे कोई सरोकार नहीं होता। विडवंना देखिए कि आज मानव माया को ही सब कुछ मान बैठा है।कुछ तथाकथित अमीर आज मजदूरों की कमाई से महल बना रहे है मगर जिस दिन यह मजदूरों का पसीना अपना रंग दिखाएगा महल धराशायी हो जाएगें। मजदूरों को उनकी मेहनत का पुरा पैसा नहीं मिलता है धन्नासेठ बने लोग मजदूरों की गाढ़ी कमाई से ऐश कर रहे है मगर कहते है जो मजदूरों का हक मारता है ईश्वर उसे जरुर सजा देता है।मजदूरों की पसीने की कमाई से अपने बच्चों को हाई-फाई स्कूलों पढ़ा रहे है और मजदूरों के बच्चे तरस रहे है।आज ऐसे लोग जो कभी रोटियों को तरसते थे आज यही तथाकथित व माया के कारण अन्धे हुए अमीर लोग ऐसे इतराते है जैसे कुबेर के खानदानी हैं। आज मानव इंटरनैट की दुनिया में मस्त है।चैबीस घंटों मोबाइल से खेल रहाहै।संवेदनहीनता की हदें पार होती जा रही है कुछ तथाकथित लोग लक्षमण रेखा लांघ रहे हैं शमशान घाट पर भी फेसबुक पर व्यस्त रहते है पिछले दिनों एक नौजवान की असमसयिक मौत हो गई।रात का समय था श्मशान घाट में शवयात्रा में शामिल हुए वहां पर कुछ युवक तीन-चार घ्ंाटे मोबाईल पर मस्त रहे उनमें जरा भी संवेदना नहीं थी कि एक नौजवान की मौत हुई हंै । कुछ दिन पहले बीमारी से एक महिला की मौत हो गई अभी उसकी मौत का दो दिन नही बीते थे की तीसरे दिन महिला के पड़ोस में एक शादी हो गई। शादी वालों ने जोर-जोर से डीजे लगाया उनमें जरा भी सवेदना नहीं कि घर के सामने किसी की मौत हुई है और वह नाच गाने में मस्त है।खुशी में मस्त लोगों को सोचना चाहिए कि अगर कल को उनके घर में ऐसा मातम छा जाए और पडोसी ऐसा करे तो उनके दिल पर क्या गुजरेगी।ऐसा नहीं करना चाहिए समय-समय पर समाज में ऐसे उदाहरण मिलते रहतें है।आज लोग अन्न की बरबादी कर रहे हैं।आज पता नहीं कितने ही लोग भूखे मर रहे है।अन्न की बरबादी से तो अच्छा है कि किसी भूखे को दे दिया जाए।आज शहरों से लेकर गांव की नालियों में जूठन बहती है।आज लोग चंद स्वार्थों के लिए असभ्य व गंदे लोगों का साथ देते है।आदमी पैसे के पीछे ऐसे भाग रहा है कि बच्चों के लिए समय नहीं है छोटे-छोटे नवजात बच्चों को आया के पास छोड़ देते है और खुद पैसा कमाने चले जाते है बच्चों को क्रेचों में भेज दिया जाता है।पैसा कमाने के चक्कर में बच्चों की परवाह नहीं है।आज बच्चों को मां-बाप का प्यार नहीं मिल रहा है।माया के कारण आज आदमी इतना मस्त है कि बीमार बाप को दवाई लाने व अस्पताल ले जाने का समय नहीं है अरे जिन माता- पिता ने संसार दिखाया आज उन्ही के लिए समय नहीं है ऐसे औलादें इन्सान नहीं राक्षस हैं। आज बुजुर्ग दाने- दाने का मोहताज है ।कलयुगी श्रवणों का बोलबाला है।आज संतानें मां-बाप को वृद्ध आश्रमांें में भेज रही हैं ।शायद यह बुजुर्गों का दुर्भागय है कि जिन बच्चेंा की खातिर भूखे प्यासे रहे ,पेट काटकर जिन्हे सफलता दिलवाई आज वही संतानें घातक सिद्व हो रही हैं ।मां-बाप दस बच्चों को पाल सकते हैं ,लेकिन दस बच्चे मां-बाप का बंटवारा कर रहे हैं ।साल भर उन्हें महिनों में बांटा जाता है ।वर्तमान परिवेश में ऐसे हालात देखने को मिल रहे है।बेशक ईश्वर ने संसार में करोडों जीव जन्तु बनाए ,लेकिन इनसान सबसे अहम कृति बनाई ।लेकिन ईश्वर की यह कृति पथभ्रष्ट हो रही है ।आज सड़को पर आदमी तड़फ-तड़फ कर मर रहा है । इनसान पशु से भी बदतर होता जा रहा है ।क्योकि यदि पशु को एक जगह खूंटे से बांध दिया जाए,तो वह अपने आप को उसी अवस्था में ढाल लेता है ।जबकि मानव परिस्थिितियों के मुताबिक गिरगिट की तरह रंग बदलता है।आज पैसे का बोलबाला है ।ईमानदारी कराह रही है ।अच्छाई बिलख रही है ,भाईचारा ,सहयोग,मदद एक अंधेरे कमरे में सिमट गये हैं ।आत्मा सिसक रही है ।वर्तमान में अच्छे व संस्कारवान मनुष्य की कोई गिनती नहीं है ।चोर उच्चकों ,गुंडे ,मवालिओं का आदर सत्कार किया जाता है ।आज हंस भीड में खोते जा रहे हैं,कौओं को मंच मिल रहा है । हजारों कंस पैदा हो रहे हैं एक कृष्ण कुछ नहीं कर सकता ।आज कतरे भी खुद को दरिया समझने लगे है लेकिन समुद्र का अपना आस्तित्व है ।मानव आज दानव बनता जा रहा है ।संवेदनाएं दम तोड रही हैं ।मानव आज लापरवाही से जंगलों में आग लगा रहा है उस आग में हजारों जीव-जन्तु जलकर राख हो रहे हैं ।जंगली जानवर शहरों की ओर भाग रहे हैं ,जबकि सदियां गवाह है कि शहरों व आबादी वाले इलाकों में कभी नहीं आते थे ,मगर जब मानव ने जानवरों का भोजन खत्म कर दिया ।जीव-जन्तओं को काट खाया तो जंगली जानवर भूख मिटाने के लिए आबादी का ही रूख करेंगें ।नरभक्षी बनेगें ।आज संवेदनशीलता खत्म होती जा रही है ।आज मानव मशीन बन गया है निजी स्वार्थो के आगे अंधा हो चुका है।अपने ऐशो आराम में मस्त है।दुनिया से कोई लेना देना नहीं है ।संस्कारों का जनाजा निकाला जा रहा है । मर्यादाएं भंग हो रही हैं ।मानव सेवा परम धर्म है ।आज लोग भूखे प्यासे मर रहे हैं । दो जून की रोटी के लिए तरस रहे हैं ।भूखमरी इतनी है कि शहरों में आदमी व कुते लोगों की फैंकी हुई जूठन तक एक साथ खाते हैं।आज मानव भगवान को न मानकर मानव निर्मित तथाकथित भगवानों को मान रहा है ।आज मानव इतना गिर चुका है कि रिश्ते नाते भूल चुका है ।रिश्तों में संक्रमण बढता जा रहा है ।मानव धरती के लिए खून कर रहा है ।कई पीढियां गुजर गई मगर आज तक न तो धरती किसी के साथ गई न जाएगी ।फिर यह नफरत व दंगा फसाद क्यों हो रहा है ।मानव ,मानव से भेदभाव कर रहा है ।उंच-नीच का तांडव हो रहा है ।खून का रंग एक है फिर भी यह भेदभाव क्यों ।यह बहुत गहरी खाई है इसे पाटना सबसे बडा धर्म है ।आज लोग बिलासिता पर हजारों -लाखों रूपये पानी की तरह बहा देते हैं ,मगर किसी भूखे को एक रोटी नहीं खिला सकते ।शराब पर पैसा उडा रहे हैं ।अनैतिक कार्यो से पैसा कमा रहे हैं ।पैसा पीर हो गया है ।मुंशी प्रेमचन्द ने कहा था कि जहां 100 में से 80 लोग भूखे मरते हों वहां शराब पीना गरीबों के खून पीने के बराबर है ।भूखे को यदि रोटी दे दी जाए तो भूखे की आत्मा की तृप्ति देखकर जो आनन्द प्राप्त होगा वह सच्चा सुख है ।मानव को मानव की सहायता करनी चाहिए ।मानवता की सेवा सबसे बड़ा पुण्य है।

नरेन्द्र भारती,  पत्रकार 09459047744

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