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आखिर विवादित विषयों पर फिल्म बनाने की जरुरत ही क्या ?

हमारे देश में फिल्में मनोरंजन का एक बहुत बड़ा जरिया है। फिल्मों को सामाज का आईना भी कहा जाता हैं, क्योंकि वह सामाज में हो रही घटनाओं को प्रदर्शित करके संदेश देने का काम करती है। समाज फिल्मों से सीख भी लेता है और उसकी नकल उतारने की भी कोशिश करता है। इस देश में फिल्में केवल मोनोरंजन के लिये नही बनाई जाती बल्कि फिल्म यहां के जीवन शैली को भी काफी हद तक प्रभावित भी करती है। फिल्मी सितारे जितना इस देश में पूजे व दुलारे जाते हैं, वैसा शायद ही कहीं और संभव हो। यहां प्रत्येक नई फिल्म के साथ एक नया ट्रेंड शुरू होता है। फिल्मों का प्रभाव हम पर इतना है कि वो हमारे हेयर स्टाईल से लेकर पेंट के सबसे निकले भाग की लम्बाई-चौड़ाई तक तय कर देते है। यहां अपनी माशुका से इजहार-ए-इश्क करने के तरिके से लेकर बैंक लुटने व किसी को शूट करने की सीख भी फिल्मों से मिल जाती है। इसलिये यह कहना कि फिल्में केवल मनोरंजन का जरिया है, शायद गलत होगा। इस देश में फिल्में एक ऐसा स्तंभ हैं जिसके चारों और समाज घुम रहा है।
ऐसे में जब कोई ऐसी फिल्म आती है जिसका रिश्ता इतिहास के किसी दबे-कुचले अध्याय से हो तथा जो किसी खास समुदाय से जुड़ा हुआ हो, तो उसपर हंगामा होना स्वाभाविक है। लेकिन प्रश्न यह उठता है कि आखिर ऐसे विषयों को बड़े पर्दे पर प्रदर्शित करने की कोशिश ही क्यों की जाती है? इसके पीछे फिल्मकारों का उद्देश्य क्या होता है? क्या फिल्मकारों को यह पता नही होता कि रिलीज होने के बाद या पहले ये फिल्में क्या गुल खिलायेंगी? क्या इन फिल्मों का मतलब केवल मनोरंजन और पैसे कमाने से है या इसका उद्देश्य कोई संदेश देना भी है ? अबतक सिनेमा में फिल्मकार राजनीति को दिखा कर दर्शकों को राजनीति की अच्छाई-बुराईयों से अवगत कराते थे, परंतु अब ऐसा लगता है मानो फिल्में राजनीति का ही एक हिस्सा बन गई है। इसलिये फिल्मकार जानबुझ कर ऐसे विषयों को चुनते है जिन पर विवाद हो, दरअसल, आज विवाद का सीधा सा अर्थ है प्रचार-प्रसार। आज प्रिंट, आडीयो, विडोयो व सोशल मिडिया इतना सक्रीय है कि चाहे वह जैसा भी मुद्दा हो, अगर वह विवादित है तो वह चर्चित भी होगा।
इसी विवाद और चर्चा के माध्यम से फिल्म को भी चर्चित बना कर फिल्म के कर्ता-धर्ता अधिक पैसा कमाना चाहते हैं। ऐसे में कई बार यह दांव चल पड़ता है तो कई बार यह पेंच उल्टा पड़ जाता है। उदाहरण के लिये हम पीके, ओह माई गाड, बाजिराव मस्तानी जैसी फिल्मों का इतिहास देख सकते है जिसका विरोध तो खुब हुआ पर इससे फिल्म की कमाई घटने की बजाए और बढ़ गई। एक-आध को छोड़ दिया जाए तो ये फिल्में बड़े पर्दे के सारे रिकार्ड तोड़ती दिखी। वहीं दूसरी तरफ पद्मावती जैसी कुछ फिल्में है जो इस दांव में खुद फंस जाती है। हालांकि ऐसी फ़िल्मों बहुत कम हैं जिसपर विवाद का नकारात्मक प्रभाव पड़ा हो और जो चल न पाई हो। असल में, यह खेल कुछ वैसा ही है जैसा हमारे देश में राजनीतिक पार्टीयां खेलती हैं। राजनीतिज्ञ पहले खुद जाति, धर्म के नाम पर समाज में आग फैलाते है और फिर उसी आग का उपयोग चुनावों में अपने फ़ायदे के लिये करते हैं। शायद, इसलिये देश की राजनीति भी इन दिनों इस मुद्दे को खूब हवा दे रही है, मानो इस एक फ़िल्म ने केंद्रीय मंत्री से लेकर राज्य के मुख्यमंत्रीयों तक का सिर ठनका दिया हो।
किंतु वास्तविकता देखी जाए तो ऐसी फ़िल्मों की कोई जरुरत नही दिखती। ये फिल्में लोगों का मनोरंजन करने या इतिहास की शिक्षा देने से ज्यादा उपद्रव फैलाती दिखती है। अब पद्मावती को ही ले लिजिये। जबसे इस फ़िल्म के रिलीज होने की घोषणा हुई है तबसे लगभग हर न्युज चैनल के प्राईम टाईम का विषय यह फिल्म है। जहां देश भर में इतने गंभीर मुद्दे ज्वलंत हैं वहां महीने भर अगर देश के न्युज चैनलों का समय एक फिल्म खा जाती हो तो इसे हम क्या कहेंगे ? और तो और, जिस देश में लाखों मामले देश की सर्वोच्च अदालत में विचाराधिन हों, वहां अगर अदालत का समय, किसी फिल्म को रिलीज होने देना है या नहीं, पर जाया हो तो इसे आप क्या कहेंगे ? शायद, पगलपन।
बेहतर होगा अगर ऐसी फिल्में बनाई ही न जाए। जो तथ्य इतिहास के पन्नों में दफ्न है उसके बाहर आने से अगर आज का वर्तमान खराब होता है तो बेहतर यही है की ऐसे प्रसंग को बाहर ला कर इनके साथ छेड़-छाड न किया जाए। ऐसी ऐतिहासिक फिल्में बनाई भी जाएं तो इस बात का पुरा ख्याल रखा जाए कि उससे किसी की भावनाओं को ठेस न पहूँचे।

विवेकानंद वी ‘विमर्या’
मो- 8235616320

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