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नेपाल में लाल सलाम की शुरूआत

नेपाल के सियासी इतिहास में हुए पहले आम चुनाव में वाम-गठबंधन सबसे बड़े दल के रूप में उभर कर सामने आए हैं। इसके बाद वहां राजनीतिक स्थिरता की उम्मीद जगी है। क्योंकि हिमायली मुल्क नेपाल करीब एक दशक से गृहयुद्व की आग में झुलस रहा है। विकास की जगह लगातार विनाश हो रहा है। राजशाही खत्म होने के बाद सरकारी आंकड़ों के मुताबिक अब तक 16 हजार लोग मारे जा चुके हैं। पूरा मुल्क तितर-वितर हुआ पड़ा है। मुल्क में अमल-शांति बहाल हो इस मकसद से पिछले दिनों पूरे देश में हुए एक साथ संसदीय व विधानसभाओं के नजीतों से साफ हो गया है कि अगली सरकार वाम-गठबंधन की होगी। इन नजीतों से एक नई सुबह के होना एहसास करा दिया है। दरअसल हिमालयी राष्ट्र नेपाल में सालों से अस्थित सियासत में अब कम से कम स्थिरता की आहट सुनाई दी है। पड़ोसी मुल्क में गत 26 नवंबर और 7 दिसंबर को हुए राज्य व संघीय चुनाव में वाम गठबंधन जीत की अग्रसर दिखाई पड़ रहा है। अभी तक के रूझान उनके पक्ष में गए हैं। इस बदलाव की आहट को मौजूदा चुनाव संघीय लोकतंत्र को अपनाने की दिशा में अंतिम कदम रूप में देखा जा रहा है। पूरी दुनिया इस बात से बेहद चिंतित है कि नेपाल साल 2006 से गृहयुद्ध में फंसा है। उसके बाहर निकलने की दुआ की जा रही है। गृहयुद्व कहें या राजनीतिक स्थिरता इस महाकुंड में अब तक करीब 16,000 लोगों की जानें जा चुकी हैं। मरने वालों का फिलहाल ये सरकारी आंकड़ा है, पर धरातल में सच्चाई कुछ और भी हो सकती है। पहाड़ी मुल्क की आवाम उम्मीद लगाए बैठी है कि इसके बाद नेपाल की फिजा बदलेगी। अमन-शांति की बहार आएगी।
गौरतलब है कि अब से दो साल पहले नेपाल द्वारा संविधान स्वीकार किए जाने के बाद देश को भारत के राज्यों के तर्ज पर सात राज्यों में बांटा गया था। ऐसा करने के लिए भारत का विशेष योगदान रहा। अलग राज्यों व क्षेत्रीय अधिकारों को लेकर हुई जातीय लडाई में नेपाल के सैकड़ों नागरिकों की मौत हुई थी। मरने वालों में ज्यादातर भारतीय मूल के मधेशी समुदाय के लोग थे। ये लोग नेपाल का तराई क्षेत्र अपने कब्जे में चाहते थे। इन्हें भारत का पूरा समर्थन भी हासिल था। हालांकि बाद में संविधान स्वीकार होने के बाद उनकी मांगों पर गौर करते हुए एक प्रांत दिया गया। अलग राज्य की मांग को लेकर मधेसी समूह सालों तक विरोध प्रदर्शन करते रहे थे। नए संविधान को लागू करने के बाद नेपाल सात राज्यों में बंटा। तराई प्रांत पर मधेशियों का अधिकृत क्षेत्र है। यह क्षेत्र भारत की सीमाओं से सटा हुआ है। खैर, नेपाल का मौजूदा चुनाव बडे कदम के रुप में देखा जा रहा है।
नेपाल में संविधान गठन के बाद हो रहे पहली बार के चुनाव में ही देश की जनता ने कांग्रेस को बेदखल कर दिया है। शुरूआती रूझानों में कांग्रेस पिछड़ गई। ऐसा लग रहा है भारत की कांग्रेस पार्टी की कुदशा पड़ोसी मुल्क की कांग्रेस पर भी पड़ गई। भारत में तो कांग्रेस की छीछालेदर हो ही रही है वहां भी यही हाल है। इन ऐतिहासिक चुनावों में वामपंथी गठबंधन आगे है उन्हें 49 संसदीय सीटों में से 40 पर जीत मिली है जिनके नतीजे अब तक घोषित हो चुके हैं। दूसरी ओर, सत्ताधारी नेपाली कांग्रेस को इन चुनावों में अब तक महज 6 सीटें ही मिली हैं। तस्वीर साफ है कि मुल्क में अब वाम रंग ही लहराएगा। वाम गठबंधन की अगर केंद्र में सरकार बनती है तो इसे बड़ा बदलाव कहा जाएगा। क्योंकि देश के लोगों को उम्मीद है कि इन संसदीय चुनावों से इस हिमालयी राष्ट्र में राजनीतिक स्थिरता आएगी। नेपाल में संसद और प्रांतीय विधानसभाओं के नतीजों में वाम गठबंधन को भारी बढ़त मिलती दिख रही है। घोषित नतीजों में विपक्षी दल सीपीएन-यूएमएल ने दो सीटों पर जीत दर्ज की है, जबकि एक सीट पर उसकी सहयोगी सीपीएन-माओवादी सेंटर के उम्मीदवार ने प्रतिद्वंद्वी नेपाली कांग्रेस के प्रत्याशी को धूल चटाई है। इस चुनाव से संसद के 128 सदस्य चुने जाएंगे। नेपाल की संसद में कुल 275 सीटें हैं। इनमें से 165 पर सीधे चुनाव होता है, जबकि 110 सीटें आनुपातिक प्रतिनिधित्व द्वारा भरी जाती हैं।
राजशाही खत्म होने के बाद नेपाल पूरी तरह से विखंड़ित हो गया था। वहां अब तक कोई भी सरकार स्थित नहीं रह सकी। इस बीच दूसरा दुखद पहलू यह भी रहा है कि नेपाल पर चीन और पाकिस्तान का भी दखल हुआ। दोनों मुल्क नेपाल को साथ लेकर भारत को घेरने की फिराक में रहे। लेकिन समय रहते नेपाल सचेत हो गया। हालंाकि कोशिशें अभी भी जारी हैं। देखा जाए तो नेपाल के संबंध भारत से हमेशा से पारस्परिक रहे हैं। यही नहीं पूरी दुनिया जानती है कि भारत नेपाल का सबसे भरोसेमंद पडोसी देश है। दोनों मुल्कों ने अपनी सदियों की दोस्ती को परवान चढ़ाने के अब नए सिरे से संकल्प ले रखा है। नेपाल में राजशाही खत्म होने के बाद नए नेपाल का जब सर्जन हुआ तो उसका परस्पर सहयोगी पड़ोसी मुल्क भारत ही रहा। भारत हमेशा से नेपाल का ख्याल ठीक उसी तरह से करता हैं जैसे अपने देश के किसी राज्य का। सांस्कृतिक और व्यापारिक पृष्ठभूमि पर भारत और नेपाल एक दूसरे के पूरक रहे हैं।
भारत-नेपाल के बीच संबंध सालों से मधुर रहे हैं। नेपाल का प्राचीन काल सभ्यता, संस्कृति और र्शार्य की दृष्टि से बड़ा गौरवपूर्ण रहा है। नेपाल के उत्तर मे चीन का स्वायत्तशासी प्रदेश तिब्बत है और दक्षिण, पूर्व व पश्चिम में भारत अवस्थित है। नेपाल में रहने वाले ज्यादातर नागरिक हिन्दू धर्मावलम्बी हैं। नेपाल विश्व का प्रतिशत आधार पर सबसे बड़ा हिन्दू धर्मावलम्बी राष्ट्र है। मौजूदा चुनाव होने के बाद जब सरकार बनेंगी तो वह अपने संबंध भारत के साथ कैसे रखेगी। यह बात देखने वाली होगी। इस लिहाज से कि भारत में वाम दल और मौजूदा सरकार में हमेशा छत्तीस का आंकड़ा रहता है तो असंमजस की स्थिति बन जाएगी। जो रूझान सामने आ रहे हैं उनसे तस्वीर साफ है कि वहां अगली सरकार वाम गठबंधन की ही बनंेगी। यह भी सच है वाम-गठबंधन नेपाली सरकार में चीन का प्रभाव अप्रत्यक्ष रूप से रहेगा। चीन वामियों का गढ़ माना जाता है। इसलिए उनका प्रभाव होने की संभावनाएं बनीं रहेगी। नेपाल में अगर चीन का प्रभाव रहा तो भारत सहसोग के रास्ते पर बढ़ाए हाथ पीछे खींच सकता है। इसके बाद दोनों मुल्क में टकराव होने की संभवनाएं भी बढ़ जाएंगी।

रमेश ठाकुर

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