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Category: काव्य-संसार

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कविता : नवरात्र में माँ फिर आईं हैं

नवरात्र में माँ फिर आईं हैं प्रकृति ने भी धरती सजाई है शाखों पर नए पत्ते शर्मा रहे हैं पेड़ों पर नए पुष्प इठला रहे है खेतों में नई फसलें

“प्रार्थना: ऐ मालिक मेरे ऐसा वरदान दे दो”

दें दो प्रभु जी हमें दान दे दो विज्ञान दें दो, हमें ज्ञान दे दो हम नेकियों से न विचलित कभी हो ऐ मालिक मेरे ऐसा वरदान दे दो कर्त्तव्य

“स्वेद नहीं हम शोणित देंगे, भारत के श्रृंगारों को”

स्वेद नहीं हम शोणित देंगे, भारत के श्रृंगारों को लिख देंगे इतिहास नया हम, कलम बना तलवारों को राष्ट्रवाद का स्वप्न सजा, जो भारत पर कुर्बान हुए जर्रा जर्रा नमन

कायनात सारी मिल जायेगी, एक पहल तो करनी होगी

समझना होगा, दुनिया की चाल को, बदलना होगा, खुद से अपने हालात को। ठोकर खाकर ही इंसान संभलता है, ठोकर समझकर ही, भूलना होगा हर हार को। कायनात सारी मिल

तुम

 अधूरा हूं तुम बिन पर उम्मीद है तुम एक दिन आओगी कहीं से अचानक आकर मुझसे टकराओगी। जानोगी मेरा हाल और मुझे देख मुस्कुराओगी शायद उस दिन तुम न चाहते

कविता : आओ अबकी होली में

आओ अबकी होली में रंगों की रंगोली में साथ सभी के टोली में। प्यार का रंग बरसातें हैं प्रिये आओ अबकी होली में। फागुन का खूब चढ़े खुमार रस घोल

कविता : हवा हवाई

हवा हवाई वो हँसती-हँसाती खिलखिलाती अपनी अदाओं का जादू बिखेरती सिनेमा के नील नभ में छितराई चाँदनी असंख्य चाहकों को संतप्त कर खो गई हवाओं की सनसनाहट में “हवा हवाई”

हर्षिका गंगवार की 2 कविताएं…

1.प्रेम मुझमें शेष है… प्रेम खूंटी पर टंगा है, किसी माला में पिरोया हुआ जिसके फूल बेजान हो चुके हैं। प्रेम मेरी डायरी में सूख गया है, उस फूल के

लव कुमार ‘प्रणय’ की *गज़ल*

करूँ क्या मैं उसे अब याद करके वो खुश तो है मुझे बरबाद करके सुना है हो गई बहरी अदालत मिलेगा क्या भला फरियाद करके दुआयें लाख देगा कैद पक्षी

मेरे अधूरे शेर …

१.उसका दिल, दिल नहीं, रेत का मैदान निकला। कई बार लिखा नाम अपना,हर बार मिटा देती हैं॥ २.मुझें तैरना नहीं आता और उसे डूबना…। मोहब्बत में इरादो का, मगर मिलना

नववर्ष पर नेता जी के चुनावी घोषणा पत्र

दीजिये वोट सरकार हम बनायेंगे मिल बांट)2 फिफ्टी-फिफ्टी दोनो जन खायेंगे दीजिये वोट सरकार हम बनायेंगे… घर-घर घुम प्रचार हम करेगे उनसे बढ़िया हम काम करेगे युवाओं के खातिर रोजगार

कविता : नव सृजन

नव सृजन ****** उठो जागो अब वहुत हो चुका विश्राम समय खिसक रहा नही रहा अभिराम। सबको जागृत कर दग्ध हृदय में नयी स्फूर्ति उत्साह का निज धाम समरसता सौहार्द

लाल बिहारी लाल के तीन मुक्तक

लाल बिहारी लाल के तीन मुक्तक मुक्तक-१ जनता के जज्बातों से खेलना मेरा काम देखो सीना छप्पन से अच्छा हो परिणाम दुनिया चाहे कुछ भी कहे लाल की चले दुकान

कविता : ‘एक चिड़िया’

‘एक चिड़िया’ ……………………………………….. संस्कारों के ढहते  किलों के नीचे दब गई है /एक चिड़िया/ उसकी चहक वहशी दरिंदों की शिकार/ सुनहले सपनों के सूरज की किरण न देख सकी ना

कविता : वो भी एक बच्ची है

वो भी एक बच्ची है चौराहे पर गुब्बारे को बेचती एक बच्ची धूल में नहाये कुछ सपने खरीदने हैं उसे गाड़ियों की रफ़्तार से अनभिज्ञ खड़ी हो जाती इंतजार में

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