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अक्षय ऊर्जा के क्षेत्र में भारत के नए संकल्प

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने संयुक्त राष्ट्र (यूएन) में जलवायु परिवर्तन के कार्यक्रम में भारत के अक्षय ऊर्जा उत्पादन ( जिसके तहत सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा, पनबिजली , परमाणु ऊर्जा आदि शामिल है ) के लक्ष्य को दोगुने से अधिक बढ़ाकर अर्थात पूर्व के 175 गीगावाट से बढ़ाकर 450 गीगावाट तक पहुंचाने का संकल्प किया । इसके साथ ही उन्होंने जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिहाज से आदतों में बदलाव लाने के लिए वैश्विक जन आंदोलन की जरूरत बताई है।
समस्या यह है कि हम हर बार विकास के नाम पर पर्यावरण की बलि चढ़ाते रहे हैं। लेकिन अब जो हालात हैं उनमें यह चल नहीं सकता। इसलिए विकास की परिभाषा, विकास का मॉडल और विकास की नीति बदलनी होगी। हमें टिकाऊ विकास की अवधारणा को व्यापक रूप से अपनाना होगा। इस अवधारणा में ऐसे विकास को स्वीकार्य माना जाता है जो पारिस्थितिकी को और प्राकृतिक संसाधनों को भावी पीढ़ियों के लिए बचाए रखे। सयुंक्त राष्ट्र संघ द्वारा वर्ष 2015 से 2030 तक के अगले 15 सालों के लिए ‘टिकाऊ विकास लक्ष्य’ (एसडीजी- सस्टेनेबल डेवलपमेंट गोल्स) तय कर दिए गए।
सतत विकास का सातवां लक्ष्य है सभी के लिए सस्ती, टिकाऊ और आधुनिक ऊर्जा तक पहुंच सुनिश्चित करना, जिसका मकसद है 2030 तक सभी को स्वच्छ ऊर्जा स्रोतों के जरिये सस्ती बिजली उपलब्ध कराना।

विदित है कि ऊर्जा स्रोतों की उपलब्धता, इनका दोहन व उपयोग ही आज के समय में किसी राष्ट्र की आर्थिक स्थिति की मजबूती का सबसे बड़ा कारक परिचायक माना जाता है | यही तो अलादीन का चिराग है जो आज किसी देश को विकसित,विकासशील या तीसरी दुनिया के देशों की पंक्ति में खड़ा करता है |
भारत सरकार के सांख्यिकी और कार्यक्रम क्रियान्वयन मंत्रालय द्वारा प्रकाशित बीसवीं ऊर्जा सांख्यिकी रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2011-12 से 2016-17 के बीच प्रति व्यक्ति ऊर्जा की खपत 3.54 फीसद बढ़ गई है। । केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण की अप्रैल 2019 की रिपोर्ट के अनुसार देश में प्रति व्यक्ति प्रति वर्ष 1181 किलोवाट बिजली का उपभोग किया जाता है। इसका एक अहम कारण देश में तेजी से बढ़ती जनसंख्या भी है। लिहाजा, ऊर्जा संकट को देखते हुए अब केवल बिजली का उत्पादन बढ़ाना ही लक्ष्य नहीं हो सकता। हमें यह भी देखना होगा कि बिजली उत्पादन में सौर ऊर्जा और पवन ऊर्जा का हिस्सा किस तरह लगातार बढ़ाया जाए। ये ऊर्जा के अक्षय स्रोत तो हैं ही, इनसे मिलने वाली ऊर्जा बिना प्रदूषण के मिलती है। इसकी तकनीकी लागत थोड़ी अधिक हो सकती है, लेकिन पर्यावरण के मद्देनजर हमें यह लागत चुकाने को तैयार रहना चाहिए

दरअसल, भारत ऊर्जा को लेकर मुख्यत: कोयले, पेट्रोलियम व प्राकृतिक गैसों पर ही निर्भर है जिसकी अपनी सीमाएं हैं। एक तो महंगी होने की वजह से इन तक सभी की पहुंच नहीं है।
दूसरा , कोयले व पेट्रोलियम से कार्बन डाइऑक्साइड का उत्सर्जन होता है , जो ग्लोबल वार्मिंग का कारण बनता है। आज विश्व पटल पर जलवायु परिवर्तन बहुत बड़ा मुद्दा है जिसके लिए विभिन्न देशों में प्रदर्शन चल रहे है। पेरिस समझौते के बाद समूचे विश्व ने स्वीकार किया है कि जलवायु परिवर्तन एक गंभीर मसला है और दुनियाभर में इस समस्या का समाधान प्राथमिकता के आधार पर करना चाहिए।
आज भारत जलवायु परिवर्तन की इस चुनौती से निपटने के लिए वैश्विक मंच पर अनेक अनुबंधों की अगुवाई कर रहा है, जिनमें अंतरराष्ट्रीय सौर गठबंधन (आइएसए), नवोन्मेष पहल, अफ्रीकी अक्षय ऊर्जा आदि जैसे बड़े कदम शामिल हैं।
वस्तुतः भारत तेल के आयात पर निर्भर है और वह भी कई संकटों के चलते महंगा पड़ता है। इसके साथ ही ये स्रोत टिकाऊ भी नहीं हैं। जिस रफ्तार से ऊर्जा के इन प्राकृतिक संसाधनों का दोहन किया जा रहा उससे वे जल्द ही खत्म हो जाएंगे और फिर इन्हें दोबारा बनने में सदियां लग जाएंगी। इन कारणों को देखते हुए सरकार ने अक्षय ऊर्जा अर्थात रिन्यूएबल एनर्जी को बढ़ावा दिया है।
भारत में अक्षय ऊर्जा के उत्पादन की अपार संभावनाएं हैं। भारत एक ऐसा देश है, जहां पूरे साल सौर ऊर्जा और पवन ऊर्जा का इस्तेमाल किया जा सकता है। सौर ऊर्जा के लिए साल भर में लगभग तीन सौ दिनों तक खिली धूप और पर्याप्त भूमि उपलब्ध है। परमाणु ऊर्जा के लिए यहां थोरियम का अथाह भंडार और पवन ऊर्जा के लिए लंबा समुद्री किनारा उसके पास प्राकृतिक संसाधन के तौर पर उपलब्ध है। जरूरत है तो बस उचित प्रौद्योगिकी के विकास और संसाधनों का दोहन करने की।
लिहाजा, अक्षय ऊर्जा के क्षेत्र को व्यापक और प्रभावी बनाने के लिए ‘नवीन एवं अक्षय ऊर्जा’ नाम से एक स्वतंत्र मंत्रालय बनाया गया है। भारत विश्व का पहला देश है, जहां अक्षय ऊर्जा के विकास के लिए एक अलग मंत्रालय है। साथ ही भारत के सौर ऊर्जा कार्यक्रम को संयुक्त राष्ट्र का भी समर्थन मिला हुआ है। भारत के इस कार्यक्रम को ‘एनर्जी ग्लोब वर्ल्ड’ पुरस्कार मिल चुका है।

सरकारें विकास के नाम पर औद्योगिक इकाइयों के विस्तार को बढ़ावा देने की कोशिश करती हैं, पर ऊर्जा जरूरतें पूरी न होने की वजह से इस दिशा में कामयाबी संदिग्ध बनी रहती है। अब वैकल्पिक ऊर्जा स्रेतों पर गंभीरता से विचार करते हुए ऊर्जा बचत के लिए जरूरी उपाय अपनाने पड़ेंगे।अब हम हवा और सूरज जैसे अक्षय स्रोतों से बिजली का उत्पादन बढ़ाने के अनिवार्य तकाजे की कतई अनदेखी नहीं कर सकते, क्योंकि भारत के शहरों में वायु प्रदूषण दिनोंदिन बढ़ता जा रहा है और अब इस हद तक पहुंच गया है कि इसकी वजह से स्वास्थ्य समस्याएं पैदा हो रही हैं। इसके कारण जीवन प्रत्याशा भी घट सकती है। नन्हे बच्चों का मस्तिष्क वायु प्रदूषण की वजह से अविकसित रह जा सकता है। बुजुर्गों के लिए तो हर तरह से मुसीबत है। पर्यावरण-रक्षा आज का सबसे बड़ा युगधर्म है। आज इससे कोई भी व्यक्ति कन्नी नहीं काट सकता।
ऊर्जा के मामले में दूसरों पर निर्भर नहीं रहा जा सकता। क्योंकि इससे देश की अर्थव्यवस्था प्रभावित होती है तथा देश की विदेश नीति भी इन तत्वों से कही न कही प्रभावित होती है । अपनी तकनीक और संसाधनों का उपयोग कर आत्मनिर्भरता हासिल करनी ही होगी। यह अफसोस का विषय है कि हमने अक्षय ऊर्जा के उपयोग पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया। निजी प्रयास से अपनी जरूरत भर की सौर ऊर्जा पैदा करना खर्चीला काम है, इसलिए लोग इसकी तरफ आकर्षित नहीं होते। हालांकि सरकारों ने सौर ऊर्जा उपकरण लगाने के लिए छूट दे रखी है, पर जागरूकता के अभाव में इस तरफ लोग कदम नहीं बढ़ा पाते। परिस्थितियां विषम होने के कारण हमें सभी उपलब्ध अक्षय ऊर्जा विकल्पों पर विचार करना होगा। इसके साथ ही ऊर्जा संरक्षण के व्यावहारिक कदमों को अपनाना होगा, ताकि बड़े पैमाने पर बिजली की बचत हो सके।
अक्षय ऊर्जा से इंसान की रोजमर्रा की जरूरतें पूरी की जा सकती हैं। जैसे रेगिस्तानी इलाके में लोगों को रोजगार मुहैया कराने में भी सौर ऊर्जा क्षेत्र बड़ा साधन हो सकता है।
इसके अलावा कृषि, कुटीर, लघु और बड़े उद्योगों के लिए भी ऊर्जा की जरूरतों को अक्षय ऊर्जा से आसानी से पूरा किया जा सकता है।राजस्थान में सौर ऊर्जा के माध्यम से इतनी बिजली का उत्पादन किया जा सकता है जिससे पूरे उत्तर भारत में ऊर्जा की पूर्ति हो सकती है। गैर पांरपरिक ऊर्जा भविष्य की जरूरत है। कहना न होगा, गैर पारपंरिक ऊर्जा को प्राप्त करने के लिए हमारे पास संसाधन तो काफी हैं, लेकिन दृष्टि का अभाव है। इसके लिए वैज्ञानिक दृष्टि से सोचने और काम करने की जरूरत है। शुरुआत में इसकी लागत ज्यादा आ रही है लेकिन निरंतर इस दिशा में हो रहे शोध यह भरोसा दिलाते हैं कि गैर-पारंपरिक ऊर्जा सर्वसुलभ होने के साथ ही एक दिन किफायती भी हो सकती है। यह ऐसी ऊर्जा है जिसे छोटी से छोटी इकाई से हासिल किया जा सकता है और जिसमें आम लोग भी अपनी भूमिका निभा सकते हैं। फिर, यह ऊर्जा उत्पादन की ऐसी विधि है जिसमें किसी भी स्तर पर दुर्घटना के अंदेशे नहीं होते। हमें पर्यावरण संरक्षण और विकास के बीच द्वंद्व को पाटने का कार्य करना होगा ।

हालांकि समस्या यह है कि ऊर्जा के वैकल्पिक स्रोतों की प्रचुर उपलब्धता के बावजूद छिटपुट और छोटे स्तर पर किए जाने वाले प्रयासों के अलावा इनके व्यापक उपयोग की कोई ठोस पहल नहीं दिखती। इस लिहाज से हरियाणा सरकार का फैसला उचित है। इस फैसले के मुताबिक समूचे राज्य में पांच सौ वर्ग गज या इससे ज्यादा के भूखंड पर बनी सभी इमारतों को यह निर्देश दिया गया है कि वे अगले सितंबर तक अपनी छतों पर सौर ऊर्जा संयंत्र लगवा लें। इस फैसले के अमल में आने के बाद समूचे राज्य में बिजली की जरूरतों के मामले में बड़ा और सकारात्मक बदलाव आ सकता है। खासकर बिजली की काफी अधिक मांग वाले गुड़गांव जैसे इलाकों में तस्वीर काफी बदल सकती है।

अक्षय ऊर्जा में एक बड़ी समस्या इन ऊर्जा उत्पादन करने वाले उपकरणों का देश में निर्माण न के बराबर होना । अभी तक ऐसे अधिकांश उपकरण आयात किए जाते हैं। इससे बिजली उत्पादन की लागत काफी बढ़ जाती है, जिसका सीधा-सीधा असर देश की अर्थव्यवस्था पर भी पड़ता है। अतः इनके उत्पादन को भी बढ़ावा देना होगा ।
इसके अलावा अक्षय ऊर्जा उत्पादन की देशभर में कई छोटी-छोटी इकाइयां हैं जिन्हें एक ग्रिड में लाना बेहद चुनौती भरा काम है। इससे बिजली की गुणवत्ता प्रभावित होती है।
सौर ऊर्जा में दूसरी समस्या सोलर पैनल से होने वाले प्रदूषण की है। सोलर पैनल के उपयोगी नहीं रहने के बाद इसे समाप्त नहीं किया जा सकता अर्थात यह बायोडिग्रेडेबल नहीं है । यूरोपीय यूनियन ने इस समस्या के निदान के लिए सोलर पैनल बनाने वालों के लिए अनिवार्य किया है कि वे पुराने सोलर पैनल को खरीद कर इनका पुनः उपयोग करेंगे । इससे यह समस्या हल हो सकती है।
इसके अतिरिक्त परमाणु ऊर्जा भी हमारे लिए कठिन है क्योंकि रिहायशी इलाकों में इन सयंत्रों को लगाने में खतरा रहता है और हमारे पास यूरेनियम के भंडार भी पर्याप्त नहीं है। अतः हमें सौर ,पवन व जल विद्युत ऊर्जा पर जोर देना होगा ।

अक्षय ऊर्जा स्रोतों के उपयोग को बढ़ावा देने से हमारी ऊर्जा की मांग एवं आपूर्ति के बीच का अंतर भी खत्म हो जाएगा और इससे प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से सामाजिक जीवन स्तर में भी सुधार होगा। कहा जा सकता है कि अक्षय ऊर्जा के माध्यम से हम अंधेरे को दूर भगा सकते हैं।जरूरत इस बात की है कि बिजली उत्पादन को विकेंद्रित करने और इसमें सामाजिक भागीदारी बढ़ाने के लिए अक्षय ऊर्जा को ज्यादा से ज्यादा बढ़ावा दिया जाए। पर्यावरण को बचाने की जिम्मेदारी सबकी है। जो देश हरित तकनीक को ज्यादा से ज्यादा अपनाएगा, वह दुनिया का तो भला करेगा ही, सबसे ज्यादा अपना भला करेगा।

रीतेन्द्र कंवर शेखावत
Rajasthan university जयपुर
Address – E-320 Ramnagar extension जयपुर
Mobile – 8090845640

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