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अब काजी भी बनेंगी मुस्लिम महिलाएं

विशेषकर अल्पसंख्यक समुदाय से ताल्लुक रखने वाली महिलाओं के मौलिक हकों पर सदियों से कुछ कुंद- कट्टरपंथियों और दुर्दांत सामाजिक सोच का कब्जा रहा है। पर, अब वह अपने प्रदत्त मूलभूत अधिकारों से वंचित नहीं रहेंगी। उनके वाजिब हकों-अधिकारों को दिलाने की आवाजें देश-विदेश हर जगह बुलंद होने लगी हैं। हाल ही में जर्मनी से मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों की वकालत करने वाली एक अच्छी सामाजिक खबर सुनने को मिली। खबर है कि विशेष समुदाय की महिलाओं ने एकजुट होकर वहां एक लिबरल मस्जिद का निर्माण करके एक मुस्लिम महिला को उसका इमाम बनाने का निर्णय लिया। इस निर्णय के पीछे की वजह पर उन्होंने अपने तर्क प्रस्तुत किए कि इस्लाम में जो अधिकार एक पुरुष के हैं, वही एक महिला के। जर्मन सरकार ने भी इस कदम की सराहना करते हुए सभी महिलाओं के हिम्मत की तारीफ की। निश्चित रूप से यह बदलाव का कदम नई सुबह का सूरज उगने जैसा कहा जाएगा। क्योंकि किसी महिला को मस्जिद के इमाम के अहम पद की जिम्मेदारी मिलना खुद में बदलते समाज की तस्वीर पेश करने जैसा है। समुदाय के अंतर्गत हर वर्ग को इसकी सराहना करनी चाहिए। भारत के लिहाज से भी यह खबर मुस्लिम महिलाओं के लिए बेजोड़ सशत्तिकरण के क्षेत्र में उम्मीद बढ़ाने का काम करेगी। तीन तलाक प्रथा खत्म होने के बाद मुस्लिम महिलाओं को अपने अधिकारों से लड़ने की जो नई शक्ति मिली है। उसमें यह खबर उम्मीद की किरण के समान होगी।
वहां की मुस्लिम महिलाओं द्वारा उठाया गया सहासी कदम का असऱ भारत में प्रत्यक्ष रूप से दिखाने लगा है। भारतीय मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों पर काम करने वाली संस्था ‘‘भारतीय मुस्लिम महिला आदोलन‘‘ से जुड़ी महिलाएं पिछले कुछ माह से भारतीय मुस्लिम महिलाओं को काजी या इमाम बनाने के लिए ट्रेनिंग दे रही है। संस्था की स्थापना जकिया सोनम ने की है जिन्होंने पूर्व में दारुल उलूम निस्वां को भी स्थापित किया था। इन महिलाओं को भी दारुल उलूम निस्वां की ही सरपरस्ती में तैयार किया जा रहा है। फिलहाल इस संस्था का उद्देश्य सम्पूर्ण भारत में पंद्रह-बीस महिलाओं को काजी बनाना है। लेकिन मुस्लिम महिलाओं के इस अदम साहस ने कट्टरपंथियों के माथे पर चिंता की लकीरें खींच दी हैं। इसके लिए जकिया सोनम कुछ सप्ताह पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मिली थी, उन्होंने पीएम के समक्ष जर्मनी में बनीं मुस्लिम महिला के काजी बनने का उदाहरण भी दिया। इसके बाद पीएम ने उनको सहयोग का आश्वासन दिया। पीएम के सहयोग ने उन्हें और बल दिया है। देखा जाए तो दुनिया की तकरीबन आधी आबादी महिलाओं की है। इस लिहाज से महिलाओं को तमाम क्षेत्रों में बराबरी का हक मिलना चाहिए, लेकिन ऐसा कभी हो न सका। कमोबेश दुनिया भर में महिलाओं को आज भी दोयम दर्जे पर रखा जाता है। अमूमन सभी समुदायों में महिलाओं को पुरुषों से कमतर मानने की प्रवृत्ति है, खासकर मुस्लिम समाज में तो महिलाओं की हालत बेहद बदतर है। इस समुदाय में बदलाव की बहुत जरूरत है।
भारतीय मस्जिदों में भी मुस्लिम महिलाओं की भागीदारी हो। पुरूषों की तरह महिलाएं भी काजी बनें। उन्हें भी बराबरी का हक मिले। भारत में मुस्लिम महिलाओं को उनके मौलिक अधिकारों को दिलाने की शुरूआत फिलहाल तीन तलाक को खत्म करके हो चुकी है। महज तीन बार तलाक कह कर पारिवारिक संबंधों को खत्म करने की रिवाज को जबसे खत्म करने का निर्णय लिया गया है। तभी से मुस्लिम महिलाओं को नई हिम्मत मिलीं है। विशेषकर भारत में इस्लाम में कई ऐसी प्रथाएं रही हैं जो कही न कही भारतीय संविधान द्वारा दी गई मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करता है। ये सभी काननू के जद में आएंगी। इस्लाम की कुछ प्रथाएं मुस्लिम महिलाओं को उनके समुदाय के पुरषों की तुलना में और अन्य समुदायों की महिलाओं की तुलना में ‘असमान एवं कमजोर’ बना देती हैं। ऐसी प्रथाओं को खत्म करने की दरकार है। कट्टरपंथियों की दुर्दांत सोच के आगे भारत में मुस्लिम महिलाओं की स्थिति दशकों से बदतर रही है। लेकिन अब महिलाएं बंदिशों की बेड़ियां खुद तोड़ने पर आतूर हैं। इसके लिए समाज का हर वर्ग उनका समर्थन भी कर रहा है। समाज भले फेमिनिज्म को लेकर बड़े-बड़े सेमिनारों और संगोष्ठियों व अलग-अलग कैम्पेनों के माध्यम से नारियों और उनके अधिकारों की वकालत कर रहते हों, मगर हकीकत हमारी अपीलों से बहुत इतर है। हिंदुस्तान में महिलाओं की, खासतौर से मुस्लिम महिलाओं की, हालत क्या है, बताने की जरूरत भी नहीं है और शायद किसी से छुपी भी नहीं है। चाहे सामाजिक रूप से हो या फिर धर्म के नाम पर, भारतीय मुस्लिम महिलाओं की स्थिति बद से बदतर है।
चरमपंथियों और धर्म के ठेकेदारों का हमेशा से मानना रहा है कि कि मुस्लिम महिलाएं घर में ही रहें तो ठीक है। उनको पुरूषों की तरह कभी आजादी नहीं दी गई। अगर कोई मुस्लिम महिला ऐसा दुस्साहस करती है तो उसे पर फतवे का सफूगा छोड़ दिया जाता रहा है। मस्जिदों में मुस्लिम महिलाओं का काजी बनना एक ऐसी पहल जो सच में सराहनीय है। इससे न सिर्फ मौजूदा समय में बदहाली की जिंदगी जी रही मस्लिम महिलाओं को खुली फिजा में जीने का बल मिलेगा बल्कि ये चरमपंथी रवैये और कट्टरपंथी स्वाभाव के मूल को भी नष्ट करने में रामबाण साबित होगी। अब इक्कसवीं सदी की सुबह है इसलिए अब वह समय आ चुका है जब समुदाय की महिलाओं ने खुद, उस बंदिश और अपने पर जकड़ी हुई बेड़ियों को तोड़, महिला सशक्तिकरण जैसे संवेदनशील मुद्दे को एक सही दिशा दी है और बल दिया है। हम सभी को इनका समर्थन करना चाहिए।
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रमेश ठाकुर
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