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अब बांस की मदद से होगी किसानों की आय दोगुना

देश के किसानों के लिए एक अच्छी खबर है। भारतीय वन कानून में संशोधन के बाद अब बांस एक पेड़ नहीं रह गया। ऐसे में किसान अब गैर कृषि भूमि में भी बांस उगा सकेंगे और बाजार में बेच सकेंगे। यह फैसला 2022 तक किसानों की आय दोगुना करने के लिए सरकार के प्रयासों के बीच लिया गया।
भारत के राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने भारतीय वन अधिनियम 1927 में संशोधन करने वाले अध्यादेश को मंजूरी दे दी है। इस अध्यादेश के जरिये गैर वन्य क्षेत्रों में उगाए जाने वाले बांस को पेड़ की परिभाषा से बाहर कर दिया गया है। यह अधिनियम बांस के पेड़ों को काटने या इसकी ढुलाई के लिये अनुमति हासिल करने से छूट देने में मदद करेगा। अध्यादेश जारी किये जाने से पहले अधिनियम में पेड़ की परिभाषा में ताड़, बांस, झाड़-झंखाड़ और सरकंडा शामिल थे। संक्षिप्त अध्यादेश में कहा गया है कि अधिनियम की धारा 2 की उपधारा 7 से बांस शब्द को हटाया जाता है। सूत्रों ने बताया कि इस कदम का उद्देश्य बांस उगाए जाने को प्रोत्साहन देना है।
केन्द्रीय पर्यावरण मंत्री हर्षवर्धन ने कहा है कि सरकार ने एक ऐतिहासिक पहल के तहत भारतीय वन संशोधन अध्यादेश 2017 जारी किया है, जिसमें गैर वन्य क्षेत्रों में उगाए जाने वाले बांस को पेड़ की परिभाषा से छूट दी जा सके। इसके जरिये आर्थिक इस्तेमाल के लिये बांस को काटने या उसकी ढुलाई के लिये परमिट की जरूरत को समाप्त कर दिया गया है। यद्यपि वर्गीकरण के हिसाब से बांस एक घास है, लेकिन भारतीय वन अधिनियम 1927 के तहत इसे कानूनन पेड़ के रूप में परिभाषित किया गया था। इस संशोधन से पहले वन्य के साथ-साथ गैर वन्य क्षेत्र की जमीन पर उगाए जाने वाले बांस को काटने और उनकी ढुलाई के लिये अधिनयम के प्रावधान लागू होते थे। एक आधिकारिक वक्तव्य में कहा गया है कि गैर वन्य भूमि पर किसानों द्वारा बांस को उगाने की राह में यह बड़ी बाधा थी।
हर्षवर्धंन के अनुसार इस संशोधन का उद्देश्य गैर वन्य क्षेत्रों में बांस उगाए जाने को प्रोत्साहन देना है। इसके जरिए किसानों की आय बढ़ाने और देश के हरित आवरण को बढ़ाने का लक्ष्य हासिल किया जाएगा। वन्य क्षेत्र में उगाए जाने वाले बांस पर अब भी भारतीय वन अधिनियम 1927 के प्रावधान लागू होंगें। प्रधान मंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा की गयी एक उल्लेखनीय पहल में केंद्र सरकार ने भारतीय वन (संशोधन) अध्यादेश, 2017 द्वारा गैर-वन क्षेत्रों में उगाए जाने वाले बांस को वृक्ष की परिभाषा से मुक्त करने का प्रावधान किया है, जिससे की किसानो के अपने आर्थिक उपयोग के लिए उसकी कटाई अथवा पारगमन हेतु सरकारी अनुमति की आवश्यकता समाप्त हो गयी है।
इस संशोधन का एक प्रमुख उद्देश्य किसानों की आय में वृद्धि एवं उसके साथ देश के वन क्षेत्र को बढ़ाने के लिए गैर-वन क्षेत्रों में बांस की खेती को बढ़ावा देना है। गैर-वन क्षेत्रों में बांस के वर्गीकरण में संशोधन और परिणामी परिवर्तन बांस क्षेत्र में बहुत आवश्यक और दूरगामी सुधारों का निर्माण करेगा। एक तरफ किसानों और निजी व्यक्तियों द्वारा सामना किए जाने वाले कानूनी और नियामक कठिनाइयों को हटा दिया जाएगा और दूसरी और यह 12.6 मिलियन हेक्टेयर खेती योग्य भूमि में खेती के लिए एक व्यवहार्य विकल्प पैदा करेगा।
यह कदम संरक्षण और टिकाऊ विकास के अलावा किसानों की आय में बढ़ोत्तरी करने के उद्देश्य से है। इस संशोधन से कृषि भूमि और वृक्षारोपण मिशन के तहत अन्य निजी भूमि पर वृक्षारोपण के अलावा, उपयुक्त बांस प्रजातियों के वृक्षारोपण, ब्लॉक लगाए जाने के लिए किसानों और अन्य व्यक्तियों को प्रोत्साहित करेगा। संशोधन के कुछ अन्य लाभों में ग्रामीण भारत के पारम्परिक कारीगरों, बांस आधारित पेपर और लुगदी उद्योग, कुटीर उद्योग, फर्नीचर बनाने वाली इकाइयों, कपड़े बनाने वाली इकाइयां, धूप छड़ी बनाने वाली इकाइयों को कच्चे माल की आपूर्ति में वृद्धि शामिल है। बांस के अनुप्रयोगों को बढ़ावा देने के अलावा लकड़ी जैसे विकल्प और पैनल, फर्श, फर्नीचर और कंपोजिट, निर्माण और आवास, बांस का कोयला इत्यादि जैसे उद्योगों को भी सहायता करेगा। यह संशोधन हाल ही में गठित राष्ट्रीय बांस मिशन की सफलता में काफी मदद करेगा।
जंगलों के बाहर के क्षेत्रों में अनुमानित 10.20 मिलियन टन के बढ़ते स्टॉक के साथ बांस बहुतायत से उगता है। लगभग 2 करोड़ लोग बांस संबंधी गतिविधियों में शामिल हैं। एक टन बांस प्रतिदिन 350 जनों को रोजगार प्रदान करता है। बांस की खेती के लिए एक सक्षम माहौल देश में नौकरी के अवसर पैदा करने में मदद करेगा। वर्तमान में भारत में बांस की मांग लगभग 28 मिलियन टन है। हालांकि बांस की खेती के तहत दुनिया का 19 प्रतिशत हिस्सा भारत का है, लेकिन इस क्षेत्र में बाजार का हिस्सा केवल 6 प्रतिशत ही है। वर्तमान में भारत लुगदी, कागज, फर्नीचर जैसे लकड़ी और संबद्ध उत्पादों का आयात करता है। 2015 में भारत ने 43,000 करोड़ रुपए मूल्य के लकड़ी और संबद्ध उत्पादों की 18.01 मिलियन क्यूबिक मीटर आयात की थी । घरेलू उत्पादन की मांग को पूरा करने के अलावा इस संशोधन से इन मुद्दों में से कुछ को हल करने में मदद मिलेगी।
संयुक्त राष्ट्र के औद्योगिक विकास संगठन के आंकलन के अनुसार अकेले उत्तर-पूर्व क्षेत्र में अगले दस वर्षों में लगभग 5000 करोड़ रु के बांस के कारोबार की संभावना है। इस संशोधन से हमारी वृह्द क्षमता का दोहन करने में मदद मिलेगी एवं अंतर्राष्ट्रीय बाजार में हिस्सेदारी के मौजूदा स्तर को बढ़ाने एवं पूरे देश विशेष रूप से उत्तर पूर्वी क्षेत्र की अर्थव्यवस्था में सुधार करने में मदद मिलेगी।
वर्गीकरण के हिसाब से बांस एक घास है, लेकिन भारतीय वन अधिनियम 1927 के तहत इसे कानूनन पेड़ के रूप में परिभाषित किया गया था। अब 90 सालों बाद कानून में संशोधन कर बांस को पेड़ का दर्जा दिए जाने से हटा लिया गया है। सरकार के इस फैसले के प्रमुख दो उद्देश्य हैं। एक तरफ जहां इस फैसले से किसान गैर कृषि भूमि पर बांस को उगा सकेंगे और अपनी आमदनी को बढ़ा सकेंगे, वहीं पर्यावरण की दृष्टि से भी सरकार को लाभ मिलेगा। अध्यादेश बांस के पेड़ों को काटने या इसकी ढुलाई के लिये अनुमति हासिल करने से छूट देने में मदद करेगा। अध्यादेश के जरिये आर्थिक इस्तेमाल के लिये बांस को काटने या उसकी ढुलाई के लिये परमिट की जरुरत को समाप्त कर दिया गया है। वैधानिक और नियामक बाधाएं हट जाने से एक करोड़ छब्बीस लाख हेक्टेेयर खेती योग्य बेकार पड़ी जमीन पर बांस की खेती की जा सकेगी।
भारत में बांस के जंगलों का कुल क्षेत्रफल 11.4 मिलियन हेक्टेयर है जो कुल जंगलों के क्षेत्रफल का 13 प्रतिशत है। अभी तक बांस के लगभग 2000 विभिन्न उपयोगों की जानकारी है, जिसमें संरचनाओं का निर्माण घरेलु उपयोग की वस्तुएं, साज-सज्जा के सामान, ईंधन एवं हवा हेतु बफर क्षेत्र बनाना इत्यादि शामिल है। भारत में बांस का अनुमानित वार्षिक उत्पादन 1.35 करोड़ टन है। देश का उत्तरपूर्वी क्षेत्र बांस के उत्पादन में काफी समृद्ध है एवं देश के 65 प्रतिशत एवं विश्व के 20 प्रतिशत बांस का उत्पादन करता है। चीन के बाद भारत बांस की अनुवांशिक संसाधनों में 136 प्रजातियों के साथ दूसरे स्थान पर है जिसमें से 58 प्रजातियां उत्तरी पूर्वी भारत में पाई जाती है।
बांस के उचित प्रसंस्करण हेतु कुशल, मजबूत एवं उचित मूल्य के उपकरणों की आवश्यकता है। जिससे उत्पादकता में बढ़त, कठिन श्रम में कमी एवं बांसों की बर्बादी में कमी की जा सके। इन विकास कार्यो ने विभिन्न क्षेत्रों जैसे बागबानी, पशुधन, मत्स्य पालन में बांस के उपयोग की संभावनाएं बढ़ाई है। इसका उपयोग फसल वास्तुकला, भंडारण संरचनाओं, आवास, मत्स्य पालन संरचनाएं, मछली जाल, मछली बीजों का परिवहन इत्यादि में किया जा सकता है। बांस की बनी वस्तुओं का ग्रामीण स्तर पर उत्पादन रोजगार एवं अच्छे आय का माध्यम बन सकती है। बांस का उपयोग करके कृषि कार्यों में उपयोग आने वाले उपकरणों का निर्माण भी किया जा सकता है। इस प्रकार कृषि उपकरणों में बांस एक हरित अभियांत्रिकीय पदार्थ के रूप में अपनाया जा सकता है।

रमेश सर्राफ धमोरा
स्वतंत्र पत्रकार

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