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असंवेदनशील निजी अस्पताल और बुझते चिराग

देश के निजी अस्पतालों का आचरण कुछ ऐसा हो गया है कि अगर उनके मेडिकल बिल पर एक किताब छापी जाए, तो उसका शीर्षक होगा, कुछ ही दिन में करोड़पति कैसे बनें। देश के ज्यादातर निजी अस्पताल बेहतर इलाज के नाम पर भारी मुनाफा कमाने वाली बीमारी से पीड़ित हैं। इस मुनाफाखोरी वाली बीमारी का इलाज हमारे सरकारी तंत्र के पास होने के बावजूद भ्रष्ट अफसरशाही इसके विरुद्ध कोई असरदार कदम नहीं उठाती है। जहां एक तरफ सरकारें बाल विकास को लेकर बड़े-बड़े दावे करती है, वही सस्ते और किफायती इलाज के अभाव में देश का भविष्य कहे जाने वाले मासूम चिराग बुझ रहे हैं। ऐसे में एक गरीब आम आदमी क्या करें? वह सिस्टम के खिलाफ खड़ा हो या सामने खड़ी चट्टान जैसी मजबूरियों से लड़े। गुरुग्राम से जुड़े मेदांता हॉस्पिटल से जुड़ी ऐसी ही एक घटना सामने आई है, जहां डेंगू के इलाज के नाम पर 7 वर्ष के एक बच्चे का बिल 16 लाख रुपए बना दिया गया है। बच्चे के पिता गोविंद सिंह एक एश्योरेंस एजेंट हैं और उनकी महीने की कमाई 7 से 8 हजार रु से ज्यादा नहीं है। 30 अक्टूबर को डेंगू से पीड़ित इस बच्चे को मेदांता हॉस्पिटल में भर्ती कराया गया था। अस्पताल ने बच्चे के 22 दिन के इलाज का 16 लाख रुपए का बिल बच्चे के माता पिता को थमा दिया। बच्चे के पिता को अस्पताल का बिल चुकाने के लिए अपना मकान गिरवी रख कर कर्ज लेना पड़ा तथा किसी तरह उन्होंने यह विल चुका दिया। इसके आगे के इलाज के लिए पैसे न होने के कारण उन्हें मेडिकल एडवाइजरी का फॉर्म भरकर बच्चे को गंभीर हालत में ही सरकारी अस्पताल में भर्ती करना पड़ा तथा दो दिन बाद ही इस बच्चे की मौत हो गई। मेदांता जैसे अस्पतालों का डेंगू जैसी बीमारी के इलाज में 16 लाख रुपय का बिल बना देना, चिकित्सा जैसे महान पेशे पर कई गंभीर सवाल खड़े करता है। निजी अस्पतालों कि मंहगे इलाज वाली समस्या को देखते हुए, वर्ष 2010 में निजी अस्पतालो के मँहगे इलाज पर काबू पाने के लिए ‘द क्लीनिक रजिस्ट्रेशन एंड रेगुलेशन एक्ट 2010’ तैयार किया गया था। फिर भी निजी अस्पतालो की मुनाफे वाली सोच के खिलाफ कड़े एक्शन नहीं लिए जाते हैं। यह कानून निजी अस्पतालो को तय रेट के हिसाब से बिल वसूलने के दिशा निर्देश देता है। यानि अस्पतालों में इलाज के लिए एक तय प्रक्रिया होनी चाहिए।

जिससे पता लग जाए कि कौनसा प्रोसीजर आपको कितने पैसे के बिल में मिलेगा। ऐसा इस बिल में प्रावधान रखा गया था। लेकिन यह कानून अभी तक सिर्फ देश के 7 राज्यों और 6 केंद्र शासित प्रदेशों में लागू किया गया है। डॉक्टरों की एक बहुत बड़ी लॉबी इसका बिरोध कर रही है और उन्होंने इसे सभी राज्यों में लागू नहीं होने दिया है। हमारे तन्त्र में स्वास्थ्य सेवाएं राज्य की जिम्मेदारियों में आती है, इसलिए केंद्र सरकार द्वारा लाए गए इस बिल पर फैसला राज्यों को लेना है। उत्तरप्रदेश, उत्तराखंड और बिहार जैसे राज्यों में इस कानून को सैद्धांतिक रूप से मान लिया है, लेकिन किसी भी राज्य द्वारा इसे अपनाने की प्रक्रिया अभी तक शुरु नहीं की गई है। इससे पता चलता है कि सरकारी तंत्र को लोगों के स्वास्थ्य की कितनी चिंता रहती है। एक गरीब आदमी को इस बात से कोई मतलब नहीं है कि स्वास्थ्य सेवाएं राज्य का विषय है या केंद्र का विषय है। एक गरीब आदमी सिर्फ यह चाहता है कि उसका बच्चा या वह खुद बीमार हो तो उसे आसानी से किफायती इलाज की सुविधा मिल सके। ऐसा न हो कि उसके ऊपर दबाव बनाकर 15- 20 लाख रुपए का बिल उसके हाथ में थमा दिया जाए। देश में चिकित्सा करने को एक सम्मानजनक पेशा माना जाता है, लेकिन दुख की बात यह है कि देश के निजी अस्पताल मरीजों के दर्द को दूर करने से ज्यादा पैसा कमाने का ज़रिया बन गए हैं।
सरकारी आंकड़ों को देखें तो देश के लगभग 29 फीसदी लोग गरीब हैं, यानी देश में हर 10 में से 3 लोग गरीब हैं । ग्रामीण इलाकों में 972 रू और शहरी इलाकों में 1407 रू से कम कमाने वाला व्यक्ति गरीब माना जाता है, तथा देश की प्रति व्यक्ति औसतन आय 8, 601 प्रति महीना है। जिस देश में हर 10 में से 3 लोग गरीब तथा प्रति व्यक्ति आय 8601 हो, उस देश में डेंगू के इलाज का बिल 16 लाख रुपए बनाना कितना जायज है। देश के निजी अस्पतालों के लिए यह समझना जरूरी है कि बेहतर और किफायती इलाज का हक गरीबों का भी है, क्योंकि उन्हें चिकित्सा का यह अधिकार देश का सिस्टम देता है, लेकिन ज्यादातर निजी अस्पताल उनके इस अधिकार को छीन लेते हैं। इसका मतलब यह नहीं है कि देश के सारे डॉक्टर बेईमान हो चुके हैं, लेकिन आज बड़ी संख्या में डॉक्टर ऐसे हैं जो सिर्फ पैसा कमाना चाहते हैं। उन्हें सोचना चाहिए कि 7-8 हजार रुपए कमाने वाला व्यक्ति 16 लाख रुपए कहां से लाएगा। लेकिन देश की चिकित्सा व्यवस्था के लोग बिल्कुल असंवेदनशील और असहनशील हो चुके हैं। मानवता की सेवा वाले मूड से निकल कर पैसे बनाने वाले फकीर बन गए हैं। अब उन्हें जान बचाने से नहीं, पैसा कमाने से संतुष्टि मिलती है। बड़े – बड़े बिजनेसमैनो ने अस्पतालों में निवेश कर उन्हें काली कमाई का जरिया बना लिया है। मेडिकल क्षेत्र में ऐसा बिजनेस मॉडल विदेशों में तो चल सकता है। जहां पर लोगों का मेडिकल एश्योरेंस होता है, लेकिन भारत जैसे देश में चिकित्सा को लग्जरी नहीं माना जा सकता है। देश के ज्यादातर निजी अस्पताल किसी बिल्डर या प्रॉपर्टी डीलर की तरह व्यवहार कर रहे हैं। देश की सरकार को उनके खिलाफ जल्दी से जल्दी उचित कार्रवाई करनी चाहिए ताकि देश के लोगों को 70 साल से जिस स्वास्थ्य के स्वराज का इंतजार है वह साकार हो सके।

अश्विनी शर्मा
काशी हिन्दू विश्वविद्यालय
विद्यार्थी पत्रकारिता एवं जनसंप्रेषण

[email protected]
8502053658

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