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आजादी का मतलब स्वच्छंदता नहीं है

15 अगस्त, 1947 को लाखों देशवासियों ने कुर्बानियां देकर ब्रिटिश शासन से आजादी प्राप्त की थी। हमारे देश में आजादी के अर्थ समय के साथ बदलते रहे है। सबने अपने-अपने ढंग से आजादी का मतलब निकाला है। गरीब आदमी के लिए आजादी का अर्थ गरीबी से आजादी है। अशिक्षित व्यक्ति के लिए आजादी का अर्थ अशिक्षा से आजादी है। राजनीतिक दलों के लिए आजादी का मतलब सत्ता प्राप्ति है। समाज के सभी वर्गों और व्यक्तियों के लिए आजादी के अलग-अलग मायने है, इस सब के बीच असहिष्णुता बेकारी, महंगाई, कालेधन और भ्रष्टाचार से आजादी के नारे सर्वत्र बुलंद हो रहे है। यही नहीं सत्ता और विपक्ष दोनों ने आजादी की परिभाषा अपने अपने तरीके से गढ़ ली है। आजादी के 70 वर्षों के बाद वर्तमान सत्तापक्ष कांग्रेस मुक्त भारत का सपना साकार करने में जुटा है वहीँ विपक्ष संघ मुक्त भारत की बात कर रहा है। युवाओं के लिए रोजगार की बाते गौण हो गई है। गरीब के लिए रोटी ,कपड़ा और मकान की बात दोयम हो गई है। महिलाओं की स्वतंत्रता कागजों में दफन हो रही है। सरकारी नौकर के लिए आजादी का अर्थ जेब भरना है। देश और समाज का हर पक्ष अपनी अपनी बात पर ढृढ़ता से कायम है। अपने कुर्ते को दूसरे के कुर्ते से अधिक उजला बताया जा रहा है। भ्रष्टाचार की विष बेल लगातार बढ़ती ही जा रही है। सहिष्णुता को कुश्ती का अखाडा बना लिया गया है। परस्पर समन्वय ,प्रेम, भातृत्व और सचाई को दर किनार कर घृणा और असहिष्णुता हम पर हावी हो रही है। आजादी के दीवाने चंद्रशेखर आजाद, भगत सिंह, तिलक, गाँधी, नेहरू, पटेल और लोहिया के सिद्धांतों और विचारों के अपने अपने हित में अर्थ निकाले जा रहे है। आजादी के बाद से कई दशकों तक सत्तासीन लोग सत्तासुख को अब तक नहीं भूल पाए है और राज करना अपना जन्म सिद्ध अधिकार मान रहे है। वहीँ नए सत्तासुख पाने वाले देश को असली आजादी और लोकतंत्र का धर्म सिखा रहे है। साम्प्रदायिकता को लेकर देश दो फाड् हो रहा है। सेकुलर शब्द की नयी नयी परिभाषाएँ गढ़ी जा रही है। दल बदलते ही कल के सेकुलर आज के सांप्रदायिक हो जाते है और सांप्रदायिक रातों रात सेकुलर बन जाते है। बलिहारी है भारत के लोकतंत्र की, इन सब के बावजूद गाँधी की दुहाई के साथ देश आगे बढ़ता जा रहा है।
आजादी के 70 वर्षों के बाद आज हमारा देश अपने देशवासियों की अंतरआत्मा को झकझौंर रहा है। जिस देश में दूध-दही की नदियां बहती थीं, जिसे सोने की खान कहा जाता था। सत्यमेव जयते जिसका आदर्श था। महापुरूषों और ग्रंथों ने सत्य की राह दिखाई थी। भाईचारा, प्रेम और सद्भाव हमारे वेद वाक्य थे। कमजोर की मदद को हम सदैव आगे रहते थे। भारत के आदर्श समाज और राम राज्य की विश्व में अनूठी पहचान थी। राजाओं के राज को आज भी लोग याद रखते हैं और यह कहते नहीं थकते कि उस समय की न्याय व्यवस्था काफी सुदृढ़ थी। राज के कर्मचारी आम आदमी को प्रताड़ित नहीं करते थे। सामाजिक और राजनीतिक व्यवस्था में नैतिकता थी। बुराई के विरूद्ध अच्छाई का बोलबाला था। महात्मा गांधी ने आजादी के बाद राम राज्य की कल्पना संजोई थी। प्रगति और विकास की ओर हमने तेजी से बढ़ने का संकल्प लिया था। पंचवर्षीय योजनाओं के माध्यम से चहुंमुखी विकास की ओर कदम बढ़ाये थे। सामाजिक क्रांति का बीड़ा उठाया था। ईमानदारी के मार्ग पर चलने की कस्में खाई थीं।
आजादी की आधी से अधिक सदी बीतने के बाद हमारे कदम लड़खड़ा रहे हैं। सत्यमेव जयते से हमने किनारा कर लिया है। अच्छाई का स्थान बुराई ने ले लिया है और नैतिकता पर अनैतिकता प्रतिस्थापित हो गई है। ईमानदारी केवल कागजों में सिमट गई है और भ्रष्टाचरण से पूरा समाज आच्छादित हो गया है।
आजादी के बाद निश्चय ही देश ने प्रगति और विकास के नये सोपान तय किये हैं। पोस्टकार्ड का स्थान ई-मेल ने ले लिया है। इन्टरनेट से दुनिया नजदीक आ गई है। मगर आपसी सद्भाव, भाईचारा, प्रेम, सच्चाई से हम कोसों दूर चले गये हैं। समाज में बुराई ने जैसे मजबूती से अपने पैर जमा लिये हैं। लोक कल्याण की बातें गौण हो गई हैं।
आजादी का मतलब स्वच्छंदता नहीं है। आजादी हमें अनुशासन का पाठ पढ़ाती है। आज हमारे जीवन मे अनुशासन की सख्त आवश्यकता है । अनुशासन जीवन के विकास का अनिवार्य तत्व है, जो अनुशासित नहीं होता, वह दूसरों का हित तो कर नहीं पाता, स्वयं का अहित भी टाल नहीं सकता। जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में अनुशासन का महत्व है। अनुशासन स्वतंत्रता प्रदान करता है जो व्यक्ति अनुशासित रूप से जीते हैं उन्हें स्वत ही विद्या, ज्ञान एवं सफलता प्राप्त होती है। आजादी के बाद हमने अनुशासन की भावना को तिलांजलि दे दी, जिसके फलस्वरूप देश पतन की गहरी खाई की और उन्मुख हो रहा है। हम बयानवीर हो गए। बात गाँधी की करते है और अनुशरण गोडसे का। हमारी कथनी और करणी विश्वसनीय नहीं रही है। जुबान काबू में नहीं है और स्वार्थ हम पर हावी हो गया है। हमें अपनी आजादी बचानी है तो अनुशासन को अपनाना ही होगा। किसी भी राष्ट्र की प्रगति तभी संभव है जब उसके नागरिक अनुशासित हों । यदि हम चाहते हैं कि हमारी आजादी अक्षुण्य रहे और समाज एंव राष्ट्र प्रगति के पथ पर निरंतर अग्रसर रहें, तो हमें अनुशासित रहना ही पड़ेगा । जब हम स्वयं अनुशासित रहेंगे, तब ही किसी दूसरे को अनुशासित रख सकेंगे । अनुशासन ही देश को महान बनाता है। प्रत्येक व्यक्ति का देश के प्रति कुछ कर्तव्य होता है, जिसका पालन उसे अवश्य करना चाहिए, क्योंकि जिस देश के नागरिक अनुशासित होते हैं, वही देश निरंतर प्रगति के पथ पर अग्रसर रह सकता है । यही हमारे लिए आजादी की सीख है।

– बाल मुकुन्द ओझा
वरिष्ठ लेखक एवं पत्रकार
क्.32, माॅडल टाउन, मालवीय नगर, जयपुर
मो.- 9414441218

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