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आज भी सुरक्षित नहीं है निर्भया

निर्भया कांड की चैथी बरसी पर राजधानी दिल्ली में गृह मंत्रालय का स्टिकर लगी कार में एक और युवती दुष्कर्म का शिकार हो गई। अखबारों में प्रतिदिन कोई ना कोई समाचार रेप या छेड़छाड़ का अवश्य आता है। 4 साल पहले दिल्ली के बेहद शर्मनाक निर्भया कांड के बावजूद दिल्ली ही नहीं समूचे देश में महिलाओं के विरुद्ध अपराध तेजी से बढ़ रहे हैं। निर्भया कांड पर जिस तरह से दिल्ली ही नहीं देश भर में विरोध के स्वर गूंजे थे और जिस तरह सरकारी, गैरसरकारी संगठनोें ने महिला अपराधों की रोकथाम के लिए जनचेतना से लेकर कानूनी प्रावधानों तक में बदलाव की चर्चाएं की थी, उपाय सुझाने-खोजने में लगे थे परिणाम तो ठीक उसके उलट ही आ रहे हैं। देश में महिलाओं के विरुद्ध अपराधों के जो आंकड़े सामने आये हैं वे सभ्य समाज के लिए शर्मनाक तो है ही बेहद निराशाजनक है। लगता है जैसे हमसे तो आदिम समाज ही ठीक था। प्राप्त आंकड़ों के अनुसार 2015 में देश में 34,651 मामलें रेप से संबंधित दर्ज हुए हैं। शरीर से छेड़छाड़ के मामलें देखे तो यही कोई 8 लाख से ज्यादा मामलें एक वर्ष में ही पुलिस के सामने आए हैं वहीं रेप के प्रयास के मामलों को देखे तो यह आंकड़ा एक लाख 30 हजार को पार कर रहा है। हांलाकि संतोष की बात यह है कि रेप के मामलों में 96 फीसदी मामलों में अदालत में चालान पेश करने के साथ ही 29 फीसदी मामलों मंे सजा भी सुनाई जा चुकी है। महिलाओं से छेड़छाड़ हो या मर्यादा हनन, अपहरण हो या क्रूरता सभी क्षेत्रों में ब़ढ़ोतरी होना इस बात का संकेत है कि देश आज भी महिलाओं के लिए सुरक्षित नहीं है। हांलाकि महिलाओं के प्रति अपराध में बढ़ोतरी के कई कारण है। यह भी सही है कि देश में कतिपय महिलाओें द्वारा महिला सुरक्षा के लिए बने कानून का दुरुपयोग व झूठे आरोप लगाने के मामलें भी तेजी से सामने आ रहे हैं। सभ्य समाज में महिलाओं के साथ छेड़-छाड, अभद्र व्यवहार या रेप जैसी घटनाएं बेहद चिंतनीय है। दिल्ली में निर्भया काण्ड के बाद देश भर में जिस तरह से महिलाओं के सम्मान के प्रति जनभावना और युवाओं का आक्रोश सड़कों पर दिखाई दिया, उससे लगा था कि अब संवेदनशीलता बढ़ेगी और असामाजिक तत्वों पर प्रभावी रोक लगेगी। पर आए दिन की घटनाओं और पुलिस द्वारा समय-समय पर जारी आंकड़ों ने तो इस स्थिति को पूरी तरह से झूठला ही दिया है। देश में समाज व युवाओं के विरोध के स्वर से आशा की किरण जगी थी पर पिछले दिनों देश के कोने-कोने में रेप की घटनाएं बेहद चिंतनीय है। अधिक चिंतनीय यह है कि रेप या इस तरह की घटनाआंें को राजनीतिक व सांप्रदायिक रुप दिया जाने लगा है और राजनीति व सांप्रदायिकता की आग में महिलाओें की इज्जत तार-तार होने के साथ ही सामाजिक ताने-बाने मे बिखराब आने लगा हैै। महिलाओं के प्रति अपराध विश्वव्यापी समस्या है। अमेरिका की जानी-मानी लेखिका और सामाजिक कार्यकर्ता ईव एंसलर ने पिछले वर्षों से अभियान चलाकर महिला अस्मिता के प्रति आवाज बुलंद की। वैजाइन मोनोलाॅग्स व गुड बाॅडी जैसे नाटकों की लेखिका वीडे नाम से एनजीओ का संचालन करने वाली ईव एंसलर ने बस, अब और नहीं, से अभियान का आगाज किया था। इस अभियान को वन बिलियन राइजिंग नाम दिया गया। करीब 200 देशों में हजारों गैरसरकारी संगठनों के सामूहिक प्रयासों से इस जागरुकता अभियान में भागीदारी निभाई। इस अभियान से जुड़कर सेलिबिट््री, युवक-युवतियों, सामाजिक कार्यकर्ताओं, लेखकों और वुद्धिजीवियों द्वारा महिला अस्मिता के लिए संघर्ष किया जा रहा है। हमारे यहां अनुष्का शंकर, नंदिता दास, राहुल बोस, फरहान अख्तर, जावेद अख्तर, मल्लिका साराभाई, शबाना आजमी आदि सामाजिक कार्यकर्ताओं व सेलिब्रिटिज ने महिलाओं के शोषण के विरुद्ध आवाज उठाई है। कानून में बदलाव और व्यवस्था में सुधार के प्रयास किए गए हैं पर यह अभी भी नाकाफी है। पुलिस प्रशासन द्वारा नए नए एप्स बनाने, जीपीएस व सीसीटीवी मोनेटरिंग सिस्टम शुरु किए जा रहे हैं। आज महिलाएं घर की चारदीवारी से बाहर निकली है, नए नए क्षेत्रों में सफलता के परचम पहरा रही है। कंपनियों में महिला डायरेक्टर की नियुक्ति की जा रही हैं पर इसका दूसरा पहलू यह भी है कि इतना सब होने के बाद भी महिलाओं के सम्मान को कदम-कदम पर ठेस भी पहंुचाई जा रही है। संयुक्त राष्ट्र् संघ के आंकडों के अनुसार दुनिया में हर तीन में से एक महिला का कभी ना कभी शारीरिक-मानसिक शोषण होता है। आंकड़ें वास्तव में चैकाने वाले हैं। दुनिया में 71 फीसदी महिलाएं शारीरिक-मानसिक या यौन शोषण व हिंसा का शिकार होती है। अमेरिका मंे प्रतिवर्ष बहुत बड़ी संख्या में महिलाएं अपने परिचितों द्वारा ही मार दी जाती है। दक्षिण अफ्रिका मंे हर 6 घंटे में एक महिला को उसके साथी द्वारा ही मौत के घाट उतार दिया जाता है। हमारे देश में 53 मिनट में यौन शोषण व 28 मिनट में अपहरण के मामलें सामने आते हैं। अब तो रेप व छेडछाड के मामलों में भी लगतार बढ़ोतरी हो रही है। यह आंकड़े भले ही अतिशयोक्तिपूर्ण हो पर इस तथ्य से इंकार नहीं किया जा सकता कि महिला अस्मिता को ठेस पहुंचाने के मामलें कम नहीं हो रहे हैं। तस्वीर का निराशाजनक पहलू यह है कि शिक्षा के प्रचार-प्रसार के बाद महिलाओं के अस्मत से खिलवाड, फब्तियां कसने, यौन शोषण, जबरन छूने, मानसिक कुंठा का इजहार करने के मामलें अधिक आए हैं। सबसे निराशाजनक यह कि टेलीविजन पर सर्वाधिक देखे जाने वाले सीरियलों में महिलाओं द्वारा महिलाओं के खिलाफ साजिशों को प्रमुखता से दिखाया जा रहा है जिससे मानसिकता प्रभावित हो रही है। महिलाओं के साथ होने वाले अपराधों खासतौर से रेप व छेड़छाड़ के मामलों में रिश्तेदारों या परिचितों का अधिक हाथ रहता है। कानूनी सख्ती व पुलिस की तत्परता के बावजूद इन मामलों में कमी नहीं आ पा रही है। यात्री अपने सामान की स्वयं सुरक्षा करे कि तर्ज पर महिलाओं को सुरक्षा के प्रति सावचेत करने से समस्या का अंत नहीं होने वाला है। रेप या रेप के बाद हत्या की घटना के बाद रास्ता रोकना, सरकारी गैरसरकारी संपत्ती को नुकसान पहुंचाना, कानून व्यवस्था को भंग करना या सांप्रदायिक रुप देना समस्या का समाधान नहीं हो सकता। इसके लिए सोच में बदलाव व कानून की सख्ती से पालना जरुरी है। न्यायालयों को इस तरह के प्रकरणोें को त्वरित निस्तारित करते हुए दोषियों में दहसत पैदा करनी होगी, तभी बात बनेगी। समस्या के मूल में छिपे मनोवैज्ञानिक व सामाजिक व्यवस्था के बिखराव के कारण को भी समझना होगा। सामाजिक संरचना को मजबूती प्रदान करनी होगी तथा शिक्षा के स्तर में इस तरह बदलाव लाना होगा कि एक दूसरे के सम्मान की रक्षा करना सीख सके। कहीं ना कहीं हमारी सामाजिक व्यवस्था में आ रहे बदलाव को भी इसके लिए दोषी माना जा सकता है।

डाॅ. राजेन्द्र प्रसाद शर्मा,
रघुराज, एफ-2, रामनगर विस्तार, चित्रांष स्कूल की गली,
ज्योति बा फूले काॅलेज के पास, स्वेज फार्म, सोडाला, जयपुर-19
फोन-0141-2293297 मोबाइल-9414240049

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