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” एक देश , एक कानून पर अमल हो “

देश में आज के दौर में कोई सबसे बड़ा बदलाव दिख रहा है। तो वह 1400 वर्षों बाद देश में मुस्लिम महिलाओं की सुदृढ़ होती सामाजिक स्थिति की ओर बढ़ता क़दम। महिलाएं जो सामाजिक औऱ धार्मिक प्रथा के नाम पर सामाजिक बुराई रूपी तीन तलाक के दंश से पीड़ित थी, उस समस्या से निजात दिलाने का प्रयास सार्थक रहा। अब इस समस्या के निदान के बाद भी कुछ सवाल ऐसे हैं, जिस पर राजनीतिक और सामाजिक स्तर पर बहस होनी चाहिए। देश में महिलाओं की स्थिति मात्र मुस्लिम समुदाय में ही नहीं बिगड़ी हुई हैं, आज हिन्दू समाज में भी तमाम कानून संवैधनिक स्तर पर होने के बावजूद कुरीतियां व्याप्त है, क्या उन पर हमारी लोकतांत्रिक प्रणाली विचार करने का माद्दा उठाएगी। आज दहेज़ प्रथा जीवन जीने की दिशा में सबसे बड़ी समस्या है। पैसे के अभाव में गरीब परिवार के लोग अपनी फूल जैसी नन्हीं बच्चियों को अभी भी देश के उड़ीसा, और पश्चिम बंगाल के गरीब इलाकों में बेचने को विवश हैं, क्या यह हिंदू समाज में व्याप्त सामाजिक कुरीतियां नहीं हैं। यह कुरीतियां तो 1400 वर्ष से भी पुरानी है। इस रवायत को समाज और देश से निकाला कब दिया जाएगा। कन्या भ्रूण हत्या देश में प्रतिबंधित होने के बाद भी चल रहा है। जब समाज की धुरी के खेवनहार स्त्री और पुरुष दोंनो हैं। फ़िर देश में स्त्रियों को आज के युग में भी अबला का प्रतीक क्यों माना जाता है। इन समस्याओं को गौर करें, तो पता चलता है, कि सामाजिक व्यवस्था को सुचारू रूप से चलाने में हम अपने आप को असमर्थ पाते हैं। अगर समाज में ऐसी सामाजिक बुराइयों को दूर करना है, तो समाज को भी अपनी नैतिक और सामाजिक जिम्मेदारी का एहसास होना चाहिए।

समाज में स्त्रियों की दशा हर तबकें के समाज की दयनीय है। फ़िर सुधार के लिए हर स्तर पर प्रयास हो। देश में समाज सुधार को मुद्दा बनाकर सत्ता में दाखिल हुई भाजपा ने समान नागरिक संहिता यानी यूनिफॉर्म सिविल कोड की बात भी की थी। क्या अब तीन तलाक पर परिणाम आने के बाद उस विषय पर भी चर्चा की बिसात बिछेगी? जब देश एक है। संविधान एक है। फ़िर मात्र संस्कृति, सभ्यता औऱ परम्परा के अलग होने के कारण देश में अलग-अलग कानून का सामना क्यों करना पड़ रहा है। आज एक देश एक राष्ट्र की बात होती है, फ़िर एक देश में कानून अलग-अलग क्यों? आज देश में धार्मिक सद्भाव की बात होती है, लेकिन अगर सभी धर्मों के कायदे-कानून अलग हैं, फ़िर कैसे माने, देश में एकता की लहर बह रहीं है। समान नागरिक संहिता का अर्थ होता है भारत में रहने वाले हर नागरिक के लिए एक समान कानून हो, चाहे वह किसी भी धर्म या जाति का क्यों न हो। समान नागरिक संहिता में शादी, तलाक और जमीन-जायदाद के बंटवारे में सभी धर्मों के लिए एक ही कानून लागू होना चाहिए। यूनियन सिविल कोड का निहितार्थ सभी धर्मों के लिए एक स्वतन्त्र और निष्पक्ष कानून है, जिसका किसी धर्म से कोई ताल्लुक नहीं है। फ़िर आज जब देश में संविधान की आत्मा की अन्तर्मना को देखते हुए एक देश एक कानून की बात होती है, फ़िर धार्मिक और नैसर्गिक स्वच्छन्दता का पाठ कहाँ से आ जाता है। आज देश में युवा पीढ़ी की फ़ौज तैयार हो चुकी है, फ़िर उस पर परम्परागत कानूनों को लादने का काम क्यों किया जा रहा। वैश्विक युग में समाज की उन्नति दकियानूसी सोच से नैया पार नहीं हो सकती, इसलिए समाज में सकारात्मक बदलाव की पहल होनी चाहिए, और जिसके भगीरथ युवाओं को स्वयं बनना होगा।

जब संविधान में समान नागरिक संहिता को लागू करने का ज़िक्र संविधान के अनुच्‍छेद 44 में राज्य की जिम्मेवारी बताया गया है, लेकिन ये आज तक देश में लागू नहीं हो पाया। इसके साथ संविधान सभा में काफी विचार-विमर्श के बाद संविधान के नीति निदेशक तत्वों में यह प्रावधान किया गया था कि राज्य सभी नागरिकों के लिए समान नागरिक संहिता लाने का प्रयास करेगा, लेकिन देश का राजनीतिक विदुर्प चेहरे और सामाजिक इच्छा शक्ति के अभाव में अभी तक इस कानून अमली जामा नहीं पहनाया जा सका। एक ओर समान नागरिक संहिता का मसला अगर धार्मिक पेचीदगियों की वजह से हमेशा संवेदनशील रहा है, तो सरकारों ने भी अभी तक चुनावी फायदे के लिए इस मुद्दे में हाथ डालना उचित नहीं समझा। 1995 में सुप्रीम कोर्ट ने समाज में बढ़ती सामाजिक कुरीतियों को दूर करने के लिए समान नागरिक संहिता पर जोर देते हुए कहा, कि इससे जहाँ महिलाओं की सामाजिक स्थिति में सुधार होगा, वहीं दूसरी ओर राष्ट्रीय एकता भी मजबूत होगी। किसी धर्म-समुदाय के खुद बनाए कानून स्वायत्तता नहीं, अत्याचार के प्रतीक हैं। भारत एक राष्ट्र है, कोई समुदाय मजहब के आधार पर स्वतन्त्र अस्तित्व का दावा नहीं कर सकता। फ़िर भी राजनीति और समाज अपने में आज तक कोई बदलाव लाने के लिए तैयार नहीं हुए।

एक धर्म-निरपेक्ष राज्य के लिए यह कहा से उचित है, कि उसे अलग-अलग कानूनों में बांधा जाए। आज अलग-अलग धर्मों के अलग कानून से न्यायपालिका पर भी बोझ बढ़ रहा है। समान नागरिक संहिता लागू होने से इस परेशानी से निजात मिलेगी और अदालतों में वर्षों से लंबित पड़े मामलों के फैसलों का निपटारा भी होगा। इसके साथ शादी, तलाक, गोद लेना और जायदाद के बंटवारे में सबके लिए एक जैसा कानून होगा फिर चाहे वो किसी भी धर्म का क्यों न हो। वर्तमान में हर धर्म के लोग इन मामलों का निपटारा अपने निजी कानूनों के तहत करते हैं। जो समानता, एकता, अखण्डता और धर्म-निरपेक्ष देश के लिए सही नहीं। इसके इतर अगर समान क़ानून होगा, तो देश का राजनीतिक दोहन होने से भी बचाव होगा, क्योंकि ऐसे में देश के भीतर वोटबैंक की छिछली राजनीति कमजोर पड़ सकती है।

सभी के लिए कानून में एक समानता से देश में एकता बढ़ेगी। भारत में जहां यूनिफॉर्म सिविल कोड को लेकर मात्र बहस चल रहीं है, वहीं पाकिस्तान, बांग्लादेश, मलेशिया, तुर्की, इंडोनेशिया जैसे कई देश इस कानून को अपने यहां लागू कर चुके हैं। फ़िर अगर भारत में यह क़ानून लागू होने का अहम रोड़ा यह अटकाया जा रहा है, कि सबपर हिंदू कानून लदा जा रहा है, फिर क्यों न राजनीतिक परिपाटी के लोग इस विषय पर सभी धर्मों के विद्वत्ता गणों के बीच बहस करवा कर देश, समाज हित के लिए कानून का निर्माण करें। जिससे एक देश में एक कानून का रास्ता साफ हो सके।

महेश तिवारी
स्वतंत्र टिप्पणीकार
(सामाजिक और राजनीतिक विषयों पर लेखन)
9457560896

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