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कन्नड़ न सीखने पर नौकरी छिनने का हक किसने दिया ?

कर्नाटक डेवलपमेंट अर्थोरिटी (केडीए) ने राष्ट्रीय ग्रामीण और प्राइवेट बैंकों के रीजनल हेड्स को अनिवार्य रुप से कन्नड़ भाषा के आदेश दिए हैं। आदेशानुसार, राज्य बैंकों में काम करने वाले गैर-कन्नड़ भाषी कर्मचारियों को छह महीनों के अंदर कन्नड़ भाषा सीखनी होगी। निर्धारित समय के बाद भी न सीखने पर किसी भी क्षण नौकरी से बर्खास्त कर दिया जायेगा। यह पहली बार नहीं हुआ है जब भाषा थोपने व सीखने के लिए किसी को बाध्य करने का प्रयास हुआ हो। हालांकि, इससे पहले भी पहले कर्नाटक की राजधानी बेंगलुरु में भी मेट्रो में कन्नड़ के बजाय हिंदी के इस्तेमाल को लेकर हंगामा खड़ा हुआ था।
सवाल उठता है कि कन्नड़ न सीखने पर नौकरी छिनने का हक किसने दिया ? क्या भाषा को इस तरीके से किसी पर नौकरी के दबाव में थोपने की धमकी देना जायज समझा जा सकता है ? बिलकुल, चाबुक की मार से शेर को कुर्सी पर बैठाने जैसा ही है। जिससे शेर कुर्सी पर बैठना तो सीख जायेगा लेकिन जो आदर और सहर्षता उसके मन में आनी चाहिए वो मार या दबाव से नहीं आ पायेगी। विपरीत, आक्रोश की चिंगारी जन्म लेगी। आज कहने के लिए तो हमारा देश आजाद है। हमारा अपना संविधान और लोकतंत्र है। हमें बैठने-उठने, खाने-पीने, रहने-घूमने की आजादी है। लेकिन, इसके विपरीत कड़वी सच्चाई यह भी है कि आज के हालातों में अपनी मर्जी से सांस लेना भी अपने हाथ में नहीं है। हमारी सोच आज भी गुलाम है। वस्तुतः हम बौद्धिक आपातकाल के दौर से गुजर रहे है। संकीर्णता हम पर हावी है और संकुचित भावनाएं भारतीयता के भाव को खत्म करती जा रही है। क्षेत्र-विशेष, धर्म, संस्कृति और भाषा के नाम पर लड़ाई थमने का नाम नहीं ले रही है। सत्तर साल बाद भी हम एक भाषा एक राष्ट्र के सपने को साकार नहीे कर पाये है। इस बीच क्षेत्रीय भाषाओं की तीव्र होती मांग एक नई चुनौती उभर कर आ रही है।
जरुरत इस बात है कि क्षेत्र भाषा पर अडियल रवैया छोड़कर हर किसी को राज्य भाषा हिंदी सीखने का प्रयास करना चाहिए। क्योंकि हिंदी देशभाषा है। यह हमें एक सूत्र में जोड़ती है। कन्नड़ न सीखने पर नौकरी छिन लेना, ए. आर. रहमान के कार्यक्रम में तेलुगू गानों पर हिंदीभाषी लोगों का उठ कर चले जाना, भाषा के आधार उत्तरी-पश्चिमी लोगों का दक्षिणी लोगों को देखकर खुद को उनसे अलग कर लेना, यह सब बेजा मुद्दे हैं जो विकसित बनने की राह में हमारे समक्ष बड़ी बाधा है। इनका समाधान आपसी सहमति और सुलह से किये बिना भारत का आगे बढ़ना कठिन है।
– देवेंद्रराज सुथार

(लेखक जयनारायण व्यास विश्वविद्यालय जोधपुर में अध्ययनरत है।)

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