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कब बूझेंगी भूखे पेट की आग ?

‘रोज कहर के बादल फटते है टूटी झोपड़ियों पर, संसद कोई बहस नहीे करती भूखी अंतड़ियों पर‘ कवि की ये पंक्तियां वर्तमान परिप्रेक्ष्य में सही साकार होती है। जिस देश में हर वर्ष दस लाख बच्चों की मौत कुपोषण के कारण होती है। जहां फसल खराब होने के कारण कृषक आत्महत्या करने पर विवश है। व्यापारी वर्ग कर्ज की मार झेल रहा है। तकरीबन 26 करोड़ की आबादी गरीबी रेखा से नीचे जीवनयापन करने को मजबूर है। और इससे आश्चर्यजनक बात क्या होगी कि भारत में घनघोर गरीबी एवं भुखमरी के हालातों के कारण मुर्दा बचने के लिए कानूनी संरक्षण उपलब्ध है। जहां देश के नौनिहाल बस्ता लेकर स्कूलोें में शिक्षा प्राप्त करने के लिए जाने चाहिए, वहां भुखमरी के कारण रेलवे स्टेशनों पर फेंके गये कुल्हड़ों से चाय की नमी चाटते मिले। जहां कलाहान्डी में भुखमरी के कारण किसी मां को अपनी बेटी का सौदा करने की जरूरत महसूस होने लगे। इसके विपरीत देश में सरकारी आयोजनों में लाखों रूपए खर्च होते है। सरकारी उपलब्धियों को बताने के लिए विज्ञापन भी लाखों में छपते है। नेता के जन्मदिन पर मंच करोड़ों का बनता है। उसी देश में भुखमरी की कई हृदय विदारक घटनाएं भी सामने आती है। अमीरों के व्यक्तिगत आयोजन भी जहां खबरों की सुर्खियां बनते है। वहीं गरीबों के साथ हुई घटनाएं दब-सी जाती है।

अभी हाल में अमेरिका के वाशिंगटन स्थित अंतरराष्ट्रीय खाद्य नीति अनुसंधान संस्थान ने वैश्विक भुखमरी सूचकांक की रिपोर्ट पेश की। जिसे सरल शब्दों में ऐसे समझा जा सकता है कि भुखमरी के लिहाज से कौन-सा देश किस स्थान पर है ? और यह आंकड़ा तैयार किया गया है, 119 विकासशील देशों के बीच अर्थात ऐसे देश जो विकास के मार्ग पर अग्रसर हैं या विकसित हो रहे हैं। अब प्रश्न यह उठता है कि इस वर्ष की रिपोर्ट में ऐसा क्या विशेष है ? तो विशेष नही अपितु आश्चर्यजनक है कि भारत का अंक 31.4 है और भारत का स्थान 119 विकासशील देशों में सौवाँ है। हमारे पड़ोसी देश नेपाल, म्यांमार, बांग्लादेश, श्रीलंका और चीन भी हमसे बेहतर स्थिति में हैं, यहाँ तक कि उत्तर कोरिया और इराक जैसे देश भी भुखमरी के मानदण्ड पर हमसे कही बेहतर है। गौरतलब है कि संस्थान द्वारा भुखमरी नापने के चार मुख्य पैमाने – कुपोषण, शिशुओं में भयंकर कुपोषण, बच्चों के विकास में रुकावट और बाल मृत्यु दर को सम्मिलित किया गया है।

यह आंकड़ा उस समय का है जब हम भारत को एशिया में सुपर पावर के तौर पर देखते हैं, अनेक नीतियों की और योजनाओं की बात करते हैं चाहे वह रक्षा के क्षेत्र में हो, शिक्षा के क्षेत्र में हो या चिकित्सा के क्षेत्र में हो। हमारे देश की अर्थव्यवस्था का 60 से 65 प्रतिशत हिस्सा कृषि पर निर्भर करता है और आबादी का लगभग उतना ही हिस्सा कृषि क्षेत्र से जुड़ा हुआ है। इतना ही नही भारत पूरे विश्व में दूसरा सबसे बड़ा खाद्य और अनाज निर्यातक देश है उसके बाद भी हम भुखमरी की सूची में अव्वल बने हुए हैं। तो यह अपने आप में मंथन योग्य बात ही है कि इतने संसाधन से सुसज्जित होने के बाद भी हमारी इतनी बदतर स्थिति क्यों हैं ? हम कहते हैं कि रोटी, कपड़ा और मकान मूलभूत आवश्यकताएं हैं और यदि भूख ही नही मिटती तो कृषि क्षेत्र में इतना सम्पन्न होने का कोई अर्थ नही है। जनता को असारा नेताओं का है। जनतंत्र में जनता ने ही इन्हे अपना वोट देकर संसद या विधानसभा भेजा है। संसद से आशाएं रहती है कि कम से कम चर्चा तो इन गरीबों के विषय में हो। महंगाई का आलम यह है कि पहले तो दाल रोटी खाते थे। दाल तो गायब हो गयी अब थाली में रोटी की बची है जो गायब होने की राह देख रही है।

साल 2030 तक भारत को भूखमुक्त करने का संकल्प लिया गया है लेकिन क्या मौजूदा हालात के मद्देनजर ये संभव हो पाएगा। इन संवेदनशील मुद्दे पर खास नजर रखने वाले पुरोधा कहते हैं कि भारत इस केस में पहले से सुधार पर है, हालांकि सुधार की गति काफी धीमी है लेकिन इसके बावजूद हम सुधर रहे हैं। हमारे यहां सरकार ने अनाज को सस्ता करने की कोशिश तो की है लेकिन वो सस्ता अनाज गरीबों के पेट तक कैसे पहुंचेगा, वहां वो फेल हो गई है। अनाज भंडारण क्षमता के अभाव में बेकार होता है अनाज एक सर्वे के मुताबिक देश का लगभग 20 फीसदी अनाज भंडारण क्षमता के अभाव में बेकार हो जाता है, तो अनाज का एक बड़ा हिस्सा लोगों तक पहुंचने की बजाय कुछ सरकारी गोदामों में, तो कुछ इधर-उधर अव्यवस्थित ढंग से रखने की वजह से सड़ जाता है। एक सच यह भी है कि जितना अनाज सरकारी गोदामों में सड़ने से खराब नहीं होता उतना तो चूहे खा जाते है। ऐसे में जिनके हाथ में देश का भावी भविष्य है, उनका वर्तमान काफी कमजोर, भूखा और कुपोषित है, जिसके लिए जल्द से जल्द कदम उठाने होंगे वरना कोई शक नहीं कि स्थिति बद से बदतर हो सकती।

सरकार को चाहिए ऐसी भीषण स्थिति में प्राथमिकता भूखे पेट की आग शांत करने में दे। देश में महापुरुषों की मूर्तियों में करोड़ों का धन खर्च करने से कई अधिक आवश्यक है कि देशवासियों की भूख मिटाना। क्योंकि विकास का रास्ता आमजन की सुख-सुविधा के मध्य से गुजरता है। इसलिए भूखे पेट की आग बुझाने के लिए सार्थक प्रयास किये जाने चाहिए।

– देवेंद्रराज सुथार

लेखक जयनारायण व्यास विश्वविद्यालय जोधपुर में अध्ययनरत है।
संपर्क – गांधी चैक, आतमणावास, बागरा, जिला-जालोर, राजस्थान। 343025

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