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कविता : करवाचौथ

हर रोज़ चांद ये निकलता है
पर क्यों आज ही ये ज़्यादा चमकता है
सुनो, आज करवाचौथ की है खास रात
तभी तो कुछ अलग चांद में भी है बात
देखो आज चांद भी इठला रहा है
खुद में ही शरमा रहा है
एक चांद आसमां पर
एक ज़मीं पर छा रहा है
प्यार,त्याग,समर्पण का यह अनूठा त्यौहार है
बांध देती है कसकर डोर,
तुच्छ इसके आगे सब उपहार हैं
छलनी से चमकता चांद देख
करती है सजनी उनसे यही मनुहार
रहे अखंड सौभाग्यवती वो
मिले सातों जन्म पिया का साथ व प्यार
प्रिय आज एक बात कहती हूं
तेरे लिए ही जीती ,तेरे लिए ही मरती हूं
चाहकर भी कभी ये बात बता ना पाई
मिले तुम तो मैं फूली ना समाई
जीवनसाथी से अच्छा भला कौन है
इस भरी दुनिया में बेहतर तुमसे कौन है
संबंधों को हर हाल में तुमने संजोया है
प्यार से मेरे आंचल को भिगोया है
सुखी संसार अपना रहे हर पल
तुमने साथ भी दिया है पल-पल
प्रेम, समर्पण सब कुछ मेरा
त्याग, बलिदान सब कुछ तेरा
यही तो चाहती हूं मैं बस
प्यार बना रहे हर पल तेरा-मेरा
निक्की शर्मा रश्मि
मुम्बई
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