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कविता : खून हो गया देखो आज

खून हो गया देखो आज
मानव के जीवन का
लाख धर्म निभाया मैंने
प्रकृति के नियम का

धरा काँपी जब पाप बढ़ा
कत्ल हुआ हर रिश्तों का
नातों की कोई परवाह नहीं
दुश्मन हुआ भाई भाई का

माँ का दर्द वो भूल गया
पत्नी की खातिर दारी में
नो माह जिसने दर्द सहा
वो तड़फ रही बिमारी में

सुन्दर प्यारा घर छोटा सा
माँ की पावन ममता जैसा
जहाँ पूजा माँ की होती थी
अब होती केवल कर्कशता

कोमल सुन्दर प्यारा सपना
निर्मल निर्झर वो था अपना
शीतल पावन गंगा जमुना
बहता पानी जल शीतलता

संजय कुमार गिरि

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