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कविता : गांव की पगडंडी

गांव की पगडंडी

गांव की वो धुँधली पगडंडी
रह रह कर याद आती है
हरे भरे खेतों के बीच
भीनी सी खुशबू समेटे
बलखाती इतराती
मेरे गाँव की पगडंडी
जो गवाह है
हज़ार पीढ़ियों के आवागमन की
परन्तु ये क्या?
खेतों की जगह अब
बड़े बड़े गोदाम
हज़ारों ट्रकों के बोझ तले
वही पगडंडी
दम तोड़ रही है
शायद मेरा देश बदल रहा है
हम मॉडर्न हो रहे हैं।

जे.बी.धानिया

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