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कविता : गिराह, गांठे

 

 

कितनी गिराह खोली है अभी
कितनी गांठे बाकी है ।
बंध गयी है रुह तक मेरी,
बस चलती बेजान सी एक जिन्दा लाश बाकी है।
पूरी तरह अब तो सिल चुके हैं होंठ मेरे,
मन में दबी हल्की आवाज या कोई चीख बाकी है ।
रुक गया है आंखो का सागर,
कुछ टूटे सपने और सूखे आंसू अभी बाकी है।
बन्द है ध्वनि मेरे दिल की,
बोझ सी किसी कोने की कोई धड़कन अभी बाकी है।
शान्त है मन में उठा सैलाब कोई,
अब तो विचारों में चिन्ह विराम लगता है बाकी है।
कितनी गिराह खोली है अभी,
कितनी गांठे बाकी है।

पूर्वा राठी

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