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कविता : छाछ राबड़ी भूल गया

स्वार्थी बणग्या सगळा, साख सम्बन्ध भूलग्या
पीसै लारै भाज्या फिरै, सेवा करणी भुभूलग्या ।
झूठ सूं व्यौपार चाले सच बोलणो भूलग्या
पेंट बुशर्ट पैरन लाग्या , धोती कुरतो भूलग्या ।
टिक टिक सूं करै हिसाब,पाटी पहाड़ा भूलग्या
होटला मैं जीमै झूठे, चटनी रोटी भूलग्या ।
मोट्यार लुगाई करै घुमाड़ा, मां बाप नै भूलग्या
काना बाती सूं करै बातां, कागद लिखणो भूलग्या ।
चाय काफी पीवैं लागया, छाछ राबड़ी भूलग्या ।

मंगल व्यास भारती
गढ़ के पास , चूरू राज

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