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कविता : प्यार पले

प्यार पले
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देह जले दिल जले रूह जले
गुलमोहर की सिंदूरी छांव तले
तेरा मेरा मेरा तेरा प्यार पले
मन की बगिया में फूल खिले
रेगिस्तान की रेत में नदियां चले
शीत ऋतु की चांदनी रात में
श्वेत अंबर की चदरिया थले
तेरा मेरा मेरा तेरा प्यार पले
देह जले दिल जले रूह जले
फिजा महके मंद-मंद पवन चले
पक्षियों के बीच हो गुफ्तगू
डाल-डाल पर कोयलिया बोले
बजने लगे प्रेम की इकतारा
रोम-रोम चंदन-सा बदन महके
घनेरी जुल्फों तले सुकून मिले
तेरा मेरा मेरा तेरा प्यार पले
देह जले दिल जले रूह जले
सूरज हो चले मद्धम मद्धम
मिलन की ऋतु हो लगे अगन
खामोश लब पैंजनिया शोर करे
मदहोशी के आलम में सुर सजे
तन की गिरिकन्दरा में रात ढले
तेरा मेरा मेरा तेरा प्यार पले
देह जले दिल जले रूह जले
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– देवेन्द्रराज सुथार

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