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कविता : भारत की बेटी

यह किसी अम्बानी की पुत्री तो नहीं लगती
ना जी, ना यह किसी अडानी की भी नहीं है
ना किसी माल्या की है
ना हीरे के व्यापारी किसी मोदी की है
ना किसी टाटा की
ना किसी बिरला की
किसी राजघराने की तो बिल्कुल ही नहीं लगती
किसी औधोगिक घराने की भी नहीं है
हो सके गाँव के मुखिया, सरपंच की
या पंचायत सचिव की होगी!
ना जी, किसी पार्षद की भी नहीं है
नहीं नहीं, विद्यायक की भी नहीं
ना किसी सांसद की लगती है
ना किसी मुख्यमंत्री की भी नहीं
ना किसी केंद्रीय मंत्री की है
फिर है किसकी बेटी ?
हाँ, यह भारत की बेटी है
जो सदियों से अभावग्रस्त
विकास से कोसों दूर
प्रकाश तो कभी रहा ही नहीं इसके हिस्से में
जीती रही शेष पर
जिसकी इस तस्वीर में
दिख रही है देश की सच्ची तस्वीर
जिसमें साफ साफ दिख रहा है दो देश
एक जो जगमग है
जो चकाचौंध से घिरा है
जो संस्कृति का ढ़िढोरा पिट रहा है
और लाखों दिए के रौशनी के आगे
चकमका देता है सच्चाई देखने वालों की आंखे
जैसे चकमका देती है आंखे
आईने से वापस आती रौशनी
ताकि नहीं दिख सके रौशनी के पीछे का सच
और दूसरे में बसता है
देश एक बड़ा तबका
जो अभिशप्त है जीने के लिए
इंसान और दीये के जूठन पर ।
सन्तोष पटेल
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