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कविता : मिड-डे मिल [ मध्याह्न भोजन]

खिचड़ी के खम्भा पर टिकी शिक्षा
गरीब बच्चों में बाँटती है दीक्षा
मध्याह्न भोजन जिसका मोल है
एक पंचर ट्रक के टोचन का
बस वही समझिए
दोपहर या मध्याह्न भोजन का
सरकारी पाठशाला में
शिक्षा के धर्मशाला में
गुरु जी के गौशाला में
जहाँ नाम की पढाई
नाम भर की लिखाई
और मध्याह्न भोजन में
नमक रोटी या खिचड़ी
पनछुछुर कढ़ी और छोले चावल
तो कहीं खिचड़ी के बोझ से दबी
हुई है शिक्षा/परीक्षा
गाँव के स्कूल में
गए यदि भूल से बच्चे
तो गनीमत होगी बन जाये चपरासी
या बस का खलासी
यही सरकार की है रीति
यही है नई शिक्षा नीति
शिक्षा का असली रूप है बन्द
प्राईवेट विद्यालय के खजाना में
जो दबा है भारी फीस तले
सरकारी स्कूल है बस नाम का
जहां खिचड़ी में डभकता है
कभी तिलचट्टा
तो कभी छिपकली
डभकते हैं ये सब
बच्चों के भविष्य के साथ साथ
तब भी अखबार, रेडियो
और अब तो टीवी पर कराया जाता है एहसास
दिखाया जाता है शिक्षा का विकास
सड़े हुए चावल और घुनाये हुए दाल से
खिचड़ी बनती है
नहीं तो नमक और रोटी का सहारा है
ऐसे ही मध्याह्न भोजन बंट रहा है
पठन पाठन घट रहा है
देकर नून रोटी मध्याह्न भोजन में
बनाया जा रहा है भारत का भविष्य
और भूख से भटक रहे
भारत के नौनिहाल शिष्य।

सन्तोष पटेल

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