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कविता : मेट्रीमोनियल

रविवार का दिन ,बचपन से
समाचार पत्रों में
शादी का विज्ञापन
देख अजीब लगता था
अब समझ में आता है
यह किसी की लाचारी है
तो किसी की मजबूरी
या पश्चिमी सभ्यता का प्रभाव
या असामाजिक होने का संकेत
हर जाति का एक लिस्ट ,डिटेल्स में
कभी कभी थोक में कभी रिटेल में
कभी कभी तो नो
कास्ट बार लिखा मिलता है
क्या कभी सोचा है
इसकी जरूरत क्यों है
क्या बताने की कोशिश है
क्या कभी किसी गरीब के
शादी का विज्ञापन देखा है
हो भी क्यों
वही तो बचा है एक सामाजिक प्राणी
जो संवेदना ढ़ोता हैं अपनापन बोता
हँसता है रोते रोते
सम्बन्धों को ढ़ोते ढ़ोते
नहीं तो बड़े बनने के नाम पर
समाज से दूरी बना कर जीने वाले
असंवेदनशील लोगों के पास
विज्ञापन ही तो एक सहारा है रोने का
या डर है अपना अस्तित्व खोने का
जिनके बच्चें न सामाजिक हो सके
ना ही पारिवारिक
फिर क्या एक मज़बूरी है
उन्हें समाज से जुड़ने की
या कोशिश है अपने अहंकार से
झुकने या मुड़ने की
ऐसे में बचाना है अपनापन
एक मात्र सहारा है विज्ञापन

डॉ मनोज कुमार
नरेंद्र मोहन हॉस्पिटल मोहन नगर
गाजियाबाद

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