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कविता : रावण की आग

जलता रावण पूछ रहा है
मानुष नाम के मूर्खों से ।
क्यों बनाकर खुद जलाते हो
तुम लड़ते हो क्यों मुर्दों से।।
कहता रावण हस-हस के
तुमसे तो मैं लाख भला था।
वो तो मरा हूं अपने अहंकार से
नहीं तो मैं कहां कुपथ पे चला था।।
सीता रही पतित पावन
छूआ न था मैंने उनको।
अब तो नारी लूटी जा रही
कब मारोगे तुम पापी मन को।।
हर हृदय में पाप की छाया है
कलि ने सभी को भरमाया है।
पर जल रहा है रावण अकेला
और लगा हुआ पाप का मेला।।

मुकेश सिंह
सिलापथार, असम
मो०- 09706838045

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