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कविता : लांघ कर अब तो आना होगा, कागज की दीवारों को

जंग नहीं हम लगने देगे, भारत की तलवारो को
लांघ कर अब तो आना होगा, कागज की दीवारों को
जो देखेगा स्वप्न यहाँ वो अपनी जिम्मेदारी पर
मौन बना इल्जाम ना देगा, कोई अब सरकारों को

आजादी से लेकर अब तक, हमने स्वयं चुनी सरकारे हैं
लोकतंत्र का गला घोटते, अपराधी हम सारे हैं
सौप दी सत्ता चुन कर हमने, दागी और हत्यारो को
लांघ कर अब तो आना होगा, कागज की दीवारों को

बरसातों में अक्सर हमने, कागज की कश्ती खूब चलायी है
बनकर केवट प्रभु राम को, गंगा पार करायी है
भारत को तुम राम बनाकर, धन्य करदो गंगा पार किनारो को
लांघ कर अब तो आना होगा, कागज की दीवारों को

जब किसी सिया को श्री राम जी, वन देकर राज संभालेंगे
तब अश्वमेध का अश्व रोक कर, लव कुश विजय पताका थामेंगे
सीता को भारत माँ समझो, लव कुश समझो सीमा पर पहरेदारो को
लांघ कर अब तो आना होगा, कागज की दीवारों को

तृष्णा की तृप्ति की खातिर, जब दुर्योधन चीरहरण करवाएगा
आदेशों में बंधा दुःशासन, कुलवधु को घसीट सभा में लाएगा
पुत्र प्रेम में अंधा शासक, देख न पायेगा अत्याचारो को
लांघ कर अब तो आना होगा, कागज की दीवारों को

प्रणपाश में बंधे हुए, भीष्म पितामह मौनव्रत की ढाल लिए
कृपाचार्य द्रोण उपस्थित, ऐसे ही संस्कार लिए
तब लाज बचाने भरी सभा में आना हैं, भगवान तेरे अवतारों को
लांघ कर अब तो आना होगा, कागज की दीवारों को

इतिहास के पन्ने लाया हूँ, कुछ बात तुम्हें समझाने को
स्वाभिमान से जीना सीखो, वरना तैयार रहो मर जाने को
अब जागोगे या कब जागोगे, ये निर्णय निर्धारित करता कर्त्तव्यों और अधिकारों को
लांघ कर अब तो आना होगा, कागज की दीवारों को

अखिलेश कुमार
देहरादून (उत्तराखण्ड)

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