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कविता : वैश्या

वैश्या

पेट की ज्वाला उसकी मजबूरी है
जीने की तृष्णा ने उसे यूं आसक्त कर रखा है
कि वह जीने के लिए रोज मर रही है
मरने को हर दिन संवर रही है।
खुद को जिंदा रखने को
वह भोग बन गई है।
अरमानों का रंग चढ़ाने को
मुर्दों सी तन गई है।
अपनी आहुति देकर
सहस्र कलियों को बचा रही है।
स्वयं कीचड़ में दबकर
वह अनेकों पुष्प कमल खिला रही है।
उसकी तो सौ परेशानियां हैं
वहशी काम के कीड़ों से
अंग अंग पर नोचे जाने की
तन पर जानें कई निशानियां हैं।
पर इस जवाने का
दस्तूर तो देखिये साहब
यहां मजलूमों के ही घर जलाये जाते हैं।
वैश्या कहते हैं उस गरीब को
और अपने हवस की लपटों से
वे चांदनी पर ग्रहण लगाये जाते हैं।

मुकेश सिंह
सिलापथार,असम (भारत)
[email protected]

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