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कविता : सब जान कर अनजान

किस कदर अनजान बना रहता है,
अब तुझमे इंसान कहाँ रहता है।

चेहरा तो रोज देखता है तू आईने में,
उसमे रूह का पाप कहाँ दिखता है।

आस्तीन पर कई दाग है अब तेरे,
यूँ लिहाफ बदलने से क्या होता है।

सबको पता है बहुत समझदार है तू,
यूँ नादान बने रहने से क्या होता है।

घाव तेरे अपने बहुत ज्यादा रिसते है।
फिर तू दूसरे के घाव क्यों कुरेदता है।।

सुना है दूसरे के लिए मरहम है तेरे पास,
उन्हें अपने जख्म पर क्यों ना रखता है।

दर्द देकर कहता है दर्द की दवा लाया है।
तुझपर ये मासूम चेहरा कहाँ जँचता है।।

अपनी आँखों से आंखें तो मिला आईने में,
आईना बोल सकता नही ,ये माना मैंने,
पर सबको तेरा मक्कार चेहरा दिखता है।

सब जानकर हमेशा ही अंजान बना रहता है।
तेरे नकली चेहरे का हुनर सबको दिखता है।।

नीरज त्यागी
ग़ाज़ियाबाद ( उत्तर प्रदेश ).

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