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कांशीराम की कर्मभूमि में खेल बिगाड़ सकता है बसपा-जनता कांग्रेस गठजोड़

रायपुर। बहुजन समाज पार्टी व जनता कांग्रेस ने शनिवार को बिलासपुर में संयुक्त रैली का आयोजन कर चुनावी बिगुल फूंक दिया है। मायावती और अजित जोगी की यह रैली कई लिहाज में महत्वपूर्ण मानी जा रही है। मायावती इस रैली के माध्यम से राज्य की राजनीति में गंभीर हस्तक्षेप करना चाहती हैं, जबकि अजित जोगी अपने ऊपर लगे भाजपा की बी-टीम होने के धब्बे को धोना चाहते हैं। मायावती और जोगी के बीच हुए गठबंधन में 35 सीटें बहुजन समाज पार्टी (बसपा) के खाते में आई हैं, जबकि 55 सीटें जनता कांग्रेस को मिली है।
जातिगत समीकरण के लिहाज से देखा जाए तो जोगी के पास जहां आदिवासी वोट की ताकत है, वहीं बसपा के पास दलित मतदाताओं का समर्थन है। ऐसे में कांग्रेस को बसपा से अलग चुनाव लड़ने का खामियाजा भुगतना पड़ सकता है। चर्चा यह भी है कि कांग्रेस को इस गठजोड़ से एक-डेढ़ दर्जन सीटों पर नुकसान हो सकता है। बीएसपी संस्थापक कांशीराम ने अपनी सियासी पारी का आगाज भी छत्तीसगढ़ से ही किया था। सन 1984 के आम चुनाव में कांशीराम ने जांजगीर लोकसभा सीट पर एक निर्दलीय के तौर पर चुनाव लड़ा था।
इस चुनाव में उन्हें सिर्फ 8.81 फीसदी वोट मिले था और उन्हें पराजय का सामना करना पड़ा था। कांग्रेस उम्मीदवार प्रभात कुमार मिश्रा ने 58.61 फीसदी मत हासिल कर जीत दर्ज की थी। एक नवंबर 2000 को मध्य प्रदेश से अलग होकर छत्तीसगढ़ ने नए राज्य के रूप में जन्म लिया। सन 2003 में हुए पहले राज्य विधानसभा चुनाव में बीएसपी ने 54 सीटों पर चुनाव लड़ा, जिनमें उसे सिर्फ 2 सीटों पर ही जीत हासिल हुई और महज 4.45 फीसदी वोट मिले। सिर्फ 54 सीटों की बात करें तो यहां बीएसपी को 6.11 फीसदी वोट प्राप्त हुए।
2013 के चुनाव में बीएसपी ने सभी 90 सीटों पर चुनाव लड़ा, लेकिन इस चुनाव में उसका वोट प्रतिशत और भी कम हो गया। बीएसपी को महज 4.27 फीसदी मत मिले। उसके टिकट पर एक ही विधायक निर्वाचित हो पाया। दिलचस्प बात यह है कि मायावती और अजित जोगी दोनों ही अनुसूचित जातियों के मसीहा होने का दावा करते हैं। इस बार दोनों ने हाथ मिलाया है। छत्तीसगढ़ की जनसंख्या के आधार पर देखा जाए तो यहां 10 सीटें अनुसूचित जातियों के लिए आरक्षित हैं। इन 10 सीटों में से 9 पर मौजूदा समय में कमल खिला हुआ है। बची एक सीट पर कांग्रेस उम्मीदवार जीता था।

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