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 कैंसर जैसी बीमारियों का छोटे शहरों में सस्ता इलाज, नीति आयोग ने जारी किया दिशानिर्देश

नई दिल्ली। नीति आयोग ने जिला स्तरीय सरकारी अस्पतालों में कैंसर जैसी ‘नॉन कम्युनिकेबल’ बीमारियों का इलाज उपलब्ध करने के लिए सार्वजनिक-निजी-भागीदारी (पीपीपी) मॉडल अपनाने का सुझाव दिया है। आयोग ने इस दिशा में कदम बढ़ाते हुए दिशा-निर्देश और मॉडल कंसेसन एग्रीमेंट (एमसीए) जारी किए हैं। राज्यों ने अगर इन पर अमल किया तो कैंसर, डाइबिटीज, स्ट्रॉक और दिल की बीमारी जैसी कर्ज मजरें का इलाज छोटे कस्बों के जिला स्तरीय सरकारी अस्पतालों में हो सकेगा।
गुरुवार को नीति आयोग में स्वास्थ्य संबंधी मामलों के प्रभारी सदस्य डॉ. वी के पॉल ने ये दिशा-निर्देश जारी करते हुए कहा कि पीपीपी मॉडल में इलाज की लागत आयुष्मान भारत योजना के तहत आने वाली लागत के बराबर ही होगी। आयोग ने ‘नॉन कम्युनिकेबल डिजीज के इलाज में पीपीपी संबंधी जो दिशानिर्देश जारी किए हैं उसमें चार पीपीपी मॉडल सुझाए गए हैं। पहला मॉडल ‘मैनेजमेंट कान्ट्रैक्ट’ का है जिसके तहत जिला स्तरीय सरकारी अस्पताल के बने हुए भवन निजी पार्टी को दिया जा सकेगा और निजी साझीदार वहां उपकरण और डाक्टरों की तैनाती कर देगा। यह 10 से 15 वर्ष की अवधि के लिए होगा और इसके तहत जो भी लाभार्थी इलाज कराएंगे उस पर आने वाले खर्च का एक निश्चित हिस्सा सरकार निजी कंपनी को भुगतान करेगी।
दूसरा मॉडल ‘परचेजिंग ऑफ सर्विसेज’ का है जो एक से तीन वर्ष की अवधि के लिए होगा और यह स्वास्थ्य बीमा की तर्ज पर काम करेगा। इसका मतलब यह है कि लोग नॉन-कम्युनिकेबल डिजीज का इलाज प्राइवेट से करा सकते और इसके बदले में सरकार उन्हें निश्चित भुगतान करेगी। तीसरा मॉडल ‘बिल्ड, ऑपरेट एंड ट्रांसफर’ यानी बीओटी मॉडल है जिसके तहत सरकार प्राइवेट पार्टी को जमीन देगी। निजी कंपनी इसपर अस्पताल बनाएगी और सरकार इस व्यवसायिक रूप से लाभप्रद बनाने के लिए वाइविलिटी गैप फंडिंग देगी। इसके तहत समझौता 30 साल के लिए होगा। चौथा मॉडल ‘कोलोकेशन मॉडल’ है जिसके तहत सरकारी अस्पताल में प्राइवेट पार्टियों को एक अलग फेसिलिटी बनाने की अनुमति दी जाएगी। यह समझौता 15 वर्ष के लिए होगा। यहां जो मरीज सरकारी अस्पताल से आएंगे उनके इलाज का खर्च खुद सरकार उठाएगी जबकि अन्य मरीजों से ये अस्पताल पैसा वसूल सकेगा। आयोग ने स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय और विश्व बैंक के साथ मिलकर पीपीपी मॉडल के दिशा निर्देश तय किए हैं।
भारत में कैंसर जैसी नॉन कम्यूनिकेबल बीमारियों के कहर का अंदाजा इस तथ्य से लगाया जा सकता है कि देश पर बीमारियों का जितना बोझ है उसका 55 प्रतिशत ऐसी ही बीमारियों की वजह से है। विश्व स्वास्थ्य संगठन की वर्ष 2015 की एक रिपोर्ट भी बताती है कि भारत में हर साल 58 लाख लोगों की मौत हृदय की बीमारी, फेंफड़े संबंधी बीमारी, कैंसर और डायबिटीज जैसी नॉन कम्युनिकेबल बीमारियों की वजह से होती है।

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