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कैसे रूक पायेंगे रेल हादसे ?

शनिवार सांयकाल पुरी से हरिद्वार के बीच चलने वाली कलिंग-उत्कल एक्सप्रेस रेल दुर्घटनाग्रस्त हो गयी थी जिसमे अब तक 24 लोगों के मारे जाने की सूचना है जबकि 156 अन्य घायल हो गए हैं। हादसा उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर जिले के खतौली के पास हुआ है। बताया जा रहा है कि रेलवे ट्रैक की मरम्मत का काम चल रहा था जिसके ऊपर से ट्रेन गुजरी और 14 बोगियां पटरी से उतर गईं। एक बोगी तो रेल टै्रक के पास बने एक घर में जा घुसी। जिससे उस घर के लोग भी घायल हुए हैं। दुर्घटना के चश्मदीदों के मुताबिक यह रेलवे विभाग की लापरवाही का नतीजा है। फिलहाल रेल मंत्री ने हर बार की तरह इस बार भी इस रेल दुर्घटना की जांच के आदेश दे दिये है व इस मामले में जांच रिपोर्ट आने के बाद ही कुछ साफ तौर पर कहा जा सकेगा।
केंद्र में मोदी सरकार आने के बाद तीन साल में यह 8 वीं बड़ी रेल दुर्घटना है। इस दुर्घटना के साथ ही रेलवे सुरक्षा को लेकर एक बार फिर से बड़े सवाल खड़े हो गए हैं। लेकिन मूल प्रश्न फिर भी अपनी जगह बना हुआ है कि आखिर रेल दुर्घटनाएं रुकेगी कैसे? क्या सरकार केवल कारण बताकर वह अपनी जिम्मेदारी से हाथ झटक सकती है ? लगातार हो रही रेल दुर्घटनाओं के कुछ कारण दिखाई देते हैं, मसलन कमजोर अधोसंरचना, मानवीय भूलें, पटरियों का सुचारू रखरखाव न होना आदि। हैरत यह देखकर होती है कि तकनीकी विकास का दावा करने के बावजूद गर्मी में ट्रैक का फैलना और सर्दियों में संकुचन होना, रेलवे के इंजीनियरिंग विभाग के लिए बड़ी समस्या है। अगर तकनीकी पहलू सुधारने की बात की जाए तो धन की कमी का रोना रोया जाता है। 2015 में एक मूल्यांकन में बताया गया था कि 4,500 किलोमीटर रेलवे ट्रैक को दुरुस्त करने की जरूरत है, लेकिन धन की कमी के कारण ये नहीं हो पा रहा।
भारतीय रेल में सुधार की तमाम सिफारिशें लंबे समय से फाइलों में धूल फांक रही हैं और रेल हादसे बदस्तूर जारी हैं। धन और कर्मचारियों की कमी रेल सुरक्षा की राह का सबसे बड़ा रोड़ा बन गया है। गत वर्ष कानपुर में हुए रेल हादसे ने भारतीय रेल और इसके डिब्बों की लचर हालत का खुलासा कर दिया था। रेलवे ने सुरक्षा के लिहाज से इंटीग्रल कोच फैक्ट्री में बने डिब्बों को एलएचबी डिब्बों से बदलने की योजना बनाई थी। लेकिन यह गति इतनी धीमी है कि इसमें रेलवे को कम से कम 30 साल लग जाएंगे। एलएचबी डिब्बे फिलहाल राजधानी और शताब्दी एक्सप्रेस जैसी ट्रेनों में ही लगे हैं। सुरक्षा उपायों की वजह से हादसे की स्थिति में ऐसे डिब्बे एक दूसरे के ऊपर नहीं चढ़ते। कानपुर में एक-दूसरे पर डिब्बे चढ़ जाने की वजह से डेढ़ सौ यात्री मौत के मुंह में समा गए थे। केंद्र सरकार और रेल मंत्रालय ने अतीत में होने वाले हादसों से कोई खास सबक नहीं लिया है। ट्रेनों में यात्री सुरक्षा के तमाम दावों के बावजूद हकीकत इसके उलट है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बीते साल रेलवे नेटवर्क को बेहतर बनाने की महात्वाकांक्षी योजना के तहत पांच साल के दौरान साढ़े आठ खरब रुपए के निवेश का एलान किया था। बावजूद इसके ट्रेन हादसे थमने की बजाय बढ़ते ही जा रहे हैं।
रेलवे में सुरक्षा का कामकाज देखने वाले कर्मचारियों के 1 लाख 27 हजार पद खाली पड़े हैं। नतीजतन बाकी कर्मचारियों पर काम का भारी दबाव है। इससे भी रेल हादसे बढ़े हैं। रेल मंत्रालय ट्रेनों और पटरियों की सुरक्षा बढ़ाने के चाहे जितने उपाय कर ले, कर्मचारियों की भारी कमी की वजह से उनको जमीनी स्तर पर लागू करना संभव नहीं होगा। इसके चलते हादसों पर अंकुश नहीं लगाया जा सकेगा। भारत में 2016 में छोटे-बड़े 80 हादसे हुये थे जबकि 2015 में 69 रेल हादसे हुए थे। 2014-15 में 131 रेल हादसे हुए और इसमें 168 लोग मारे गए। 2013-14 में 117 ट्रेन हादसे हुए और इसमें 103 लोग मारे गए थे। 2011-12 में जो 115 रेल दुर्घटनाएं हुर्इं, उनमें से 87.78 फीसद मानवीय भूल के कारण हुर्इं। 2014-2015 में 60 फीसदी रेल दुर्घटना ट्रेनों के पटरी से उतरने के कारण हुई थी।
दुनिया के सबसे बड़े रेल नेटवर्क में से एक भारतीय रेल नेटवर्क में हर रोज सवा दो करोड़ से भी ज्यादा यात्री सफर करते हैं जबकि 87 लाख टन के आसपास सामान ढोया जाता है। कुल 64,600 किलोमीटर रूट के ट्रैक पर जरा-सी चूक लाखों लोगों की जान को जोखिम में डाल सकती है। ऐसे में इन पटरियों पर यात्रियों और इनके आसपास से गुजरने वालों की सुरक्षा पर खास ध्यान देने की जरूरत से इनकार नहीं किया जा सकता। लेकिन यह हो नहीं पाता और यही वजह है कि हर साल हादसों का सामना करना पड़ता है। रेलवे विभाग में होने वाले हादसों पर अब तक के मनन-मंथन के बाद यह पाया गया है कि 80 फीसद दुर्घटनाएं मानवीय चूक के कारण होती हैं।
भारत में जब भी कोई रेल दुर्घटना होती है मुआवजे की घोषणा कर उसे भूला दिया जाता है। हमें इस प्रवृत्ति से बाहर आना होगा। रेलवे सुरक्षा के कई पहलू होते हैं लेकिन प्रबंधन के स्तर पर सभी पहलू जुड़े रहते हैं। होता यह है कि रेलवे विभाग रेल सेवाओं में तो वृद्धि कर देता है परन्तु सुरक्षा का मामला उपेक्षित रह जाता है। रेलवे सुरक्षा और सेवाओं के मध्य समुचित संतुलन बनाए जाने की जरुरत है। अब समय आ गया है जब भारतीय रेलवे सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता प्रदान करें, नहीं तो फिर रेल दुर्घटनाओं का सिलसिला यूं ही चलता रहेगा व लोग आये दिन किसी और रेल दुर्घटना पर चर्चा करते दिखेंगें।

आलेख:-
रमेश सर्राफ धमोरा
स्वतंत्र पत्रकार

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