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कैसे हो वन्य जीवों का सरंक्षण

दुनिया में विभिन्न समुदायों ने अपने ज्ञान , अनुभव व विवेक , लोक सांस्कृतिक परम्पराओं और मूल्यों से ऐसी व्यवस्था को जन्म दिया है जिसके कारण न केवल जंगल बचे रहे वरन आर्थिक सांस्कृतिक और पर्यावरणीय तंत्र भी सुरक्षित रहे । वह टिकाऊ विकास और जलवायु परिवर्तन को बेअसर करने वाली बेहतर व्यवस्था थी ।
देखा जाए तो प्राकृतिक धरोहरों को देवी -देवताओं से जोड़कर सरंक्षित करने की परंपरा वैदिक काल से पहले की है। राजस्थान में भी कई इलाकों में ओरण की जमीन तक लोक देवी-देवताओं के नाम होती थी । जहां से पेड़ कोई नहीं काटता था और न ही किसी जीव का शिकार किया जाता था । इंटरनेशनल यूनियन फ़ॉर कंजर्वेशन ऑफ नेचर ने भी इसे प्रकृति की पूजा करने का अनोखा तरीका माना । साथ ही राजस्थान में संत जाम्बोजी व राजाराम सहित कई संतों व अमृता देवी विश्नोई का वनों व वन्य जीवों के प्रति योगदान इतिहास के अमिट पन्नों पर दर्ज है।
लेकिन चिंता की बात यह है कि आज लोक मूल्यों के क्षीण होने व जलवायु परिवर्तन के बीच देवी देवताओं के ये वन पूरी तरह दुनिया के साथ-साथ भारत से भी खत्म होते जा रहे है। ओरण व गोचर के उजड़ जाने से यहां की जैव-विविधता प्रभावित हो रही है ।
आज धरती के साथ मानव का निष्ठुर व्यवहार बढ़ता जा रहा है जो कि जीवों के अस्तित्व के प्रतिकूल है। वैज्ञानिकों का कहना है कि बारह हजार वर्ष पहले होलियोसिन युग धरती पर मानव सभ्यता ने जन्म लिया। इसमें मौसम चक्र स्थिर था, इसलिए स्थलीय और जलीय जीव पनप सके। लेकिन बीसवीं सदी के मध्य से जिस तरह परमाणु ऊर्जा के प्रयोग का दौर शुरू हुआ है और बड़े पैमाने पर जंगलों की कटाई हो रही है उससे होलियोसिन युग की समाप्ति का अंदेशा बढ़ गया है। उसी का असर है कि आज वन्य जीव अस्तित्व के संकट से गुजर रहे है।दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि जीव-जंतुओं को बचाने की चिंता संगोष्ठियों के दायरे में ही सिमट कर रह जाती है। मानव सभ्यता के उद्भव से लेकर आज तक वैश्विक स्तर पर लगभग 95% बाघों के और 90% हाथियों के आवास क्षेत्र नष्ट किये जा चुके है । यह आंकड़ा अपने आप में बहुत कुछ बयां करता है ।
विडंबना यह कि एक ओर प्राकृतिक आपदाओं से जीव-जंतुओं की प्रजातियां नष्ट हो रही हैं, वहीं रही-सही कसर इंसानी लालच और उसका शिकार का शौक पूरा कर दे रहा है। हाल ही में इंटरनेशनल फंड फॉर एनिमल वेलफयर ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि पिछले एक दशक में प्रतीक के लिए दुनिया भर में सत्रह लाख वन्य जीवों का शिकार (ट्राफी हंटिंग) किया गया। इनमें दो लाख विलुप्तप्राय जीव हैं।
वर्ल्ड वाइल्ड फंड की एक रिपोर्ट बताती है कि 2020 तक धरती से दो तिहाई वन्य जीव खत्म हो जाएंगे। इस रिपोर्ट में कहा गया है कि दुनिया भर में हो रही जंगलों की अंधाधुंध कटाई, बढ़ते प्रदूषण और जलवायु परिवर्तन के कारण पिछले चार दशकों में वन्य जीवों की संख्या में भारी कमी आई है। गौरतलब है कि खत्म हो रहे जीवों में जंगली जीव ही नहीं बल्कि पहाड़ों, नदियों व महासागरों में रहने वाले जीव भी शामिल हैं।
यह रिपोर्ट बताती है कि भारत में 41 फीसद स्तनधारियों, 46 फीसद सरीसृपों, 57 फीसद उभयचरों और नदी-तालाबों की 70 फीसद मछलियों पर विलुप्त होने का खतरा मंडरा रहा है। भारत में जीवों के संरक्षण के लिए कानून बने हैं। जिसमें 1972 का वन्य जीव सरंक्षण अधिनियम सबसे प्रमुख है। इसके बावजूद जीवों का संहार जारी है।
वन्य जीवों पर संकट के कारणों में मुख्यतः
वायुमंडल के तापमान का बढ़ना, प्रदूषण का बढ़ता स्तर,वन्य जीवों के अंगों की तस्करी , जंगलों तथा भूमि का व्यापक कटाव, मनुष्यों की अदूरदर्शिता, क्लोनिंग व जैव तकनीक का बढ़ता प्रयोग तथा उच्च स्तरीय और कीट-प्रतिरोधी बीजों का विकास आदि हैं।
कुछ संरक्षित वन्य क्षेत्रों से मुख्य सड़क तथा रेल लाइन भी गुजर रही है। इन परिस्थितियों के कारण भी वन्य जीवों के प्राकृतिक वास में व्यवधान उत्पन्न होता है। दरअसल, जब जीवों का प्राकृतिक वास जंगल नष्ट होने लगता है तो वह अपने प्राकृतिक वास से बाहर निकल आसपास स्थित खेतों व गांवों में घुस आते है तथा घरेलू पशुओं और लोगों पर हमला बोलते है । इस तरह की घटनाओं से मानव-वन्य जीव संघर्ष होता है तथा इससे हमारे पारिस्थितिक तंत्र पर गहरा प्रभाव डालता है।
इसके अतिरिक्त प्राकृतिक आपदाएं, विभिन्न प्रकार के रोग, जीवों की प्रजनन क्षमता में कमी भी प्रमुख कारण हैं। साथ ही मवेशियों को दी जाने वाली डिक्लोफिनाक नामक दवाई की वजह से भारत में ही पिछले एक दशक में पर्यावरण को बनाए रखने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले गिद्धों की संख्या में 97 फीसद की गिरावट दर्ज की गई है। गिद्धों की कमी से मृत पशुओं की सफाई, बीजों का प्रकीर्णन और परागण कार्य बुरी तरह प्रभावित हो रहा है और किस्म-किस्म की बीमारियां तेजी से पनप रही हैं। पक्षी विभिन्न रसायनों और जहरीले पदार्थों के प्रति अतिसंवेदनशील होते हैं। ऐसे पदार्थ भोजन या त्वचा के माध्यम से पक्षियों के अंदर पहुंच कर उनकी मौत का कारण बनते हैं। इसके अलावा लोग सजावट, मनोरंजन और घर की शान बढ़ाने के लिए तोते और रंग-बिरंगी गौरैया जैसे पक्षियों को पिंजरों में कैद रखते हैं। इसके साथ ही, तीतर जैसे पक्षियों का शिकार भी किया जाता है।
दरअसल, जब भी जीवों के संरक्षण की योजनाएं बनती हैं तो बाघ, शेर तथा हाथी जैसे बड़े जीवों के संरक्षण पर तो ध्यान दिया जाता है, लेकिन अन्य जीवों के संरक्षण को अपेक्षित महत्त्व नहीं दिया जाता। बाघों को बचाने के लिए आवश्यक है कि खाद्य श्रंखला के निचले क्रम के जीवों को हम सरंक्षित किया जाए। जब तक उन निचले क्रम के जीवों को सरंक्षित नहीं करेंगे उनसे सम्बन्धित योजनाओं को क्रियान्वित नहीं करेंगे तब तक ऊपर के क्रम के जीवों को बचाना लगभग नामुमकिन है । अतः उनके लिए भी सरकार को ठोस योजनाएं बनानी होंगी।
आज वन्यजीवों के शिकार और अंतरराष्ट्रीय बाजार में उनकी तस्करी का एक उच्चस्तरीय जटिल तंत्र है। दरअसल, इन वन्य जीवों के शिकारी जीवों के अंगों को महंगी कीमतों पर बेचते हैं। इसमें आदिवासी तो मात्र मोहरा मात्र होते हैं ।
एक तरफ जहां आदिवासी का पूरा अस्तित्व ही जल-जंगल-जमीन पर आधारित होता है, अत: वनों को संरक्षित क्षेत्र घोषित कर वहां से आदिवासियों को बलात निष्कासित कर दिया जाता है । ऐसे में अगर ये खदेड़े गए आदिवासी अपने अस्तित्व की रक्षा के लिए इन संरक्षित वन्य क्षेत्रों में अपने परंपरागत अधिकारों का दावा करते हुए सरकार की नजरों में अनधिकार हस्तक्षेप करते हैं, तो उन्हें वन्यजीवों और वन्य पशुओं का शत्रु घोषित कर दिया जाता है।
आजादी के बाद भी विदेशी सत्ता द्वारा स्थापित आदिवासी विरोधी वन कानून बदस्तूर जारी हैं। जिससे आदिवासी आज भी वन रक्षकों और पुलिसवालों के उत्पीड़न के शिकार हो रहे हैं। अब यह समझने की जरूरत है कि जैव विविधता को बचाने के लिए आवश्यक है कि जीवों को बचाया जाए। जैव विविधता एक ऐसा प्राकृतिक संसाधन है जो यदि एक बार समाप्त हो गया तो उसे दोबारा नहीं बनाया जा सकता।
अतः अस्तिव के संकट में फंसे जीवों को बचाने के लिए जरूरी है कि धरती के बढ़ते तापमान और प्रदूषण की रोकथाम की ठोस पहल हो । लिहाजा, उनके संरक्षण के लिए विशिष्ट परियोजनाएं बनाई जाएं तथा वनों की अंधाधुंध कटाई पर रोक लगे। इसके अलावा, वन क्षेत्र को कम करके कृषि विस्तार की योजनाओं पर भी रोक लगनी चाहिए। ‘स्थानांतरण खेती’ (झूम कृषि) को नियंत्रित किया जाए तथा यदि संभव हो तो उसे समाप्त ही कर दिया जाए। नगरों के विकास के लिए भी वनों की कटाई पर रोक लगनी चाहिए। एक अनुमान के मुताबिक वैश्विक समुदाय विकास के नाम पर प्रत्येक वर्ष सात करोड़ हेक्टेयर वनक्षेत्र का विनाश कर रहा है। हमने अपने स्वार्थ के लिए भारत के सम्पूर्ण भूभाग का दोहन किया और वन्य जीवों को मात्र 4 प्रतिशत भूभाग पर सीमित कर दिया । और अभी भी उस उस 4 प्रतिशत भूभाग पर नजरें गड़ाये बैठे है । लगभग 96 फीसद भूभाग पर हम सही ढंग से विकास कर नहीं पाए है जिसकी वजह से बाढ़ की बारम्बारता जैसी कई चुनौतियां हम झेल रहे है । लेकिन सरकारों का तर्क रहता है कि यदि वन्य जीव आरक्षित क्षेत्र में से कुछ हिस्सा मिल जाये तो वह उस क्षेत्र विशेष पर विकास का कीर्तिमान स्थापित कर देंगे। लेकिन यह सिर्फ उनका भ्रम मात्र है ।

अब समय आ गया है कि वन्य जीव आरक्षित क्षेत्रों के आस-पास निर्माण गतिविधियों पर पूर्णतया प्रतिबन्ध लगाया जाए और आर्थिक हितों के लिए वन संसाधनों की बलि चढ़ाना बन्द की जाए। क्योंकि मानव सभ्यता में प्राकृतिक संसाधनों पर जितना हक मनुष्य का है उतना जानवरों का भी है ।
हालांकि इस बीच सुखद पहलू यह है कि जलवायु परिवर्तन के खतरों को बेअसर करने की वन्य जीव सरंक्षण की देशज व्यवस्था को फिर से जीवित करने पर अब दुनिया का ध्यान जा रहा है । जिसके तहत युनेस्को ने कुछ क्षेत्रों को विश्व धरोहर सूची में शामिल किया है ।

देश में भी आदिवासी समुदायों को विश्वास में लिये बिना, प्रकृति विषयक उनके ज्ञान का सम्मान किए बिना वनों और वन्य जीवों का संरक्षण असंभव है। संरक्षित वन्य क्षेत्र के नाम पर अपने पुरखों के जंगलों, खेतों और घरों से विस्थापित किए गए आदिवासियों और स्थानीय ग्रामीणों को उनकी क्षमता, रुचि और सभ्यता-संस्कृति के अनुरूप वैकल्पिक रोजगार और पुनर्वास उपलब्ध कराए जाने चाहिए । साथ ही वन्य जीवों और वन्य उत्पादों के गैर-कानूनी व्यापार पर नियंत्रण लगाने के लिए सरकार को इस व्यापार के कर्ताधर्ता ठेकेदारों, व्यापारियों और तस्करों पर लगाम लगाना चाहिए। कुछ राज्यों में वन्य जीवों को विधिक व्यक्ति की मान्यता दी गयी है जो एक स्वागतयोग्य कदम है । वन्य जीव सरंक्षण के लिए सरकार को जन जागरूकता पर भी जोर देने की आवश्यकता है ।
ऐसे प्रयास होंगे तब प्राकृतिक विरासत तो बचेगी ही , साथ ही खत्म होती जा रही वनस्पतियों और जीवों को भी बचाया जा सकेगा।

रीतेन्द्र कंवर शेखावत

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