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कॉर्नियल अपारदर्शिता 50 से अधिक उम्र के लोगों में दृष्टिहीनता का दूसरा सबसे बड़ा कारण: डॉ.महिपाल सिंह सचदेव

नई दिल्ली: कोविड के दौरान आँखों की समस्याओं और अंधेपन के मामलों में बड़ी वृद्धि हुई है। ऐसे में ऑल इंडिया ऑप्थेल्मोलॉजी सोसाइटी (एआईओएस) और आई बैंक एसोसिएशन ऑफ इंडिया (ईबीएआई) कॉर्नियल पुनर्प्राप्ति कार्यक्रम को बढ़ावा देने और अंधेपन के इस बोझ को कम करने के प्रयासों में जुटे हुए हैं। इन प्रयासों को देखते हुए, स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय ने होम सेटिंग से कॉर्निया की पुनर्प्राप्ति के लिए दिशानिर्देश जारी किए हैं। जारी किए गए दिशानिर्देश, आँखों का इलाज करने वाले सभी डॉक्टरों द्वारा सुरक्षित और निवारक अभ्यास पर जोर देते हैं। कोविड के कारण इस साल भारत में नेत्रदान आंदोलन पर गहरा असर पड़ा है, क्योंकि मार्च-मई 2020 तक नेत्रदान की गतिविधियों को पूरी तरह रोक दिया गया था। हालांकि, जून 2020 में सभी सेवाओं को फिर से शुरू कर दिया गया था, बावजूद इसके दान की संख्या बहुत कम है।
इस विशाल अंतर के कारण देश में अंधेपन का शिकार हुए रोगियों की संख्या में तेजी से वृद्धि हुई है। ईबीएआई के हालिया आंकड़ों के अनुसार, भारत में 11 लाख मरीज कॉर्नियल ट्रांसप्लान्ट सर्जरी का इंतजार कर रहे हैं। जबकी पिछले साल लगभग 26000 मरीजों की सर्जरी की गई थी। पिछले साल की तुलना करें तो, अप्रेल-जून 2019 में 14901 कॉर्निया दान की गई थीं और 7897 मरीजों की सफलतापूर्वक सर्जरी की गई थी। वहीं इस साल केवल 609 कॉर्निया प्राप्त की गई हैं और केवल 593 मरीजों की सर्जरी हुई है। ये आंकड़े साफ करते हैं कि, पिछले साल की तुलना में इस साल कोर्निया डोनेशन में 91.5 प्रतिशत की कमी आई है। एआईओएस अध्यक्ष, डॉ.महिपाल सिंह सचदेव ने बताया कि, “हालिया राष्ट्रीय दृष्टिहीनता और दृष्टि हानि सर्वेक्षण 2019 के अनुसार, कॉर्नियल अपारदर्शिता 50 से अधिक उम्र के लोगों में दृष्टिहीनता का दूसरा सबसे बड़ा कारण है। जबकी कॉर्नियल ब्लाइंडनेस बेहद आम है, जिसकी रोकथाम और इलाज दोनों ही संभव हैं। इलाज के दौरान खराब कॉर्निया को दान की हुई स्वस्थ कॉर्निया के साथ बदल दिया जाता है। ऑप्थेल्मोलॉजी के क्षेत्र में प्रगति के साथ, लेजर एब्लेशन और कॉर्नियल ट्रांसप्लान्ट तकनीकों में विकास हुआ है, जहां मरीज तेजी से रिकवर करते हैं और आंखें भी अच्छी हो जाती हैं।”
अन्य देशों की तुलना में, जहां 80 प्रतिशत आबादी अंगदान करती है, जिसमें आँखें भी शामिल हैं, भारत में केवल एक प्रतिशत आबादी स्वेच्छा से अंगदान करती है। दृष्टिहीन लोग अपनी आँखें दान नहीं कर सकते हैं, इस मिथ्या को तोड़ने के साथ ईबीएआई ने यह भी साफ किया कि यदि मरीज कोर्नियल दृष्टिहीनता का शिकार नहीं है, तो उसके लिए नेत्रदान करना संभव है। एआईओएल और ईबीएआई की महासचिव, डॉ. नम्रता शर्मा ने बताया कि, “भारत में नेत्रदान की संख्या में कमी आने के कारण अंधेपन का भार लगातार बढ़ रहा है। जब भी कोई व्यक्ति इस दुनिया को अलविदा कहता है, उसे अपनी कॉर्निया अवश्य दान करना चाहिए, क्योंकि इस प्रकार वह लोगों की एक बड़ी मदद कर पाता है। भारत को ट्रांसप्लान्ट की एक बड़ी संख्या की जरूरत है। एडवांस टेक्रनोलॉजी के साथ, इलाज के परिणामों में लगातार सुधार हो रहा है, लेकिन इसे सभी लोगों तक पहुंचाना आज भी एक बड़ी चुनौती बनी हुई है। हालांकि, कोरोना की महामारी इस अंतर को खत्म नहीं होने दे रहा है, ऐसे में उम्मीद करते हैं कि कॉर्नियल पुनर्प्राप्ति कार्यक्रम की अधिसूचना इस बोझ को कम करने में सफल रहेगी।” चूंकि, भारत में दृष्टि हानि एक बड़ा बोझ बनी हुई है, इसलिए रोकथाम के तरीकों को तत्काल अपनाने की आवश्यकता है। धुंधला दिखाई देना, रूखी आँखें या आँखों से पानी आने जैसे लक्षणों को अक्सर नजरअंदाज किया जाता है। जबकी समय पर इलाज के साथ भारत में अंधेपन के बढ़ते बोझ को कम किया जा सकता है। ईबीएआई अध्यक्ष, डॉ. मुखर्जी ने बताया कि, “बदलती जीवनशैली और डिजिटल स्क्रीन के अत्यधिक इस्तेमाल के कारण सभी उम्र के लोगों की रोशनी कमजोर हो रही है। जबकी ऐसे मामलों  की रोकथाम और इलाज संभव है। इस प्रकार की दृष्टिहीनता के मामलों को कम करने के लिए लोगों को रोकथाम के तरीकों और नेत्रदान के बारे में जागरुक और शिक्षित करने की सख्त जरूरत है।”

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