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कॉलेज तो खोला नहीं, क्यों खोल रहे विश्वविद्लाय केजरीवाल

दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल दिल्ली की जनता से अब इस तरह के वादे करने लगे हैं जिन्हें सुनकर गुस्सा कम और हंसी ज्यादा आती है। दिल्ली में विधानसभा चुनाव से ठीक पहले वे यहां पर दो नए विश्वविद्लायों को खोलने की घोषणा कर चुके है। केजरीवाल पहले भी लगातार दिल्ली के युवाओं को फुटबाल, क्रिकेट, हॉकी समेत दूसरे खेलों में स्नातक, परास्नातक और डॉक्टरेट की डिग्री देने के सब्जबाग दिखाते रहे हैं। यानी यहां के नौजवान भावी विश्वविद्लाय में उपर्य़ुक्त विषयों में डिग्री ले सकेंगे। जबकि, दूसरा विश्वविद्यालय यह वादा करके खोला जा रहा है ताकि युवाओं को उद्यमिता व कौशल विकास की पढ़ाई करवाई जा सके। अब सवाल यह है कि जिस केजरीवाल सरकार ने अपने लगभग पांच वर्ष के कार्यकाल में दिल्ली विश्वविद्लाय में एक भी नया कॉलेज नहीं खोला, वह अचानक से दो विश्वविद्लाय कहां से खोलेगी ? इनके लिए फैक्ल्टी की व्यवस्था कैसे होगी?

मैंने तो संसद में भी यह मामला उठाया था कि पहले जिसतरह बनारस और इलाहाबाद उच्च शिक्षा का केंद्र था, अब वही हाल दिल्ली का हो रहा है I इसलिए, यदि नए कॉलेज खोलने में दिक्कत है तो कम से कम दिल्ली के सभी कॉलेजों में दो शिफ्ट में पढाई तो शुरू हो I इससे भी तो दुगनी संख्या में विद्यार्थी को दाखिला मिल सकेगा पर यह भी तो नहीं हुआ I क्या खेलों में डिग्री लेने भर से नौकरी मिल सकेगी? क्या इन सवालों के जवाब केजरीवाल के पास हैं ? शायद नहीं। उन्हें तो बस घोषणाएं ही करनी हैं।

दिल्ली विश्वविद्लाय में लगभग 70 कॉलेज हैं। ये लगभग सभी सुबह की शिफ्ट में चलते हैं। केजरीवाल सरकार ने रत्ती भर भी प्रयास नहीं किए ताकि ये कॉलेज सांध्य में भी अपनी कक्षाएं शुरू कर सकें । इस तरह का कदम उठाने के कई लाभ होते । पहला यह होता कि दिल्ली विश्वविद्लाय के कॉलेजों में दाखिले के लिए जितने अंकों की दरकार होती है, उतनी तो न रहती, क्योंकि सीटें दुगनी संख्या में उपलब्ध हो जाती। दूसरा इस पहल से उन छात्रों को लाभ होता जो दिन में कहीं नौकरी करके शाम को पढ़ाई करना चाहते हैं। पर वे इन बिन्दुओं की तरफ क्यों सोचेगे? उन्हें तो बस सस्ती लोकप्रियता हासिल करनी है। सबसे हैरानी की बात यह है कि वे एक बार कोई घोषणा करने के बाद फिर उसकी कभी भी बात तक नहीं करते। फिर वे किसी और तरह की नई घोषणा को करने लगते हैं। उनका यह क्रम निरंतर जारी ही रहता है। केजरीवाल कह रहे हैं कि उद्यमिता व कौशल विकास विश्वविद्लाय की क्षमता 50 हजार छात्रों की होगी। क्या उन्हें अंदाजा है कि 50 हजार छात्रों के विश्वविद्लाय के लिए कितनी जगह चाहिए होती है? दिल्ली के जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्लाय 300 एकड़ में फैला हुआ। उधर 50 हजार के चौथाई से भी कम विद्यार्थी पढ़ते हैं। जिधर 50 हजार विद्यार्थी पढ़ेंगे उसके लिए कितने ब़ड़े पैमाने पर इंफ्रास्ट्रक्चर की जरूरत होगी यह तो केजरीवाल जी ने कतई नहीं सोचा। यदि वे इन तमाम बिन्दुओं पर विचार करते तो फिर वे शायद चुप ही रहते। वे घोषणाएं करने में माहिर हो चुके हैं, क्योंकि उन्हें पता है कि घोषणाएं करने में कौन सा टैक्स लगता है। जहां तक खेल विश्वविद्लाय का सवाल है, तो केजरीवाल से कोई पूछ ले कि दिल्ली सरकार के अंतर्गत चलने वाले कितने स्कूलों में कायदे के खेल मैदान है? अगर वे देख लेते दिल्ली के ग्रामीण या पुरानी दिल्ली के स्कूलों के मैदानों को तो उन्हें जन्नत की हकीकत का पता चल जाता। यकीन मानिए कि इन स्कूलों में खेल मैदान या खेल सुविधाएं लगभग न के बराबर हैं। वे कह रहे हैं कि जो युवा खेलों में करियर बनाना चाहते हैं, वे इसमें दाखिला लेंगे। सच्ची बात ये है कि अब सिर्फ खेलों में बेहतर करके किसी युवक-युवती के लिए रोजगार पाना आसान नहीं रहा। मैं यहां पर अंतरराष्ट्रीय स्तर के खिलाड़ियों की बात नहीं कर रहा हूं। उन्हें तो स्पांसरशिप और रोजगार मिल जाते हैं। पर यदि आपने अपने राज्य का भी किसी खेल में प्रतिनिधितव किया है, तो भी किसी सरकारी महकमें में रोजगार नहीं मिलता। एक जमाने में सेना, रेलवे, पुलिस, बैंक टाटा,महिन्द्रा,डीसीएम समेत बहुत से सरकारी और निजी क्षेत्रों के संस्थान खिलाड़ियों को रोजगार देते थे। इनकी अलग-अलग खेलों की टीमें भी होती थीं। स्टेट बैंक की क्रिकेट टीम से अजित वाडेकर, बिशन सिंह बेदी और य़शपाल सरीखे खिलाड़ी खेलते थे। इसी तरह अन्य संस्थानों में मशहूर खिलाड़ी रोजगार करते थे और उनके लिए खेलते थे। अब अधिकतर ने खिलाड़ियों को रोजगार देना बंद कर दिया है। केजरीवाल जी को पता नहीं होगा कि दिल्ली विकास प्राधिकरण यानी डीडीए पहले फुटबॉल के खिलाड़ियों को रोजगार देती थी। अब उसने उन्हें रोजगार देना बंद कर दिया है। वे खुद ईमानदारी से बता दें कि दिल्ली सरकार कितने खिलाड़ियों को खेल कोटे में रोजगार देती है? यानी केजरीवाल सब हवा-हवाई बातें कर रहे हैं।

दरअसल केजरीवाल कुछ भी कभी भी और कहीं भी बोल सकते हैं, किसी पर कुछ भी आरोप लगाते रहे हैं। हालांकि अब उन्होंने अपने राजनीतिक विरोधियों पर अनर्गल आरोप लगाने तो बंद कर दिए हैं। इसकी वजह यह समझ आ गई है कि उन पर अब स्मृति शेष अरुण जेटली से लेकर कपिल सिब्बल तक ने मानहानि के केस दायर कर दिए थे। उनमें मामलों में केजरीवाल फंसने लगे तो उन्होंने इनसे माफी मांग ली थी। वे जवाबदेही में तो यकीन ही नहीं करते। हां, वे वादे पर वादे कर सकते हैं।

केजरीवाल को सत्ता का विकेन्द्रीकरण नापसंद है। उन्होंने अपनी आम आदमी पार्टी (आप) में योग्य नेताओं के लिए कभी स्पेस नहीं रखा। उन्होंने योगेन्द्र यादव, कुमार विश्वास और आशुतोष जैसे जुझारू और समझदार साथियों को भी पार्टी में रहने नहीं दिया। केजरीवाल ने दिल्ली से दो अनाम शख्सों को राज्यसभा में भेजकर सिद्ध कर दिया था कि वे इतने दूध के धुले नहीं हैं। किस तरह उन्होंने टिकट बांटें, यह आम चर्चा का विषय है I

आजकल आप दिल्ली से प्रकाशित होने वाले अखबारों को देख लीजिए। उनमें केजरीवाल के पूरे-पूरे पेज के विज्ञापन भरे होते हैं। वे विज्ञापनों में अपना ही महिमामंडन कर रहे होते हैं। राजनीति में शुचिता और ईमानदारी का प्रवचन देने वाले केजरीवाल जी जरा बता दें कि क्या आपको जनता की कमाई से इतने विज्ञापन देने चाहिए? वे विज्ञापनों में जितना पैसा लुटा रहे हैं, यदि वे उसका उपयोग दिल्लीवालों को स्वच्छ पानी की आपूर्ति या यहां के दूसरे जरूरी कामों पर करते तो यहां की जनता उनकी कृतज्ञ होती। चूंकि अभी दिल्ली विधानसभा चुनावों की घोषणा में कुछ वक्त शेष है, इसलिए केजरीवाल अगर कुछ अन्य विश्वविद्लाय खोलने की घोषणा कर दें तो आशचर्य मत कीजिएगा।

आर.के. सिन्हा
लेखक राज्य सभा सदस्य हैं
सी-1/22, हुमायूँ रोड
नई दिल्ली

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