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क्यों ना मुसलमान जाएं सेना में

भारतीय सेना के पूर्व लेफ्टिनेंट जनरल सैयद अता हसनैन ने हाल ही में मुसलमानों का आहवान किया कि वे भारतीय सेना में जाकर देश की सीमाओं की रखवाली में अपना योगदान देंI वे अपनी जगह बिलकुल सही हैं। निश्चित रूप से भारतीय सेना में कोई जातिगत आरक्षण नहीं हैIवहां पर भर्ती सिर्फ मेरिट के आधार पर ही होती है। भारतीय सेना का चरित्र पूरी तरह से धर्मनिरपेक्ष है। इसलिए अगर मुसलमानों को उन्हें लगता है कि उनके साथ बाकी नौकरियों में न्याय नहीं हो रहा हैतब उन्हें सेना में शामिल हो जाना चाहिए। भारतीय सेना के तीनों अंगों में मुसलमान और ईसाई, सिख, पारसी, यहूदी सभी अल्पसंख्यक समुदाय के लोग शिखर पदों तक पहुंचे हैं। हालांकि उन्हें समझना चाहिए कि उनके साथ किसी भी स्तर पर भेदभाव नहीं होता। हांकिसी के वहम का इलाज तो कोई नहीं कर सकता।

भारतीय सेनाओं में मुसलमानों की बात करते हुए सबसे पहले एयर चीफ मार्शल इदरीस हसन लतीफ का उल्लेख करना होगा। वे 31 अगस्त1978 को एयर चीफ मार्शल एच मूलगांवकर के रिटायर होने के बाद  भारतीय वायुसेना के प्रमुख नियुक्त किये गये थे। सन 1947 में  देश के बंटवारे के वक्त सशस्त्र सेनाओं के विभाजन की बात आई तो एक मुस्लिम अफसर होने के नाते इदरीस लतीफ के सामने भारत या पाकिस्तान दोनों में से किसी की भी वायुसेना में शामिल होने का विकल्प मौजूद था Iपरंतु उन्होंने भारत को ही चुना। उन्होंने 1950 में गणतंत्र दिवस के अवसर पर पहली सलामी उड़ान का नेतृत्व किया था। वे 1981 में सेवानिवृत्त हुए। इसके बाद इन्होंने महाराष्ट्र के राज्यपाल और फिर   फ्रांस में भारत के राजदूत का पदभार संभाला। अपना कार्यकाल पूरा करके ये 1988 में फ्रांस से वापस आए और अपने गृह स्थान हैदराबाद में रहने लगे। उनका कुछ समय पहले निधन हो गया है। एक एयर चीफ मार्शल इदरीस हसन लतीफ का उदाहरण ही यह सिद्ध करता है कि भारतीय सेनाओं का चरित्र किस हद तक धर्मनिरपेक्ष है। यहां पर सबको आगे बढ़ने के समान अवसर मिलते हैं।

सैयद अता हसनैन भी एक बार एक मुसलमान युवक के सवाल को सुनकर स्तब्ध रह गए थे। उनसे उस युवक ने पूछा, ‘आप भारतीय सेना में इतने ऊंचे ओहदे पर कैसे पहुंचेक्या सेना में मुसलमानों के लिए अवसर हैं बेशकयह सवाल सुनकर कोई भी सेना में कार्यरत मुसलमान अधिकारी सन्न रह जाएगा। आखिर मुसलमान क्यों इस तरह से सोचते है कि मानो उन पर देश में जुल्मों-सितम हो रहे हों?  यह धारणा इसलिए भी बे-सिर पैर की लगती है, क्योंकि; इसी भारत में बॉलीवुड के ‘’तीन खान’’ करोड़ों भारतीयों के दिलों में बसते हैं उसमें अधिकांश और मुसलमान हैं। तथा इसी भारत  के सबसे धनी कारोबारियों में से एक मुसलमान अजीम प्रेम जी भी है। अपने को स्थायी रूप से सताये जा रहे विक्टिम की मानसिकता में रखने वाले मुसलमान जरा याद रखें कि ये ही देश जाकिर हुसैनफखरुद्दीन अली अहमद, अब्दुल कलाम जैसे तीन राष्ट्रपति, दिलीप कुमारनौशादरहमानअमजद अली खान समेत दर्जनों कलाकारों को देश दिल से चाहता रहा है। पूरा भारत मिसाइल मैन एपीजे अब्दुल कलाम को अपना नायक मानता है। पर यही भारत सुरक्षा बलों के साथ मुठभेड़ में मारे गए बुरहान मुजफ्फर वानी की मौत के बाद निकले जनाजे में हजारों नासमझ दिग्भ्रमित लोगों के उमड़ने की निंदा भी करता है। इन्हीं लोगों ने उसकी शवयात्रा के समय जमकर उत्पात भी मचाया था। इसी देश ने मुंबई धमाकों के गुनहगार याकूब मेमन की मुंबई में निकली शव यात्रा में शामिल भीड़ की भी पुरजोर निंदा की थी।  मुंबई में वर्ष 1993 में हुए सीरियल बम विस्फोट के मामले में दोषी याकूब मेमन को नागपुर केंद्रीय कारागार में फांसी दी गयी। इसके बाद उसकी मुंबई में शव यात्रा निकली। उसमेंभी हजारों दिग्भ्रमित मुसलमान शामिल हुए। कानून की नजरों में गुनहगार साबित हो चुके मेमन और बुरहान को नायक मानने वालों को सम्मान देने वालों को तो देश का नागरिक किसी भी हाल में सहन नहीं कर सकता।

दरअसल यह तो देश में रहने वाले सभी को समझना होगा कि अब सरकार के स्तर पर तो सेना में ही बड़ी संख्या में नौकरियां हैं। सेना में नौकरी स्थायी भी रहती है। इसके अलावा बेहतरीन पगारदूसरी तमाम सुविधाएं और पेंशन तो मिलती ही है।  इसलिए मुसलमानों को सेना के सभी अंगों में भर्ती की कोशिश करनी चाहिए। उन्हें नकारात्मक दृष्टिकोण पीछे छोड़ देना चाहिए। सेना में तो सभी धर्मों का सम्मान होता है,उसकी छाविनयों में मंदिर,मस्जिद,गुरुद्वाराचर्च वगैरह सभी मजहबों के इबादतगाह हैं। सभी एक साथ सभी पर्वों में खुलकर भाग भी लेते हैं।

अब इदरीस हसन लतीफ से भी आगे बढ़ते हुए बात करते हैं, 1965 की जंग के नायक शहीद अब्दुल हमीद की बहादुरी की। देश निश्चित रूप से 1965 की जंग में अब्दुल हमीद के शौर्य को सदैव याद रखेगा। इसी तरह से करगिल जंग की बात होगी तो याद आते रहेंगे कैप्ट्न हनीफु्द्दीन। वे राजपूताना राइफल्स् के अफसर थे। कैप्टन हनीफु्द्दीन  ने करगिल की जंग के समय तुरतुक में शहादत हासिल की थी। करगिल के तुरतुक की ऊंची बर्फ से ढंकी पहाड़यों पर बैठे दुश्मन को मार गिराने के लिए हनीफु्द्दीन गोलाबारी के बावजूद आगे बढ़ते रहे थे। उनकी बहादुरी की कहानी आज भी देशवासियों की जुबान पर है। पाकिस्तानी सैनिक मई 1999 में करगिल सेक्टर में घुसपैठियों की शक्ल में घुसे और नियंत्रण रेखा पार कर हमारी कई चोटियों पर कब्जा कर लिया। दुश्मन की इस नापाक हरकत का जवाब देने के लिए आर्मी नेऑपरेशन विजय‘ शुरू कियाजिसमें तीस  हजार  सैनिक शामिल थे। उन्हीं में थे   मोहम्मद हनीफउद्दीन। भारतीय सेना में  लेफ्टिनेंट जनरल तक के ओहदे पर पहुंचे ज़मीर उद्दीन शाह । उन्होंने भारतीय सेना में डिप्टी चीफ ऑफ़ आर्मी स्टाफ के पद पर भी कार्य किया। वे सेना की नौकरी से रिटायर होने के बाद  अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के कुलपति भी रहे।  तो भारतीय सेना में मुसलमान देश के आजाद होने के बाद से ही अपनी सेवाएं दे रहे हैं। पर ये भी सच है कि इनकी संख्या इनकी देश में आबादी के अनुपात में कम है। इसकी सीधी-सीधी वजह यह है कि ये सेना में नौकरी में जाने  की कोशिश ही नहीं करते। इनके दिमाग में न जाने क्यों और किसने यह भर दिया गया है कि इन्हें वहां पर रोजगार के लायक नहीं माना जाएगा। इनकी यह सोच बेबुनियाद और निराधार है। देश को अब उन तत्वों को बेनकाब करना होगा जो मुसलमानों को सेना में नौकरी करने से रोकते हैं।

आर.के.सिन्हा, (लेखक राज्यसभा सांसद और बहुभाषी न्यूज़ एजेंसी हिन्दुस्थान समाचार के चेयरमैन हैं)

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