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क्यों पाक सेना बना रही है इमरान को पीएम

अगर कुछ अप्रत्याशित नहीं घटा तो पाकिस्तान में आगामी 25 जुलाई को होने वाले आम चुनावों में इमरान खान की पाकिस्तान तहरीके इंसाफ (पीटीआई) पार्टी को विजय मिलने की प्रथम सम्भावना व्यक्त की जा रही है। इसका मोटे तौर पर अर्थ तो यह हुआ कि इमरान खान पाकिस्तान के अगले प्रधानमंत्री बनने जा रहे हैं। वैसे तो वे बेहतरीन हरफनमौला क्रिकेटर रहे हैं, पढ़े लिखे भी हैं और अभी तक भ्रष्टाचार के आरोपों से सीधे तौर पर मुक्त हैं। वैसे सेक्स स्कंडलों में चर्चित रहे हैं। पर वे पाकिस्तान सेना के खुले सहयोग और समर्थन से कट्टरपंथी पाकिस्तान के प्रधानमंत्री बनेंगे। अब यह बात तो जाहिर हो ही चुकी है कि रावलपिंडी स्थित पाकिस्तानी सेना का मुख्यालय 65 साल के इमरान खान को देश का प्रधानमंत्री बनता देखना चाह रहा है। इसलिए यह समझना भारी भूल होगी कि इमरान खान अपने बलबूते पर पाकिस्तान के वजीरे आजम बनेंगे।
दरअसल इमरान खान को सेना प्रधानमंत्री देखना चाहती है। सेना ने देश के पूर्व प्रधानमंत्री नवाज शरीफ के रास्ते में इतने अवरोध खड़े किए कि उनकी पाकिस्तान मुस्लिम लीग (नवाज) चुनाव मैदान में पिछड़ सी गई है। सेना की मदद न्यापालिका भी कर रही है। पाकिस्तान की सुप्रीम कोर्ट ने शरीफ को कहीं का नहीं रहने दिया। यहाँ तक उसने आदेश दे दिया है कि पूर्व प्रधानमंत्री नवाज शरीफ अपने दल के मुखिया भी नहीं रह सकते। इससे पहले उन्हें भ्रष्टाचार के आरोप में घिरने के बाद प्रधानमंत्री पद से पहले ही हटाया जा चूका था। हालांकि, अभियोजन पक्ष शरीफ को भ्रष्ट सिद्ध कर पाने में असफल रहा था, फिर भी उन पर सुप्रीम कोर्ट ने चाबुक चला दी। सेना को शरीफ इसलिए पसंद नहीं आ रहे थे क्योंकि वे सेना के वर्चस्व को चुनौती देने लगे थे। शरीफ की चुनौती से थिलमिलाई सेना को इमरान खान में संभावनाएं नजर आईं। कहने वाले कह रहे हैं कि उनका सेना से डील हो गया है। वे अब अपनी सभाओं में खुलकर कहने भी लगे हैं कि चुनावों में उन्हें ही कामयाबी मिलेगी। उनके विश्वास के पीछे सेना का आशीर्वाद है। पाकिस्तान में किसी को भी भारत का एजेंट बताकर बर्बाद किया जा सकता है। पाकिस्तान में सन 1964 में मोहम्मद अली जिन्ना की बहन फातिमा जिन्ना को सैन्य तानाशाह जनरल अयूब खान ने भारत और अमेरिका का एजेंट करार दिया था। उनकी गलती इतनी थी कि वो सेना के बढ़ते प्रभाव के खिलाफ बोलने लगी थीं। उसके बाद से सेना हरेक उस राजनीतिक हस्ती को भारत या अमेरिका का एजेंट बताकर बर्फ में दफनाती रही है, जिससे उसे खतरा होता है। फातिमा जिन्ना, जुल्फिकार अली भुट्टो के बाद सेना नवाज शरीफ को भारत का एजेंट बताने लगी। भारत का एजेंट होने का पाकिस्तान में अर्थ देश के शत्रु के समान है। शरीफ तब से सेना के निशाने पर हैं, जब से उन्होंने सन 2008 के मुंबई हमलों में पाकिस्तान में सक्रिय आतंकी गुटों को जिम्मेदार बताया। शरीफ के आरोप परोक्ष रूप से सेना पर ही लगे थे क्योंकि, वहां पर हाफिज सईद और मसूद अजहर के खतरनाक आतंकी संगठनों जैसे जमात-उद-दावा, लशकरे-ए-तैयबा और जैश-ए-मोहम्मद पाकिस्तानी सेना की खाद-पानी मिलने के चलते ही भारत में अपने आतंकी भेजते रहे हैं। शरीफ के आरोपों से सेना सन्न सी रह गई।
इमरान खान अब सेना के इशारे पर चलते हुए नवाज शरीफ और मोदी की दोस्ती पर सवाल उठा रहे हैं। उन्होंने कहा कि यह बहुत आश्चर्य की बात है कि जब भी नवाज शरीफ समस्या में होते हैं, तो पाकिस्तान की सीमा पर तनाव बढ़ जाता है। साथ ही आतंकवादी गतिविधियां भी बढ़ जाती हैं। उन्होंने सवाल करते हुए कहा कि क्या यह महज संयोग है? यही नहीं उनकी पार्टी के कार्यकर्ता पाकिस्तान में एक नारा भी लगा रहे हैं। वह चुनाव प्रचार के दौरान कह रहे हैं कि “मोदी का जो यार है वो गद्दार है, गद्दार है।“ क्रिकेटर से नेता बने इमरान खान ने भारत और पाकिस्तान के बीच खराब संबंधों का ठीकरा भी नरेंद्र मोदी के सिर पर ही फोड़ा है। उन्होंने कहा है कि भारत सरकार के पाकिस्तान विरोधी आक्रामक हाव भाव ने दोनों पड़ोसी देशों के बीच मौजूदा गतिरोध को जन्म दिया। ये वही इमरान खान हैं, जो 2015 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से नई दिल्ली में मिले थे। उस मुलाकात के बाद उन्होंने मोदी जी के पक्ष में तारीफ के तमाम कसीदे भी पढ़े थे। अब वे बदले सुर अलाप रहे हैं। भारत और मोदी को कोसने वाले इमरान के मुंह में दही जम जाता है, जब उनसे हाफिज सईद और मसूद अजहर के संबंध में सवाल पूछे जाते हैं। वे कभी इन आतंकियों के खिलाफ जुबान नहीं खोलते। आपको याद होगा कि नवाज शरीफ ने माना था कि मुंबई में 26 नवंबर 2008 को हुए बड़े आतंकी हमले के पीछे पाकिस्तान का हाथ था। तब इमरान खान ने शरीफ को मीर जाफर बताया था। इमरान खान कहने लगे, ’’नवाज शरीफ आज के जमाने के मीर जाफर हैं, जिसने निजी फायदे के लिए देश को गुलाम बनाने में अंग्रेजों का साथ दिया. नवाज गलत तरीके से कमाए गए 300 अरब रुपये और विदेशों में अपने बेटे की कंपनियों की खातिर पाकिस्तान के खिलाफ मोदी की भाषा बोल रहे हैं।’’
निश्चित रूप से पाकिस्तान की राजनीति में इमरान खान की दस्तक से एक उम्मीद बंधी थी कि पड़ोसी मुल्क को अंततः एक समझदार नेता मिल गया है। वो पाकिस्तान को आगे चलकर सशक्त नेतृत्व दे सकेगा और अपने देश आधुनिक बनाने में मील का पत्थर साबित होगा। ये भी आशा की जा रही थी कि वे भारत-पाकिस्तान संबंधों को सामान्य बनाने की दिशा में अहम साबित होंगे। दुर्भाग्यवश ये सभी उम्मीदें निर्मूल ही साबित हुईं। वे तो यदा-कदा के मुट्ठी भर लोगों के सियासी नेता ही बन सके। वे कभी भी गंभीर नेता के रूप में अपने को स्थापित नहीं कर सके। वे बीच-बीच में करप्शन के खिलाफ लड़ने लगते हैं। फिर राहुल गाँधी की तरह अचानक कई हफ्तों के लिए गायब हो जाते हैं। तब वे भूल जाते हैं कि भ्रष्टाचार ही उनके देश को खा रहा है। इमरान खान ने तीसरी शादी करके तो अपनी रही-सही इज्जत भी धूल में मिला ली है। इमरान खान पर उनकी दूसरी पत्नी रेहम खान ने आरोप लगाते हुए कहा कि जब वह (इमरान) की पत्नी थीं तब भी इमरान बुशरा (तीसरी पत्नी) को डेट कर रहे थे। इमरान खान कतई भरोसमंद आदमी नहीं हैं। उन्होंने बड़े फख्र से रेहम को बताया कि पूरे विश्व में उनकी कई पत्नियाँ हैं और कम से कम पांच नाजायज बच्चे भी हैं।
दरअसल, इमरान खान पाकिस्तान के अरविंद केजरीवाल बन चुके हैं। वे एक इस तरह के नेता हैं जिसे जनता का भरपूर आशीर्वाद मिला हो और वो जनता को लगातार ठगता रहे। केजरीवाल की तरह वे भी दावे-वादे बहुत करते हैं, फिर मुकर जाते हैं। अब जबकि इमरान खान का पाकिस्तान का प्रधानमंत्री पद को पाना निश्चित सा माना जा रहा है, तब लग रहा है कि ये उनके देश के लिए कोई बहुत शुभ संकेत नहीं है। उनके प्रधानमंत्री बनने से पाकिस्तान में लोकतांत्रिक संस्थाएं कमजोर ही होंगी। इमरान खान तो सेना के पिट्ठू भर बनकर काम करते रहेंगे।

 

आर.के. सिन्हा

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