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खत्म होते प्राकृतिक संसाधनों पर बैठक का आयोजन

विजय न्यूज़ ब्यूरो
जयपुर। असीमित परिग्रह और संचय की अत्यधिक प्रवृत्ति और लोभ विश्व के सभी संसाधनों के अत्यधिक दोहन का कारण बन रहा है। यदि असीमित परिग्रह पर अंकुश नहीं लगा तो कुछ दशकों के बाद विश्व से सारे संसाधन समाप्त हो जाएंगे और पृथ्वी पर सभी के लिए जीवन व्यापन कठिन हो जाएगा।
यह उद्गार भारत सरकार के विदेश मंत्रालय की संस्था इण्डियन कौन्सिल फाॅर कल्चरल रिलेशन्स (भारतीय सांस्कृतिक सम्बन्ध परिषद) और प्राकृत भारती अकादमी द्वारा कानोड़िया महाविद्यालय के सभागार में आयोजित अपरिग्रह पर दो-दिवसीय अन्तर्राष्ट्रीय संगोष्ठी में वैज्ञानिकों, दार्शनिक और समाजशास्त्रियों ने व्यक्त किए।
अपरिग्रह और वर्तमान युग में उसके उपयोग पर देश-विदेश के विद्वानों ने अपने विचार रखते हुए कहा कि अपरिग्रह केवल सामाजिक आवश्यकता ही नहीं बल्कि व्यक्तिगत नैतिकता का भी स्तम्भ है। अपरिग्रह से समाज में संतुलन और सौहार्द बना रहेगा और इससे आगे व्यक्ति की चेतना के विकास के लिए भी अपरिग्रह सहायक है। अपरिग्रह विभिन्न धर्मों एवं दर्शनों का नियम और निर्देश है।
राजस्थान राज्य मानवाधिकार आयोग के अध्यक्ष न्यायमूर्ति प्रकाश टांटिया ने अन्तर्राष्ट्रीय संगोष्ठी का उद्घाटन करते हुए कहा कि अपरिग्रह का प्रश्न इस समय जीवन शैली का प्रश्न है। परिग्रह के प्रश्रय के पनपने वाले हिंसा, झुठ, चोरी, आतंक तथा भ्रष्टाचार के बहुआयामी प्रभावों को समझने और उसके समाधान के प्रति जागरूकता पैदा करनी होगी, अन्यथा प्रकृति के सभी साधन लोभ और संयम के शिकार हो जाएगे।
भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद को महानिदेशक रिवा गांगुलीदास ने स्वागत भाषण में कहा कि अपरिग्रह या असंग्रह भारतीय दर्शन और संस्कृति का एक ऐसा उदाहरण है जो पूरे विश्व के लिए लाभकारी सिद्ध हो सकता है।
रिवा गांगुली दास ने कहा कि ऋषि, जैन मुनियों और बौद्ध भिक्षुओं सभी ने अपरिग्रह की व्याख्या की है और इसके महत्व को समझाया है। महानिदेशक ने कहा कि अपरिग्रह की आवश्यकता को समझने के लिए ही अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर एक संगोष्ठी का आयोजन करने का प्रयास भारतीय सांस्कृतिक सम्बन्ध परिषद और प्राकृत भारती अकादमी ने किया है। इस विषय की महŸाा का सबसे पहले भारतीय सांस्कृतिक सम्बन्ध परिषद के पूर्व महानिदेशक और पूर्व राजदूत सतीश मेहता ने समझा और अन्तर्राष्ट्रीय संगोष्ठी आयोजित करने के प्रयास शुरू हुए।
प्राकृत भारती अकादमी के संस्थापक और मुख्य संरक्षक डी.आर. मेहता ने कहा कि हिन्दु, बौद्ध और जैन धर्म के अलावा इस्लाम में जकात, सुफीवाद में उजलात और ईसाई धर्म के थिसल के जरिए अपरिग्रह पर एक अन्तर्राष्ट्रीय संगोष्ठी के आयोजन का आशय बाजार आधारित वर्तमान संस्कृति में समाज को असंग्रह के महत्व को समझाना है, ताकि प्राकृतिक सम्पदा का अत्यधिक दोहन न हो सके।
विभिन्न सत्रों में आज पहले दिन देश-विदेश के विद्वानों ने अपने विचार व्यक्त किए। विष्णु मोहन फाउण्डेशन के प्रमुख स्वामी हरी प्रसाद ने कहा कि अपरिग्रह और अस्तेय शान्ति और विकास के लिए आवश्यक है।
विद्वान विचारक कलानाथ शास्त्री ने कहा कि वेदों में दान और त्याग करने की प्रवृŸिा को महत्व दिया गया है और जरूरत से अधिक संयय करने की प्रवृŸिा को नकारा गया हैं
प्रो. सुषमा सिंघवी ने भारतीय दर्शन में अपरिग्रह की छः स्तरीय व्याख्या की गई है। योग दर्शन में सम्पŸिा, सुख और वैभव के प्रति जिसका मोह नहीं होता वह महान होता है।
प्रसिद्ध दर्शनिक विद्वान प्रो. स्टीवन हार्वे की अध्यक्षता में हुई गोष्ठी में मौलाना आजाद विश्वविद्यालय जोधपुर के उपकुलपति अख्तरउल वसी ने कहा कि भौतिक सुख और समृद्धि को नकारना और उसे जुड़े लोभ से स्वयं को दूर करना आवश्यक है। सुफीवाद के सिद्धान्तों में भी अपरिग्रह के महत्व को समझाया गया है और सुफियों को सुख और वैभव से दूर रहने की सलाह दी गई है।
जामिया मिलिया इस्लामिया विश्वविद्यालय के मोहम्मद मुश्ताक ने कहा कि इस्लाम में भी अपरिग्रह के महत्व को समझाया गया है और जुजुद, फक्र, इहतिवार, सखावत और जकात के जरिए दान करने की बात कही गई है।
मनीपाल विश्वविद्यालय के दर्शनशास्त्र विभाग के प्रोफेसर एंथनी सवारी राज ने कहा कि भारतीय ईसाइयों ने अपरिग्रह के महत्व को समझते हुए गरीबों के कल्याणार्थ काम करने की बात कही है।

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