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खुशहाल भारत का सपना खंडित कर रही है नवजात शिशुओं की मौत

यूनिसेफ की ताजा रिपोर्ट में एक बार फिर भारत में नवजात शिशुओं की मौत पर चिंता जाहिर की गई है। जो आंकड़े जारी किये गए है वे निश्चय ही भयावह है। इस रिपोर्ट को देखने पर हमारा नये भारत के निर्माण का सपना खंडित होता है। देश और समाज की प्रगति, खुशहाली और विकास उसके नागरिकों के स्वास्थ्य से जुड़ी होती है। जब हम स्वास्थ्य की बात करते हैं, तो इसका संबंध शिशुओं और माताओं से सबसे पहले होता है। जिस समाज में प्रतिवर्ष लाखों नवजात शिशु अकाल मृत्यु का शिकार हो जाते हैं उसे हम खुशहाल समाज कैसे कहेंगे, यह प्रत्येक देशवासी के लिए चिंतन और मंथन का विषय है। इसे केवल चर्चा,बयान और जाँच के नाम पर नहीं नकारा जा सकता।
देश में नवजात शिशुओं की मौत पर हाहाकार मचा हुआ है। यह रिपोर्ट केवल एक अस्पताल या राज्य की नहीं है अपितु विभिन्न राज्यों से मिली है। मौत के अलग अलग कारण बताये जा रहे हैं। कहीं ऑक्सीजन की कमी तो कहीं लापरवाही तो कहीं कुपोषण को जिम्मेदार बताया जा रहा है। देश में शिशुओं के स्वास्थ्य की देखभाल की दशा बेहद चिंताजनक है। भारत में हर साल लाखों बच्चे ऐसी बीमारियों के चलते मौत के मुंह में जा रहे हैं, जो निदानयोग्य हैं यानी जिनका इलाज मुमकिन है। हमारे देश में सरकारें नवजात शिशुओं को स्वास्थ्य सुरक्षा दे पाने में नाकामयाब और लापरवाह साबित हो रही हैं।
संयुक्त राष्ट्र बाल कोष ( यूनीसेफ) की ताजा रिपोर्ट के अनुसार गुणवत्ता युक्त स्वास्थ्य सेवाओं,टीकाकरण और संक्रमण से बचाव की पर्याप्त सुविधाओं के अभाव तथा जन्मजात शारीरिक दोष के कारण भारत में हर साल 11.5 लाख बच्चे पांच वर्ष की आयु पूरी करने से पहले ही काल के गाल में समा जाते हैं। रिपोर्ट के अनुसार पूरी दुनिया में भारत में शिशु मृत्यु दर 58 फीसदी से ज्यादा है। भारत में पांच साल से कम आयु वर्ग के 11.5 लाख शिशुओं की हर साल मौत हो जाती है। इनमें से नवजात शिशुओं की संख्या 6.60 लाख और तुरंत जन्मे बच्चों की संख्या 0.748 होती है।
यूनीसेफ की यह रिपोर्ट उत्तर प्रदेश, झारखंड,राजस्थान और छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में हाल के दिनों में अपर्याप्त चिकित्सा सुविधाओं और अस्पतालों की कथित लापरवाही के कारण नवजात शिशुओं की बड़ी संख्या में हुई मौत के संदर्भ में काफी अहम है। यूनीसेफ का कहना है कि गर्भवती महिलाओं और बच्चों की मृत्युदर घटाने के लिए पिछले 20 सालों के दौरान नीतिगत स्तर पर काफी प्रयास किए गए हैं जिसके बेहतर नतीजे भी सामने आए हैं लेकिन नवजात शिशुओं के लिए अनिवार्य स्वास्थ्य सेवाओं का पहलू उपेक्षित रह गया है और यही वजह है कि शिशुओं की मौत के मामलों में लगातार इजाफा हो रहा है।

रिपोर्ट के अनुसार सरकार ने राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन और तथा एनआरएचएम कार्यक्रम के तहत इस दिशा में सशक्त पहल जरूर की है जिसमें यूनीसेफ भी सहयोगी की भूमिका में है लेकिन इस प्रयास में जितने आर्थिक संसाधनों की दरकार है वे पर्याप्त नहीं है इसके लिए जनभागीदारी को प्रोत्साहित करने की आवश्यकता है। यूनीसेफ का कहना है कि शिशुओं की अकाल मौत के ज्यादातर मामले निम्न आय वर्ग के परिवारों में होते हैं जहां कुपोषण ,शारीरिक दोष और मलिन वातावरण की समस्या बच्चे के जन्म से पहले ही मौजूद रहती है। ऐसे में अकेले सरकार के लिए इन स्थितियों को सुधारना मुमकिन नहीं है, इसके लिए समाज के हर जिम्मेदार व्यक्ति को सहयोगी की भूमिका में आना होगा।
देश में हर साल लगभग 59 लाख बच्चों की मौत 5 वर्ष से कम उम्र में हो जाती है। विश्व स्वास्थ्य संगठन, स्वास्थ्य मंत्रालय, यूनीसेफ व दूसरी संस्थाओं की रिपोर्ट बताती है कि आर्थिक वृद्धि के बावजूद भारत में बाल मृत्यु दर में कमी नहीं आ रही है। स्वास्थ्य मंत्रालय की वार्षिक रिपोर्ट 2016-17 में विश्व स्वास्थ्य संगठन के हवाले से बताया गया है कि पांच वर्ष से कम उम्रके बच्चों मं् सबसे अधिक मृत्यु नवजात शिशु संबंधी रोग (53 फीसदी) से होती है। इसके अलावा निमोनिया (15 फीसदी), डायरिया (12 फीसदी), खसरा (3 फीसदी) और चोट या दुर्घटनाओं (3 फीसदी) से बच्चों की मौत होती है। ‘सेव द चिल्ड्रन’ की रिपोर्ट के अनुसार, दो तिहाई से अधिक नवजात शिशुओं की मृत्यु पहले महीने में ही हो गई। इनमें से 90 फीसदी मृत्यु निमोनिया और डायरिया जैसे बीमारियों से हुई जिनका इलाज आसानी से हो सकता था। वर्तमान में नवजात बच्चों की मृत्यु दर 48 (प्रति 1,000) है, जबकि वर्ष 2015 में यह 43 थी।यूनिसेफ की रिपोर्ट का अनुमान है कि यदि सरकारों ने अपना रवैया नहीं बदला, तो साल 2030 तक दुनिया में उपचार योग्य बीमारियों के चलते 6.9 करोड़ बच्चों की मौत पांच साल से कम उम्र में ही हो सकती है
स्वास्थ्य विभाग के वार्षिक सर्वेक्षण के अनुसार मां को उचित पोषण न मिलने के कारण बच्चे कमजोर पैदा हो रहे हैं। जन्म के समय बच्चे अपने औसत वजन से बहुत कम के पैदा होते हैं। विभन्न सरकारी और गैर सरकारी स्वास्थ्य सर्वेक्षणों में रेखांकित किया गया है कि शिशु मृत्यु और प्रसव काल में माताओं की मृत्यु के कारण ऐसे हैं, जिन्हें रोका जा सकता है।
देश में स्वास्थ्य सेवाओं को गांव गुवाड़ तक पहुंचाकर हर नागरिक को समय पर सम्यक चिकित्सा सुविधा की व्यवस्था करनी होगी । साथ ही सरकारी सुविधाएँ बिना भेदभाव और लाग लपेट के हर माता तक पहुँचाने के लिए सरकार और समाज को मिलजुल कर प्रयास करने होंगे। कुपोषण पर नियंत्रण कर गरीब और जरूरतमंद गर्भवती माता को पौष्टिक आहार सुलभ करने की दिशा में तेजी से प्रयास करने होंगे तभी नवजात शिशुओं की मृत्यु पर रोक लगाई जा सकती है।

बाल मुकुन्द ओझा
वरिष्ठ लेखक एवं पत्रकार
D-32, माॅडल टाउन, मालवीय नगर, जयपुर
9414441218

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