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खून की प्यासी देश की सड़कें क्यों ?

सावधानी हटी और दुर्घटना घटी। इस उक्ति का कोई अर्थ नहीं रहा। सड़क पर सरपट दौड़ती गाड़ियांए और उससे भी तेज़ सरपट भागती मौत। यह कहानी हमारी सड़कें रच रहीं हैं। बेफिक्रए बेपरवाह रफ़्तार की मदान्धता में चूर देश का युवा और अन्य वर्ग अपने जिंदगी को मौत के घाट बगैर कीमत वसूल किए गंवा रहा है। न घर के अन्य सदस्यों की परवाहए न चिंताए न फ़िक्र। वह पागल तो रफ़्तार के आगे हुआ जा रहा है। आज के वैश्विक दौर में जिंदगी और कारोबार से तेज सड़कों पर मौत घूम रही है। इस रफ़्तार के सौदागरो में देश की युवा पीढ़ी की अधिकता है। आज का युवा सबसे ज्यादा मुसीबतों को इसलिए झेलता हैए क्योंकि उसकी आँखों पर आगे रहने का जो चश्मा चढ़ चुका है। वह उसका पीछा नहीं छोड़ रही। आज युवाओं की जान पर सेखीए और शान हावी है। रफ़्तार के जादूगर बनने निकलते हैंए लेकिन यमराज का बुलावा पहले आ जाता है। हमारी युवा पीढ़ी अगर आज तक किसी चीज़ से अनभिज्ञ बनी है। तो वह हैए नैतिक और सामाजिक जिम्मेदारी। अब ऐसे में जो नैतिक औऱ सामाजिक जिम्मेदारी नहीं समझ सकताए वह अपने जिंदगी के अर्थ को क्या समझ सकता है। तमाम नियमए कायदे.कानून का निर्माण। फ़िर भी सड़क पर दौड़ती मौत पर अंकुश नहींघ् फ़िर कमी मात्र सरकारी तंत्र की ही नहीए कमी तो हमारे लोकशाही व्यवस्था की भी हैए जिसे नियम तोड़ने में मज़ा आता है।

आज विशेषकर युवा इतने लापरवाह हो चले हैं कि तेज रफ्तार से बाइक चलाने और जान जोखिम में डाल कर मोबाइल पर बात करना अपनी शान समझते है। तभी सड़क दुर्घटनाओं की प्रतिशत मौत में युवाओं की संख्या काफ़ी अधिक है। अगर 2016 की सरकारी रिपोर्ट में दुर्घटना के कम होने की बात की गईए लेकिन मरने वालों की तादाद बढ़ी है। देश की सड़के ख़ूनी की आदी हो गई है। सरपट दौड़ती जिंदगी में मौत कब गले को चूम ले। इसका पता नहींए लेकिन फ़िर भी सरकार अपनी तरफ़ से सड़क दुर्घटनाओं पर काबू पाने के लिए अपने तरफ़ से कटिबद्ध दिखती है। देश में हर वर्ष लाखों लोग सड़क दुर्घटनाओं में अपनी जान गंवाते हैं। केंद्र सरकार इसको लेकर सजग भी है। जिसका पता इससे चलता हैए कि जहां पिछले वर्ष सड़क हादसों में कमी आई थी। वहीं इस साल हादसों के साथ मौत की संख्या में भी कमी आई है। अब बात ज्वलंत यह बनती हैए क्या देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था में सभी जिम्मदरियाँ सरकारों की ही है। सरकार नियम बना सकती है। मौत की स्पीड़ निर्धारित नहीं कर सकती न। हमारे देश की व्यवस्था में हव्वा ऐसा बन गया हैए दर्द कुछ भी होए दवा सिर्फ़ सरकार ढूढे। यह समस्या समझ में आती हैए कि हमारी लोकतांत्रिक व्यवस्था ने अंग्रेजों की बुराइयों को कूट.कूट कर अपनायाए लेकिन अच्छाई एक भी नहीं। बात सड़क सुरक्षा से ही कर लो। अंग्रेजी हुकूमत 300 वर्ष की योजना बना कर चलती थीए हमारा देश अब पांच साल की योजना पर आ गया। सड़कों को लेकर तो डेंटिंग पेंटिंग होए तो पांच सालए नहीं तो एक बारिश में सड़क कम मौत के गड्ढे ज्यादा नज़र आते हैं। ऐसी व्यवस्था को तो सरकारों को बदलना चाहिए।

केंद्रीय सड़क परिवहन मंत्रालय की रिपोर्ट के मुताबिक 2016 में सड़क हादसों में 4ण्1 फीसद की कमी आई। लेकिन मरने वालों की तादाद 3ण्2 फीसद बढ़ गई। पिछले साल देश में कुल 4ए80ए652 सड़क दुर्घटनाएं हुईं। इनमें 1ए50ए785 लोगों को जान से हाथ धोना पड़ा और 4ए94ए624 लोग घायल हुए। वहीं इसके पहले 2015 में 5ए01ए423 सड़क हादसों में 1ए46ए133 लोगों की मौत हुई थी और 5ए00ए279 लोग घायल हुए थे। लेकिन जो 2017 के छह माह के भीतर के आंकड़े आए हैंए उनका रुख उत्साहजनक मालूल पड़ता है। इनमें दुर्घटनाओं के साथ.साथ मरने वालों की संख्या भी 2016 के मुकाबले कमतर दिख रही है। इस वर्ष की पहली छमाही में सड़क दुर्घटनाओं में 3 फीसद की कमी हुई है। वहीं मरने वालों की संख्या 4ण्75 फीसद घट गई है। इस दौरान जहां 25 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में हादसों में मौतें कम हुई हैंए वहीं रिपोर्ट के मुताबिक उत्तर प्रदेशए बिहारए असम और ओडिशा में मरने वालों की तादाद बढ़ी है। देश में वर्ष 2016 के दौरान प्रति दिन 1317 तथा प्रति घंटे 55 सड़क दुर्घटनाएं हुईं। राष्ट्रीय राजमार्गों पर 29ण्6 फीसद दुर्घटनाएं हुईं ए और 34ण्5 फीसद लोग मारे गए। वहीं स्टेट हाईवे पर 25ण्3 प्रतिशत दुर्घटनाएं तथा 27ण्9 प्रतिशत मौतें हुईं। अन्य सड़कों पर 45ण्1 प्रतिशत दुर्घटनाओं में 37ण्6 प्रतिशत मौतें हुईं। दुर्घटनाओं की मुख्य वजह देश के भीतर खराब तरीके से वाहन चलाना सबसे बड़ी महामारी है। सड़क दुर्घटनाओं में मरने वालों में सबसे ज्यादा 34ण्8 प्रतिशत दुपहिया चालक हैं। अगर आज के आंकड़े कहते हैंए कि सड़क पर नियमों के पालन में शिक्षित समाज ज़्यादा पिछड़े हैं। फ़िर कम पढ़े.लिखों से क्या उम्मीद की जाए। विश्व भर में रोड दुर्घटनाओं के लिए विख्यात हमारे देश मे गहन छानबीन से 2016 सड़क दुर्घटनाओं में कई अनछुए पहलू उभरकर आए हैं। जिसका ज़िक्र शायद कभी ओर हुआ हो।

जो सड़क दुर्घटनाओं को लेकर हमारी सोच को ही उलट देंगे। सड़क हादसों को लेकर सड़क परिवहन मंत्रालय की रिपोर्ट कहती है दुर्घटनाओं के शिकार लोगों में अशिक्षितों की तुलना में शिक्षितों की संख्या अधिक रही। फ़िर हम कैसे विचार करेए कि कभी हमारे यहां की सड़कें हादसों की शिकार नहीं होगीघ् इसके अलावा रिपोर्ट के अनुसार सबसे ज्यादा रोड एक्सिडेंट दोपहर तीन बजे से शाम छह बजे के बीच होते हैंए जब सड़क पर भरपूर प्राकृतिक रोशनी होती है। इसको किस नज़र से देखेंघ् आम तौर पर शांत समझा जाने वाला चेन्नई सड़क हादसों के लिहाज से देश सबसे ज्यादा खतरनाक है। सड़क दुर्घटनाओं के कारण इंजीनियरिंग की गलतियां भी हैंए क्योंकि कई बार यह पता चलता है कि आर्थिक रूप से व्यवहार्य नहीं होने पर डीपीआर बनाते समय पुलए आदि को छोड़ दिया गया और यह दुर्घटनाओं के कारण बनते हैं। सड़क सुरक्षा और अपनी जान की कीमत समझने के लिए नये आयु वर्ग के लोगों में अधिक जागरुकता लाने की आवश्यकता है। इसके साथ सड़क यातायात नियमों और सड़क सुरक्षा उपायों को सुचारू रूप से पालन करना होगाए तभी मौत की मंडी बनती सड़कें अपना खून धो सकती हैं।

महेश तिवारी
स्वतंत्र टिप्पणीकार
सामाजिक और राजनीतिक विषयों पर लेखन
9457560896

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