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खेत को प्रयोगशाला बनाते वैज्ञानिक किसान

डाॅ. राजेन्द्र प्रसाद शर्मा

खेत को प्रयोगशाला बनाते वैज्ञानिक किसान जहां एक और अन्नदाता को केन्द्र मेें रखकर आज देश में राजनीतिक लाभ उठाने के प्रयासों में तेजी आई हैं वहीं धरती से जुड़े किसानों के सच्चे हितेषी उन धरती पुत्रों को सामने लाने में लगे हैं जो कर्म को ही धर्म मानते हुए खेती के क्षेत्र में नवाचार करने में जुटे हैं। देश में बहुत से किसान पुत्र पूरे मनोयोग से कृषि कार्य को आसान बनाने, कृषि लागत में कमी लाने, कृषि उत्पादन बढ़ाने और कृषि क्षेत्र में मूल्य संवर्द्धन जैसे कामों में जुटे हुए हैं। गुमनामी में देश के लिए बढ़ा काम करने वाले ऐसे सच्चे सेवकों को सामने लाने के प्रयासों में एक कदम और बढ़ाते हुए वैज्ञानिक किसान पुस्तिका एक मिसाल है। डाॅ. महेन्द्र मधुप ने अपना पूरा जीवन जहां अन्नदाता को संमर्पित किया हैं वहीं जीवन के उत्तरार्द्ध में भी पहले खेतों के वैज्ञानिक और अब सात राज्यों के 17 किसान वैज्ञानिकद्वारा खेत को ही प्रयोगशाला बनाकर किए जा रहे प्रयासों को सामने लाकर बड़ा सराहनीय प्रयास किया है। इसे इस मायने में भी महत्वपूर्ण माना जा सकता है कि एक और सरकार अपने पूरे लवाजमें के साथ किसानों की आय को पांच साल में दो गुणा करने के संकल्प के साथ जुटी हुई हैं वहीं देश में ऐसे बहुत से किसान वैज्ञानिक है जो अपने एकल प्रयासों से खेती-किसानी को नई दिशा देने में अपने सीमित संसाधनों से जुटे हुए हैं। डाॅ. मधुप के प्रयास इस मायने मंे सराहनीय हो जाते हैं कि ऐसे किसान वैज्ञानिकों और उनके द्वारा किए जा रहे प्रयासों को पुस्तिका के माध्यम से सामने लाने का सार्थक प्रयास शुरु किया है। यह उनकी दूसरी पुस्तिका है।  अन्नदाता के तेजी से होते खेती से मोहभंग, देश के अनेक हिस्सों में किसान आंदोलन और अन्नदाता के नाम पर राजनीतिक रोटियां सेंकने के दौर में समग्र पयासों से देश में बढ़ता कृषि उत्पादन आशा की नई बयार लेकर सामने आ रहा है। यह सही है कि देश में कृषि क्षेत्र में तेजी से विकास और कृषि पैदावार में भी तेजी से बढ़ोतरी हुई है। किसानों की आय में पांच साल में दो गुना करने का सपना भी सरकार द्वारा दिखाने के साथ ही इस दिशा में काम होता भी दिख रहा हैं, दूसरी और किसानों को उनकी लागत का पैसा भी नहीं मिलना बेहद चिंतनीय है। चिंतनीय यह भी है कि देश में आज भी लाखों टन अनाज रखरखाब के अभाव में खराब हो जाता है। किसानों को अपने उत्पाद सड़क पर फेंकने को मजबूर होना पड़ता है। हांलाकि सरकार कृषि विज्ञान केन्द्रों के माध्यम से किसानों तक आधुनिक तकनीक पहुंचाने का प्रयास कर रही है। पर सबसे बड़ी बात देश के कुछ प्रगतिशील किसानों द्वारा अपने प्रयासों से खेती और किसानी को दी जा रही दिशा उल्लेखनीय है। देश के कोने कोने में ऐसे अनेक किसान मिल जाएंगे जो अपने प्रयासों से खेती में नवाचार कर खेती को नया रुप दे रहे हैं। हांलाकि यह दुर्भाग्य ही माना जाएगा कि ऐसे प्रगतिशील किसानों की मेहनत को जो सम्मान मिलना चाहिए और दूसरे किसानों को प्रेरित करने के लिए इन्हें आदर्श के रुप में प्रस्तुत किया जाना चाहिए, वह  हो नहीं पा रहा है। इस दिशा में सरकारी प्रचार तंत्र भी अधिक कुछ नहीं कर पा रहा। आकाशवाणी और दूरदर्शन के कृषि दर्शन की पहुंच अधिक होने के बावजूद मीडिया के बदलते स्वरुप में अन्नदाता की आवाज कहीं दबी ही रह जाती है। हांलाकि किसान आंदोलन और आंदोलन के दौरान होने वाली हिंसा प्रतिहिंसा तो प्रमुखता से प्रचारित हो जाती है, किसानों की कथित आत्महत्याएं भी बहुप्रचारित हो जाती है क्योंकि इनके राजनीतिक मायने होते र्हैं पर खेत खलिहान में अपने बल पर खेती को नई दिशा देने वाले किसान को मीडिया में जगह भी मिलती है तो अखबार के अंदर के पेज के किसी कोने या साप्ताहिक पाक्षिक अखबार में।  ऐसे में राजस्थान के डाॅ. महेन्द्र मधुप जैसे किसानों के लिए जीवन खपा देने वाले लोग कम ही देखने को मिलते हैं। यहां डाॅ. मधुप का यशोगान उद्देश्य नहीं होकर उनके द्वारा किए जा रहे एकल प्रयासों का सम्मान किया जाना महत्वपूर्ण है। देश के कोने कोने के प्रगतिशील किसानों को लेखनी से सम्मान देने का वैज्ञानिक किसान जीता जागता उदाहरण है। देश के अन्नदाता का खेती से मोहभंग होना देश की अर्थव्यवस्था के लिए गंभीर चुनौती है। अर्थव्यवस्था मंें कृषि की आज भी बहुत महत्वपूर्ण भूमिका है। आज भी रोजगार के मामलें में 60 फीसदी आबादी खेती-किसानी पर निर्भर है। कृषि उत्पादन में कमी या मानसून की बेरुखी पूरी अर्थव्यवस्था को प्रभावित कर देती है। खाद्यान्न की कमी से दुनिया के बहुत से देश जूझ रहे हैं। ऐसे में दो एक साल पहले देश के 18 राज्यों में 137 जिलों में कराए गए सर्वें के परिणाम निश्चित रुप से गंभीर चुनौती भरे हैे। देश के 61 फीसदी किसान खेती छोड़ना चाहते हैं। इसी सर्वें में यह परिणाम भी आया है कि गांवों के केवल 20 फीसदी युवा ही खेती-बाड़ी में रुचि दिखा रहे हैे। सर्वे के नतीजे यह भी बताते हैं कि 70 फीसदी किसान खेती के अलावा कोई दूसरा काम करना चाहते हैं। इसी तरह से 60 प्रतिशत से अधिक किसान चाहते हैं कि उनके बच्चे शहर में रहे। यह निश्चित रुप से देश के नियंताआंे के लिए आंख खोल देने वाला परिणाम है।  वैज्ञानिक किसान पुस्तिका में महेन्द्र मधुप ने राजस्थान, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, महाराष्ट्र्, मध्यप्रदेश और जम्मू कश्मीर के 17 प्र्रगतिशील किसानों की मेहनत की सौंधी सौंधी खुसबू को सामने लाने का प्रयास किया है। यह उन प्रगतिशील किसानों का सम्मान है जो अपने बल बूते पर खेती किसानी को नई दिशा दे रहे हैं। यह उस अन्नदाता का सम्मान है जो अपनी रिस्क पर कुछ नया करने में जुटा है। डाॅ. मधुप ने अपने प्रयासों से अपनी मेहनत से खेती को नई दिशा दे रहे प्रगतिशील किसानों को आगे लाए हैं, इसमें कोई दो राय नहीं कि इस तरह के बहुत से किसान अभी भी सामने नहीं आ पाए होंगे। पर सरकार को इस तरह के किसानों को किसानों का रोल माॅडल बनाकर सामने लाना चाहिए। इनके प्रयासों को पहचान देनी चाहिए, इनके खेत को प्रयोगशाला बनाकर दूसरे किसानों को प्रशिक्षित करना चाहिए। क्योंकि यह किसान चाहे बीज बना रहे हो, चाहे खाद बना रहे हो, अपने बलबूते अधिक उत्पादन या पानी बचाने या लागत कम करने के प्रयास कर रहे हो या कृषि को आसान बनाने के लिए सस्ते यंत्र विकसित कर रहे हो, इनकी मेहनत और इनका कार्यस्थल ही प्रयोगशाला है और देखा जाए तो यह प्रयोगशाला कागजी नहीं होकर अधिक व्यावहारिक है, इसे देखते हुए सरकार डाॅ. मधुप व इनकी तरह ही खेती किसानी को मजबूती प्रदान करने में जुटे रथियों का सहयोग लेकर देश की खेती किसानी को आगे बढ़ाने के प्रयास करने चाहिए। मीडिया को भी ऐसे किसानोें को आगे लाना होगा वहीं किसानों को लेकर आए दिन होने वाले आंदोलनों से परे किसानों के सच्चे हितेषी इन किसानों को प्रोत्साहित किए जाने की आवश्यकता है ताकि आय को दोगुणी करने का सकल्प और आसन्न खाद्यान्न् संकट के साथ ही पोष्टिक खाद्यान्नों के उत्पादन को बढ़ावा दिया जा सके। 

डाॅ. राजेन्द्र प्रसाद शर्मा,

रघुराज, एफ-2, रामनगर विस्तार, चित्रांष स्कूल की गली,

ज्योति बा फूले काॅलेज के पास, स्वेज फार्म, सोडाला, जयपुर-19फोन-0141-2293297  मोबाइल-9414240049

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