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गंदे बोल की राजनीति से लोकतान्त्रिक परम्पराएं ध्वस्त

गुजरात की चुनावी राजनीति में इन दिनों आपत्तिजनक और विवादित बयानों को लेकर हंगामा मचा हुआ है। सियासत में विवादास्पद बयान को नेता भले अपने पॉपुलर होने का जरिया मानें, लेकिन ऐसे बयान राजनीति की स्वस्थ परंपरा के लिए ठीक नहीं होते। चुनावी सीजन आते ही नेताओं की गंदी बात शुरू होजाती है। यह बेहद दुखद है कि पिछले कुछ सालों से भारत में राजनीतिक-वैचारिक पतन तो हुआ ही है, साथ ही राजनीति की भाषा स्तरहीन और गंदी हो गई है। हमारे माननीय नेता आजकल अक्सर ऐसी भाषा का इस्तेमाल कर रहे हैं, जिससे हमारा सिर शर्म से झुक जाता है। देश के नामी-गिरामी नेता और मंत्री भी मौके-बेमौके कुछ न कुछ ऐसा बोल ही देते हैं, जिसे सुनकर कान बंद करने का जी करता है। जो किसी भी हालत में लोकतान्त्रिक और सभ्य समाज के अनुकूल नहीं कही जा सकती। राजनीति में एक दूसरे के उपर कीचड़ उछालना आम बात है लेकिन शायद हम भूल जाते है की कीचड़ हमारे दामन में भी दाग लगा सकती है । इस समय भारतीय राजनीति में मर्यादा,विवेक, परम्परा,बंधुत्व तथा सद्भावना को तिलांजलि देने का कुत्सित प्रयास हो रहा है। गुजरात में पिछले 22 सालों से भाजपा सत्तासीन है। मौत के सौदागर से शुरू हुए गंदे बोल अब नीचता पर उत्तर आये है। कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गाँधी ने मौत के सौदागर कह कर नरेंद्र मोदी को सत्ता के ऊंट पर सवार होने का अवसर दिया था। लगातार चार चुनाव में यह बयान खूब भुनाया गया। इस बार मोदी प्रधानमंत्री है और गुजरात की चुनावी कमान उन्हीं के हाथों में है मगर विवादों और गंदे बोलों की राजनीति जैसे थमने का नाम नहीं ले रही है। भाजपा इसे अपने पक्ष में भुनाने में कहीं कोई गलती नहीं कर रही है। अब जबकि मतदान का पहला चरण शनिवार से शुरू हो रहा है कांग्रेस के नेता जाने अनजाने एक बार फिर अपने गंदे बोलों से गुजरात की सत्ता की चाबी भाजपा को सौंपने जा रहे है। इस बार पूर्व केंद्रीय मंत्री मणिशंकर अय्यर ने गंदे बोल बोले है। अय्यर ने मोदी को नीच कह कर सियासत को गरमा दिया है हालाँकि कांग्रेस ने अय्यर को पार्टी से ससपेंड कर डैमेज कण्ट्रोल का प्रयास किया है। प्रधानमंत्री ने इसे गुजरात का अपमान कहकर मतदाताओं से मतदान के दिन बदला लेने का आह्वान किया है।
राजनीति में पिछले एक दशक से गंदे और विवादित बोल बोले जा रहे है। बिहार चुनाव में मोदी को राक्षस और नर पिशाच तक कहा गया। यूपी चुनाव में भी इसकी पुनरावृति हुई। देश में कई नेता अपने विवादित बयानों के लिए सुर्खियों में रहे है। इनमें दिग्गी राजा, लालू और उसके बेटे, मणिशंकर अय्यर, केजरीवाल ,गिरिराज सिंह , आजम खान ,असदुद्द्दीन ओवैसी फारुख अब्दुला, मायावती और ममता प्रमुख है जिनके बयानों से गाहे बगाहे राजनीति की मर्यादाएं भंग होती रहती है। जबसे मोदी देश के प्रधानमंत्री बने है तब से लोकतान्त्रिक परम्पराएं तार तार करने में कुछ नेता लगातार जुटे है। मोदी का प्रधानमंत्री बनना उनको पंच नहीं रहा है ।
गुजरात विधान सभा के चुनाव ने लोकतंत्र की मर्यादाओं को तार तार करके रख दिया है। जैसे-जैसे चुनाव आगे बढ़ते जा रहे हैं, नेताओं की जुबान तल्ख और गंदी होती जा रही है। रामायण और महाभारत के युद्धों में भी कभी ऐसे सियासी बोल सुनने को नहीं मिले जो देशवासियों को चुनाव में सुनने को मिल रहे है। देवासुर संग्राम की भी कुछ मर्यादा थी मगर गुजरात चुनाव ने दिन में तारे दिखा दिए है। लोकतंत्र को भीषण क्षति पहुँचाने में सभी राजनीतिक दल और नेता एक दूसरे को पीछे छोड़ रहे है। पार्टी विथ डिफरेंस का दावा करने वाली पार्टी भाजपा इस समय केंद्र में सत्तारूढ़ है। इस पार्टी के नेताओं के बयानों से पूरा देश आहत है। प्रधान मंत्री भी ऐसे ऐसे बोल बोल रहे है जो हमारी लोकतान्त्रिक परम्पराओं को धवस्त कर रहे है। आजादी के गर्भ से निकलने वाली कांग्रेस पार्टी ने अपने गंदे बोलों से जैसे लोकतंत्र की बुनियाद को हिलाकर रख दिया है। किसी को सरे आम बलात्कारी और माफिया बताया जा रहा है तो कोई सुन्दर चेहरे की बात कर रहा है। कहीं बेटियों की इज्जत पर हमला हो रहा है तो कहीं जाति और धर्म की बात हो रही है। कहीं प्रधानमंत्री को रावण बताया जा रहा है।
बात गुजरात चुनाव को लेकर हो रही है। पहले चायवाला और अब नीच कह कर कांग्रेस ने नेता न केवल अपनी कुंठा व्यक्त कर रहे है अपितु सत्ता की चाबी भी भाजपा को सौंपने की तैयारी कर रहे है। यह तो चुनाव परिणाम ही बताएगा कि उनके विवादित और गंदे बोल का गुजरात के चुनावों पर क्या असर पड़ेगा। फिलहाल राजनीति का मदमस्त हाथी सामने वाले को कुचलने के लिए तैयार बैठा है। बस अग्नि को तूफान का इंतजार है।

बाल मुकुन्द ओझा
वरिष्ठ लेखक एवं पत्रकार
क्.32, माॅडल टाउन, मालवीय नगर, जयपुर
9414441218

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