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गांधी जयंती के परिप्रेक्ष्य में : जीवन दाता है रक्त प्रदाता

महात्मा गाँधी जयंती पर अक्सर रक्तदान की परंपरा है क्योंकि गांधी का मानना था कि व्यक्ति अगर किसी के प्रति सेवा भाव के लिए प्रवृत्त हो तो वह किसी भी रूप में मानवता के लिए काम आ सकता है, फिर चाहे श्रम सेवा हो,अर्थ सेवा हो, ज्ञान सेवा हो, कार्य सेवा हो या निज रूप में देह दान हो या रक्त दान । अगर व्यक्ति कि ईच्छा शक्ति प्रबल हो तो तो वह भी किसी जीव की रक्षा का भार अपने ऊपर ले सकता है। गांधी जी के मार्ग पर चलने वाले अक्सर इस भाव को जिंदा रखने हेतु रक्तदान के लिए लोगों को जागृत करते हैं और इस रक्तदान परंपरा की अहमियत को समझाते हैं कि हमारे द्वारा दिया गया आधा लीटर रक्त तीन लोगों की जान बचा सकता है। रक्तदान के प्रति जागरूकता जिस स्तर पर लाई जानी चाहिए थी, उस स्तर पर इतने लोग जागरूक तो नहीं हुए पर प्रयास अनवरत जारी है कि इस मुहिम के माध्यम से पूरे देश में कहीं पर भी रक्त की जरूरत को पूरा किया जा सके। तकनीकी विकास के साथ निजी व प्रशासनिक तौर पर वेबसाइट्स के माध्यम से ब्लड बैंक व स्वैच्छिक रक्तदाताओं की सूची को बनाने का कार्य आरंभ हुआ। भले ही इसमें थोड़ी बहुत सफलता जरूर मिली हो लेकिन संतोषजनक हालात अभी भी नहीं बन पाए हैं।

स्वैच्छिक रक्तदान को बढ़ावा देने के लिए विश्व स्वास्थ्य संगठन ने वर्ष 1997 से 14 जून को विश्व रक्तदान दिवस के रूप में मनाने की घोषणा की। इस मुहिम के पीछे मकसद विश्वभर में रक्तदान की अहमियत को समझाना था।लेकिन दुनियां के सबसे बड़े लोकतंत्र भारत में इस मुहिम को उतना प्रोत्साहन नहीं मिल पाया जितना की अपेक्षित है। इसके पीछे सबसे बड़ा कारण लोगों में फैली भ्रांतियां हैं, जैसे कि रक्तदान से शरीर कमज़ोर हो जाता है और उस रक्त की भरपाई होने में काफी समय लग जाता है। इतना ही नहीं यह गलतफहमी भी व्याप्त है कि नियमित खून देने से लोगों की रोगप्रतिकारक क्षमता कम हो जाने के कारण बीमारियां जल्दी जकड़ लेती हैं। ऐसी मानसिकता के चलते रक्तदान लोगों के लिए हौवा बन गया है जिसका नाम सुनकर ही लोग सिहर उठते हैं. ऐसी ही भ्रांतियों को दूर करने के लिए ही विश्व स्वास्थ्य संगठन ने इस आयोजन की नींव रखी, ताकि लोग रक्तदान के महत्व को समझ जरूरतमंदों की सहायता करें. थैलीसीमिया एक ऐसी बीमारी है जिसके चलते एक निश्चित अवधि के बाद खून बदलवाने की आवश्यकता पड़ती है, यह अवधि मरीज की आयु पर आधारित होती है। जैसे-जैसे आयु बढ़ती जाती है, यह अवधि कम होने लगती है। इसी बात से यह अंदाजा लगाया जा सकता है कि थैलीसीमिया से ग्रसित रोगियों को हमारे और आपके द्वारा दान किए गए रक्त की कितनी जरूरत है।
रक्तदान के सम्बन्ध में चिकित्सा विज्ञान कहता है कि वह व्यक्ति जिसकी उम्र 16 से 60 साल के बीच और वजन 45 किलोग्राम से अधिक हो, जिसे एचआईवी, हैपिटाइटिस “बी” या “सी” जैसी बीमारी न हुई हो, वह रक्तदान कर सकता है। एक बार में जो 350 मिलीग्राम रक्त दिया जाता है, उसकी पूर्ति शरीर में चौबीस घण्टे के अन्दर हो जाती है और गुणवत्ता की पूर्ति 21 दिनों के भीतर हो जाती है। दूसरे, जो व्यक्ति नियमित रक्तदान करते हैं उन्हें हृदय सम्बन्धी बीमारियां कम परेशान करती हैं। तीसरी अहम बात यह है कि हमारे रक्त की संरचना ऐसी है कि उसमें समाहित रेड ब्लड सेल तीन माह में स्वयं ही मर जाते हैं, लिहाजा प्रत्येक स्वस्थ व्यक्ति तीन माह में एक बार रक्तदान कर सकता है।
गांधी जयंती पर रक्तदान उनके विचारों को सम्मान देने का बेहतरीन तरीका है। शायद मानवीयता हेतु रक्तदान का आह्वान आज हम सभी को अवश्य उद्देलित करेगा कि जीते जी हम किसी के काम आए तो इससे बढकर कोई और सुख भी नहीं होगा हमारे लिए। किसी के जीवन की रक्षा के लिए किया गया रक्तदान सबसे बड़ा दान है।

डॉ भावना शर्मा
मोदियो की जाव, झुंझुनूं राजस्थान
7877385350
[email protected]

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