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गुजरात चुनाव में गरमाई जनेऊ की सियासत

जनेऊ को लेकर इस समय देश की सियासत गरमाई हुई है। कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गाँधी वर्तमान में गुजरात चुनाव के घमासान में फंसे हुए है जहाँ उन्हें लेकर नित नए धमाके हो रहे है। अब वे महाभारत के अभिमन्यु साबित होंगे या अर्जुन यह तो चुनाव परिणाम से ही पता चल सकेगा। बहरहाल ये चुनाव किसी महाभारत से कम नहीं है। संभवत यह किसी राज्य की विधानसभा का यह पहला चुनाव है जहाँ देश के प्रधानमंत्री की इज्जत दांव पर लगी है। कांग्रेस ने राहुल गाँधी को जनेऊधारी बता कर एक नए विवाद को जन्म दिया है। इसी के साथ उन्हें जनेऊ पहने भी दिखाया गया है। अब जनेऊ कैसे पहनी गई है यह भी विवाद का विषय हो सकता है। मगर यह सच है कि कांग्रेस ने जनेऊ कार्ड का यह विवाद खड़ा कर न केवल सबसे बड़ा जुआ खेला है अपितु देश में एक नई बहस को पैदा कर दिया है। यह सम्पूर्ण विवाद सोमनाथ मंदिर को लेकर उत्पन्न हुआ जहाँ मंदिर के रजिस्टर में उन्हें गैर हिन्दू के तौर पर एंट्री कराई गई है। मंदिर के नियमों के मुताबिक गैर हिन्दुओं को रजिस्टर में एंट्री करनी जरूरी होती है। विवाद की जड़ भी यहीं से शुरू हुई और कांग्रेस को यह गैर जरुरी सफाई देनी पड़ी कि राहुल गांधी ‘जनेऊधारी हिन्दू’ है। भाजपा सहित देश के अन्य राजनीतिक दल तत्काल इस लड़ाई में कूद पड़े। इससे हमारी राजनीति मुद्दाविहीन हो गई।
विधानसभा चुनाव में कहां तो कांग्रेस और बीजेपी शुरू में दावा कर रहे थे कि विधानसभा का चुनाव विकास के मुद्दे पर लड़ा जाएगा तो बात जातिगत समीकरणों से लेकर जनेऊ तक आ गई है। कांग्रेस को अंदाजा भी नहीं था कि बीच चुनाव में वह ऐसे विवाद में फंस जाएगी जहां उसको राहुल गांधी को हिंदू साबित करना पड़ जाएगा। इसी के साथ कौन हिन्दू है और कौन नहीं इस पर आरोप प्रत्यारोपों की राजनीति जोरशोर से खड़ी हो गई है।
जनेऊ आखिर है क्या और इसे लेकर इतना विवाद क्यों उत्पन्न हुआ है। यह हम सब को जानना बेहद जरुरी है। जनेऊधारियों को इसके महत्व और उपयोगिता की जानकारी के साथ-साथ इसकी पवित्रता की समझ होना आवश्यक है। जनेऊ भले एक धागा लगता हो पर यह एक पवित्र संदेश है,आस्था है, परम्परा है जो अनुशासन ,भाईचारे, प्रेम और आत्मबल का संबल बनता है।जनेऊ तीन धागों वाला एक सूत्र होता है। इसे उपनयन संस्कार जिसे यज्ञोपवीत संस्कार भी कहा जाता है, के समय धारण कराया जाता है। जनेऊ को संस्कृत भाषा में यज्ञोपवीत कहा जाता है। यह सूत से बना पवित्र धागा होता है, जिसे यज्ञोपवीतधारी व्यक्ति बाएँ कंधे के ऊपर तथा दाईं भुजा के नीचे पहनता है। ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य में यज्ञोपवित संस्कार यानी जनेऊ की परंपरा है। बालक के दस से बारह वर्ष की आयु का होने पर उसकी यज्ञोपवित की जाती है। पूर्व काल में जनेऊ पहनने के पश्चात् ही बालक को शिक्षा प्राप्त करने का अधिकार मिलता था।
जनेऊ एक विशिष्ट सूत्र को विशेष विधि से ग्रन्थित करके बनाया जाता है। यह केवल धर्माज्ञा ही नहीं, बल्कि आरोग्य का पोषक भी है, अत इसको सदैव धारण करना चाहिए। बहुत से लोग बाएं कांधे से दाएं बाजू की ओर एक कच्चा धागा लपेटे रहते हैं। इस धागे को जनेऊ कहते हैं। जनेऊ में मुख्यरूप से तीन धागे होते हैं। प्रथम यह तीन सूत्र त्रिमूर्ति ब्रह्मा, विष्णु और महेश के प्रतीक होते हैं। द्वितीय यह तीन सूत्र देवऋण, पितृऋण और ऋषिऋण के प्रतीक होते हैं और तृतीय यह सत्व, रज और तम का प्रतीक है। चतुर्थ यह गायत्री मंत्र के तीन चरणों का प्रतीक है। पंचम यह तीन आश्रमों का प्रतीक है। संन्यास आश्रम में यज्ञोपवीत को उतार दिया जाता है।
यह भी कहा जाता है जनेऊ पहनने का हमारे स्वास्थ्य से सीधा संबंध है। विवाह से पूर्व तीन धागों की तथा विवाहोपरांत छह धागों की जनेऊ धारण की जाती है। आचार्य बाल कृष्ण के अनुसार मल-मूत्र विसर्जन के पूर्व जनेऊ को कानों पर कस कर दो बार लपेटना पड़ता है। इससे कान के पीछे की दो नसे जिनका संबंध पेट की आंतों से है। आंतों पर दबाव डालकर उनको पूरा खोल देती है। जिससे मल विसर्जन आसानी से हो जाता है तथा कान के पास ही एक नस से ही मल-मूत्र विसर्जन के समय कुछ द्रव्य विसर्जित होता है। जनेऊ उसके वेग को रोक देती है, जिससे कब्ज, एसीडीटी, पेट रोग, मूत्रन्द्रीय रोग, रक्तचाप, हृदय रोगों सहित अन्य संक्रामक रोग नहीं होते। जनेऊ धारण करने से विद्युत प्रवाह नियंत्रित रहता है जिससे काम-क्रोध पर नियंत्रण रखने में आसानी होती है। जनेऊ से पवित्रता का अहसास होता है। यह मन को बुरे कार्यों से बचाती है। कंधे पर जनेऊ है, इसका मात्र अहसास होने से ही मनुष्य भ्रष्टाचार से दूर रहने लगता है।
वेदों के अनुसार स्वामी महर्षि दयानंद ने संस्कार विधि में तीन सूत्र को तीन आश्रमों के अनुसार बांटा है। उन्होंने यज्ञोपवीत में तीन धागों का पर्याय ब्रह्मचर्य आश्रम, गृहस्थ आश्रम और वानप्रस्थ आश्रम से लगाया है, जबकि उन्होंने माना है कि संन्यास आश्रम में यज्ञोपवीत को उतार दिया जाता है। स्वामी जी ने संस्कार विधि में यज्ञोपवीत के छह धागों में से तीन धागे स्वयं के और तीन धागे पत्नी के बतलाये हैं।
सनातन धर्म के अंतर्गत सूत के इन धागों को ब्रह्मा, विष्णु और महेश का प्रतीक माना गया है। जिस समय गुरु या आचार्य यज्ञोपवीत धारण करवाते हैं तो यज्ञोपवीत निम्न मंत्र के द्वारा धारण किया जाता है-

यज्ञोपवीतं परमं पवित्रं प्रजापतेर्यत्सहज पुरस्तात्।
आयुष्यमग्रम प्रतिमुंच शुभं यज्ञोपवीतं बलमस्तु तेज।

बाल मुकुन्द ओझा
वरिष्ठ लेखक एवं पत्रकार
डी-32, माॅडल टाउन, मालवीय नगर, जयपुर
मो.- 9414441218

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