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घर घर रावण पग पग लंका

भगवान राम ने बुराइयों के प्रतीक रावण का वध कर देश और दुनियां को भय, आतंक और डर से मुक्ति दिलाई थी। अब तो घर घर रावण रूपी बुराई और आतंक ने अपना साम्राज्य फैला रखा है जिसे समाप्त करने के लिए एक नहीं असंख्य राम की जरुरत है। दशहरा या विजयदशमी पर्व हम हजारों सालों से मानते आरहे है। राम सत्य और रावण बुराई का प्रतीक माना गया है। यह भी कहा जा सकता है कि यह अन्याय पर न्याय और अधर्म पर धर्म की विजय है। यह सतयुग की घटना बताई जा रही है। वर्तमान को हम कलियुग के रूप में जानते है। इसमें कितनी सच्चाई है यह तो बस ईश्वर ही जनता है। उस समय एक रावण मारा गया मगर आज तो हमारे सामने रावणों की फौज खड़ी है जो अलग अलग मुखोटे लगाए घर घर बुराई फैला रही है यानि आज एक नहीं अनेक रावण है जो विभिन्न बुराइयों के प्रतीक है। असली दशहरा तो तभी मनाने में मजा आये जब इन सभी रावणों का धूमधाम से वध हो। आज घर घर रावण पग पग लंका देखी जा रही है। कहीं गुफा वाले रावण है तो कहीं फल वाले रावण। कहीं नाचते गाते रावण देखे जा रहे है तो कहीं भक्त बने रावण। अब तो आस्था स्थलों पर भी जाते डर लगता है। जाने किस मोड़ पर रावण मिल जाये। एक गायक ने इन शब्दों में व्याख्या की है –
कलयुग बैठा मार कुंडली जाऊ तो मै कहाँ जाऊ
अब हर घर में रावण बैठा इतने राम कहाँ से लाऊ।
तुलसीदास कृत रामायण के अनुसार रावण ने सीता माता का हरण जरूर किया मगर सतीत्व से खिलवाड़ नहीं किया। वह अपनी बहन सूर्पणखां का बदला लेना चाहता था। रावण शादी के लिए डराता धमकाता रहा मगर कोई जोर जबरदस्ती नहीं की। मगर आज के रावण धर्मोपदेशक के रूप में हमारे साथ छल कपट करने पर उतारू है। आस्था के साथ सरेआम खिलवाड़ कर रहे है। बेटी और बहन के रिश्ते को तार तार कर रहे है और हम अंधे हो कर सब कुछ देखते हुए भी अनजान बने हुए है। जब तक हम ऐसे रावणों को नहीं पहचानेंगे तब तक आज की सीता की इज्जत यूँ ही लूटती रहेगी। आज के रावण स्वयं को रावण नहीं मानते वे अपने को राम मानकर चलते है। वे खुद को सच्चा और सामने वाले को झूठा ठहराने में तनिक भी विलम्ब नहीं करते। बहरहाल हम एक बार फिर विजयदशमी पर्व मना रहे है। सदा की तरह परिवार के साथ मैदान पर पहुंचकर रावण वध देखेंगे। मेले का आनद लेंगे। कुछ खाएंगे पियेंगे औए घर लौटकर पर्व की जुगाली करेंगे।
आइये हम भी इस कथा सारणी के पन्ने पलटे। दशहरा या विजयदशमी देश का एक प्रमुख त्योंहार है। दशहरा का अर्थ है, वह पर्व जो पापों को हर ले। अन्याय के युग के अंत का यह पर्व है। दशहरा भक्ति और समर्पण का पर्व है । आश्विन शुक्ल दशमी को विजयदशमी का त्योहार देश भर में लाखों लोगों द्वारा धूमधाम से मनाया जाता है। खुले स्थानों पर मेलों का आयोजन एवं राक्षसराज रावण कुम्भकरण और मेघनाथ के बड़े- बड़े पुतलों का प्रदर्शन किया जाता है। यह त्योहार हमें प्रेरणा देता है कि हमें अंहकार नहीं करना चाहिए क्योंकि अंहकार के मद में डूबे हुये व्यक्ति का एक दिन विनाश तय है। रावण बहुत बड़ा विद्वान और वीर व्यक्ति था परन्तु उसका अंहकार ही उसके विनाश कारण बना। दशहरा शब्द की उत्पत्ति संस्कृत के शब्द ‘दश- हर’ से हुई है जिसका शाब्दिक अर्थ दस बुराइयों से छुटकारा पाना है। दशहरा का पर्व दस प्रकार के पापों- काम, क्रोध, लोभ, मोह मद, मत्सर, अहंकार, आलस्य, हिंसा और चोरी के परित्याग की सद्प्रेरणा प्रदान करता है। विजयादशमी का यह त्योंहार बुराइयों पर अच्छाई का प्रतीक है। दशहरा अच्छाई की बुराई पर जीत का पर्व है। मर्यादा पुरुषोत्तम राम ने रावण का अंत कर दिया था लेकिन अच्छाई और बुराई के बीच की यह जंग आज भी जारी है।

बाल मुकुन्द ओझा
वरिष्ठ लेखक एवं पत्रकार
डी-32, माॅडल टाउन, मालवीय नगर, जयपुर
मो.- 9414441218

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