National Hindi Daily Newspaper
ब्रेकिंग न्यूज़

चुनाव विशेष : भाजपा आलाकमान को मानना पड़ा : धूमल ही दे सकते हैं वीरभद्र सिंह को टक्कर

हिमाचल प्रदेश में भाजपा आलाकमान ने बेशक खुले तौर पर विधानसभा चुनावों मे पार्टी का मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित न किया हो, लेकिन टिकट वितरण और पार्टी के पोस्टरों-बैनरों और होर्डिंग से यह बात साफ हो चुकी है कि दो बार राज्य के मुख्यमंत्री रह चुके प्रेम कुमार धूमल ही मुख्यमंत्री का चेहरा हैं. प्रदेश भाजपा के नेताओं ने भाजपा आलाकमान और केन्द्रीय चुनाव समिति के सामने साफ कर दिया है कि धूमल आज भी प्रदेश भाजपा में काफी प्रभावशाली हैं और उनको कमान सौंपे बिना पार्टी की जीत की गारंटी नहीं दी जा सकती है. प्रदेश भाजपा के इक्का-दुक्का नेताओं को छोड़कर सभी की एकमत राय थी कि चुनाव धूमल के नेतृत्व में ही लड़ा जाना चाहिए क्योंकि धूमल के कद का नेता हिमाचल भाजपा में कोई दूसरा नहीं है और धूमल पिछले डेढ साल से प्रदेश भर में दौरे कर भाजपा के मजबूत और एकजुट करने में जुटे थे. यदि चुनावों की बागडोर धूमल को नहीं सौंपी गई और टिकट वितरण में उनकी राय को अधिमान नहीं दिया गया तो पार्टी में बिखराव भाजपा के लिए नुकसानदेह हो सकता है. टिकट वितरण में प्रेम कुमार धूमल की राय पर ही अंतिम मोहर लगी है जिसपर शांता कुमार ने नाराजगी जाहिर की थी. प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के निर्देश पर अमित शाह ने उन्हें मनाने केन्द्रीय मंत्री जे. पी. नडडा को भेजा और अब शांता कुमार को पार्टी आलाकमान की राय से अवगत करा दिया गया है. नडडा ने उन्हें यह संदेश दे दिया है कि टिकट वितरण का फैसला काफी सोच-समझकर किया गया है और उसमें अब बदलाव संभव नहीं है. दरअसल शांता कुमार अपने चेहेतों के लिए टिकट चाहते थे. सिर्फ कांगड़ा में ही नहीं बिलासपुर में भी टिकट वितरण में धूमल की राय को ही अधिक महत्व देकर टिकट वितरण किया गया है. पूरे प्रदेश के टिकट वितरण में धूमल की राय पर ही अंतिम मोहर लगी है.
धूमल का विधान सभा क्षेत्र बदलने को लेकर कई कयास लगाये जा रहे हैं. हमीरपुर में पार्टी कार्यकर्ताओं की एक मीटिंग में धूमल भावुक हो गये और उनके आंसू छलक पड़े थे तो इसे मुख्यमंत्री घोषित न करने की टीस से जोड़ दिया गया, लेकिन ऐसा नहीं है. असल में वह कार्यकर्ताओं का स्नेह और समर्पण देखकर भावुक हो गये थे. हमीरपुर विधान सभा क्षेत्र बदलने को लेकर कार्यकर्ता उदास और हताश थे और सबने सामूहिक इस्तीफ़े देकर पार्टी छोड़ने का ऐलान किया था लेकिन समझाने पर पदाधिकारी और कार्यकर्ता मान गये हैं.
पार्टी ने यह फैसला सोच-समझकर लिया है. सुजानपुर विधान सभा का काफी बड़ा हिस्सा हमीरपुर विधानसभा में लगता था. सुजानपुर विधान सभा सीट से पिछली बार भाजपा के बागी राजेन्द्र राणा चुनाव जीतने में कामयाब गये थे. हालांकि बाद में कांग्रेस ने उनसे इस्तीफा दिलवाकर लोकसभा चुनाव लड़वाया था, जिसमें वह हार गये थे और विधान सभा उप चुनाव में भाजपा के पूर्व मंत्री जगदेव ठाकुर के सुपुत्र नरेन्द्र ठाकुर चुनाव जीत गये थे. लेकिन वह चुनाव धूमल के आशीर्वाद से ही जीत पाये थे. धूमल के सुजानपुर से चुनाव लड़ने से भाजपा हमीरपुर के अलावा मंडी में भी मजबूत होगी. हमीरपुर प्रेम कुमार धूमल का गृह क्षेत्र होने के कारण भाजपा का गढ़ माना जाता है. भाजपा हमीरपुर, कांगड़ा, ऊना और बिलासपुर में पहले ही मजबूत स्थिति में है. हालांकि पिछली बार कांगड़ा में शांता कुमार समर्थकों को अधिक टिकट मिलने और जमीनी कार्यकर्ताओं की अनदेखी से भाजपा के नुकसान उठाना पड़ा था. लेकिन इस बार मंडी से पूर्व केन्द्रीय मंत्री सुख राम परिवार के भाजपा में शामिल होने से यहां भी भाजपा के फायदा होगा, क्योंकि मंडी में सुखराम का अच्छा-खासा प्रभाव रहा है. कुल्लू में भी पिछली बार भाजपा के सांसद रहे महेश्वर सिंह अपनी अलग पार्टी बनाकर चुनाव लड़े थे लेकिन कुछ खास नहीं कर पाये थे लेकिन भाजपा को नुकसान तो उन्होंने पहुंचाया ही था लेकिन इस बार वह वापिस पार्टी में आ गये हैं और चुनाव लड़ रहे हैं तो निश्चित रूप से पार्टी को फायदा होगा.
पहले यह आशंका जताई जा रही थी जे. पी. नडडा प्रदेश राजनीति में केंद्रीय भूमिका में आना चाहते हैं. केन्द्रीय मंत्रिमंडल विस्तार के समय ऐसी खबरें चली कि धूमल को राज्यपाल बनाया जा रहा है तथा उनके सांसद पुत्र अनुराग ठाकुर को मंत्रिमंडल में जगह दी जा रही है लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ और यह मात्र अफवाहें थीं. उस समय प्रदेश के नेताओं ने साफ कहा था कि ऐसा कुछ नहीं हो रहा है और यदि भाजपा आलाकमान जे. पी. नडडा को थोपने की कोशिश करेगा तो इसके गंभीर परिणाम होंगे. भाजपा के एक वरिष्ठ नेता की कहना था, ‘अगर नड्डा को मुख्यमंत्री का उम्मीदवार घोषित किया जाता है तो भाजपा को फिर विपक्ष में बैठना पड़ेगा. उनका कहना था कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और अमित शाह के साथ नजदीकियों के अलावा राज्य में उनका कोई खास जनाधार नहीं है.’ ऐसा कहा जाता है कि प्रेम कुमार धूमल से मतभेदों के चलते ही 2010 में उन्होंने वन मंत्री के पद से इस्तीफा दिया था.
पिछले कई बार दशकों से यह परिपाटी बन गई है कि हिमाचल में एक बार कांग्रेस और एक बार भाजपा सत्ता में आती है. प्रदेश भाजपा के नेताओं का कहना है कि यदि इस बार धूमल को छोड़कर नड्डा को प्राथमिकता दी जाती है तो इतिहास बदल सकता है. यहां तक कि मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह के खिलाफ लगे भ्रष्टाचार के आरोप भी कांग्रेस को सत्ता में लौटने से नहीं रोक सकते. भ्रष्टाचार के उक्त आरोप पिछले चुनावों से पहले भी लगे थे लेकिन वीरभद्र सिंह सरकार बनाने में सफल हो गये थे. हालांकि भ्रष्टाचार के आरोपों के चलते कांग्रेस ने उन्हें आधिकारिक रूप से मुख्यमंत्री का उम्मीदवार नहीं बनाया था लेकिन फिर भी कांग्रेस जीत गई थी. इसलिए भाजपा इस बार कोई रिस्क नहीं लेना चाहती. वैसे भी नडडा पहले ही बयान दे चुके हैं कि वह केन्द्र में खुश हैं और अब जब समाचार पत्रों और मीडिया में कयास लगाये जाने लगे तो केन्द्रीय मंत्री और केन्द्रीय चुनाव समिति के अध्यक्ष जगत प्रकाश नडडा को सामने आकर बयान देना पड़ा कि मुख्यमंत्री पद पर कोई विवाद नहीं है लेकिन घोषणा कब करनी है, यह एक रणनीति के तहत किया जायेगा. माना जा रहा है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी अपनी हिमाचल रैली में धूमल के नाम की घोषणा करेंगे. वैसे भी गत शनिवार को केन्द्रीय चुनाव समिति की बैठक के बाद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और प्रेम कुमार धूमल के बीच करीब आधे घंटे तक बंद कमरे में मुलाकात हुई थी जिसमें धूमल ने सारी स्थिति से अवगत करा दिया था और नरेंद्र मोदी ने उन्हें साफ कर दिया है कि वही एकमात्र मुख्यमंत्री के दावेदार हैं. माना जाता है कि धूमल और जे पी नड्डा के बीच 36 का आंकड़ा है. धूमल से मतभेदों के चलते ही 2010 में नड्डा को राज्य के वन मंत्री पद से इस्तीफा देना पड़ा था. वन मंत्री पद से इस्तीफा देने के बाद भाजपा के तत्कालीन अध्यक्ष नितिन गडकरी ने उनकी संगठनात्मक क्षमता देखकर उन्हें पार्टी का राष्ट्रीय महासचिव का बना दिया था और वह केन्द्रीय राजनीति में आ गये थे. जे. पी. नड्डा अपनी कार्यकुशलता से मोदी और अमित शाह को प्रभावित करने में कामयाब रहे और उन्हें केंद्र में भाजपा सरकार में स्वास्थ्य मंत्री का पद दे दिया गया है लेकिन इसके बावजूद वह प्रदेश का मोह नहीं त्याग पाये हैं. नड्डा का संघ से पुराना संबंध रहा है. नडडा अखिल भारतीय विद्याार्थी परिषद के छात्र नेता रहे हैं और बाद में 2001 से 2004 के बीच भारतीय जनता के युवा मोर्चा में रहते हुए नितिन गडकरी और अमित शाह दोनों के साथ काम किया है.
लेकिन जगत प्रकाश नडडा के मुकाबले प्रेम कुमार धूमल अधिक लोकप्रिय नेता हैं और दो बार राज्य के मुख्यमंत्री, दो बार नेता विपक्ष और तीन बार लोकसभा सांसद रहे हैं. राज्य की राजनीति पर धूमल की अच्छी पकड़ है और प्रदेश के अधिकतर भाजपा नेताओं की पसंद हैं. धूमल 1998 से 2003 और 2007 से 2012 तक राज्य के मुख्यमंत्री रह चुके हैं. वह गैर कांग्रेस सरकार के पहले ऐसे मुख्यमंत्री रहे हैं जिन्होंने दोनों बार अपना कार्यकाल पूरा किया है. अपने व्यापक जनाधार के कारण भाजपा का कोई दूसरा नेता उनके करीब भी नहीं ठहरता है. धूमल के धुर विरोधी भी मानते हैं कि उन्हें दरकिनार करना पार्टी के लिए आसान नहीं है.
हालांकि कांग्रेस नेतृत्व और स्वयं वीरभद्र सिंह यह चाहते हैं कि भाजपा बिना सीएम चेहरे के चुनाव लड़े ताकि वह यह प्रचार कर सके कि भाजपा जे. पी. नडडा को मुख्यमंत्री बनायेगी और मुकाबला वीरभद्र बनाम नडडा हो जाए और बाजी कांग्रेस के हाथ लगे. कांग्रेस इस उम्मीद में है कि भाजपा बिना चेहरा या नडडा को मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित कर दे तो उसे फिर से सत्ता पर काबिज होने का मौका मिल सकता है. लेकिन भारतीय जनता पार्टी ने सोची-समझी रणनीति के तहत अभी मुख्यमंत्री के उम्मीदवार की घोषणा नहीं की है ताकि पार्टी को गुटबाजी से बचाने के साथ-साथ बागियों को चुनाव मैदान में उतरने से रोका जा सके. लेकिन पार्टी के बैंनरों, पोस्टरों और होर्डिंग से यह साफ हो गया है कि भाजपा की सरकार बनने पर उसका नेतृत्व प्रेम कुमार धूमल ही करेंगे और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की रैली में उनके नाम की घोषणा की जायेगी.

विजय शर्मा

Print Friendly, PDF & Email
Skip to toolbar