National Hindi Daily Newspaper
ब्रेकिंग न्यूज़

छात्रसंघ चुनाव की प्रासंगिकता पर सवाल

अगस्त का महीना आते ही कॉलेज के कैंपस में छात्रसंघ चुनाव की सरगर्मी सातवें आसमान पर पहुंच जाती है। जमींदोज छूटमुहे नेता अचानक से ही बाहर निकलने शुरु हो जाते है। कॉलेज परिसर से लेकर पूरे शहर में छात्रसंघ चुनाव के पेंपलेट से लेकर बड़े-बड़े होर्डिंग लगे हुए नजर आने लगते है। पैसों को पानी की तरह बहाया जाता है। नियमों को ताक पर रखकर अपराध को खुलेआम अंजाम दिया जाता है। छात्रनेता पिता की कमाई पर महंगी-महंगी गाड़ियों में दिन में कई लीटर पेट्रोल और डीजल जैसे महंगे संसाधन फूंक देते है। सिर्फ और सिर्फ अपना रुतबा दिखाने के चक्कर में हर आड़े-टेड़े हथकंडे अख्तियार किये जाते है। ऐसे में महत्वपूर्ण सवाल है कि आखिर छात्रसंघ चुनाव की क्या प्रासंगिकता है ? इन चुनावों से छात्रों को कितना फायदा मिल पा रहा है? दरअसल, छात्रसंघ चुनाव की आड़ में राजनीतिक पार्टियां सियासी रोटियां सेंकने का काम करती आ रही है। कांग्रेस – एनएसयूआई, सीपीआई – एआईएसएफ, सीपीआईएम – एसएफआई और डीएसयू और आम आदमी पार्टी – सीवाईएसएस को जहां घोषित रुप से चुनाव मैदान में उतरती है, वहीं भाजपा अघोषित रूप से एबीवीपी का समर्थन करती है। तमाम छात्र संगठन इन राजनैतिक दलों के लिए शिक्षण संस्थानों में यूथ वोटबैंक की राजनीति करने का एकमात्र उचित माध्यम हैं। आज इस व्यवस्था की समीक्षा व विश्लेषण करने की आवश्यकता है।
क्या बिना छात्रसंघ चुनाव के भविष्य निर्माण की शिक्षा देने वाले विश्वविद्यालयों को राजनीतिक गतिविधियों से अछूता नहीं रखा जा सकता है? क्या आज विश्व के लोकप्रिय विश्वविद्यालयों में भारत का एक भी विश्वविद्यालय नजर आता है? शायद नहीं ! क्योंकि हमारे देश के छोटे से लेकर बडे विश्वविद्याालयों को राजनीति के अखाडे बना दिये गये। जहां विचारों से ज्यादा विवाद पनपते है और देशभक्त की जगह देशद्रोही निकलने लग गये है। यहां यह भी ध्यान देने योग्य बिन्दु है कि कई शैक्षणिक संस्थान ऐसे भी हैं जहां अच्छा कार्य हो रहा है। और खास बात यह है कि वहां कोई छात्रसंघ नहीं है। वर्षों से बगैर किसी आंदोलन और हिंसक घटनाओं के बावजूद इन शिक्षण संस्थाओं की रेटिंग अन्य की तुलना में गुणवत्तापरक शिक्षा के स्तर पर अधिक बेहतर है।
उल्लेखनीय है कि कुछ वर्ष पहले छात्रसंघ चुनावों में लिंगदोह कमेटी की सिफारिशें लागू की गई थी। पूर्ववर्ती चुनाव प्रक्रिया को बदलकर ठोस नीति बनाई गई। आचार संहिता का निर्माण भी किया गया। परंतु पालन सुनिश्चित न किया जा सका! इस नीति के बाद ही एक लंबे समय से छात्रसंघ चुनाव पर लगी रोक हटी थी। अतः यही वह समय है जब हमारे नीति-नियंताओं को तय कर लेना चाहिए कि वह शिक्षण संस्थाओं को आबाद करना चाहते हैं या बर्बाद? शिक्षण संस्थानों में होने वाले छात्रसंघ चुनावों की प्रासंगिकता पर भी अब मंथन होना आवश्यक है। उपर्युक्त आधार पर यह कहना कोई अतिश्योक्ति न होगी, कि वर्तमान हालात में यूथ वोटबैंक की राजनीति का केंद्र बनते जा रहे हैं विश्वविद्यालय। विश्वविद्यालय में विद्यार्थी कुछ सीखे या न सीखे परंतु राजनीतिक चालबाजियां जरुर सीख जाते हैँ। आज यह अवसर है सरकार के पास सोचने का, मंथन करने का, विचार करने का, मनन करने का विश्वविद्यालय और कुछ उच्च शैक्षणिक संस्थाओं में शिक्षा का स्तर सुधारने, गुणवत्ता कौशल युक्त शिक्षा प्रदान करने के लिए, राष्ट्र विरोधी आंदोलनकारियों के एवज में राष्ट्रभक्त नागरिक तैयार करने के लिए विशेष प्रयास किए जाए। विभिन्न संस्थानों में नियमित अध्ययन, उपस्थिति, शिक्षण-प्रशिक्षण की बेहतर सुविधाए उपलब्ध करवा कर, उन तमाम छात्र संगठनों पर रोक लगाएं एवं छात्रों के नाम पर विश्वविद्यालय में होने वाली राजनीति को बंद करने के लिए सख्ती से कदम उठाए जाने की आवश्यकता प्रतीत होती है।
लेखक जयनारायण व्यास विश्वविद्यालय जोधपुर में अघ्ययनरत है।

– देवेन्द्रराज सुथार

Print Friendly, PDF & Email
Skip to toolbar