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जनवरी में एक बार फिर अन्ना आंदोलन की तपिश महसूस करेगा देश

मैं भी अन्ना तू भी अन्ना, अब तो सारा देश है अन्ना। जी हां, छः साल पहले इस नारे की बदौलत दिल्ली के जंतर मंतर से भ्रष्टाचार के खिलाफ शंखनाद कर पूरे देश को अन्ना मय कर देने वाले गांधीवादी सामाजिक कार्यकर्ता अन्ना हजारे एक बार फिर दिल्ली की चौखट पर दस्तक देने जा रहे हैं। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक अन्ना हजारे अपने इस नये आंदोलन की शुरुआत अगले साल जनवरी में कर सकते हैं। शुरुआत राजधानी दिल्ली से होगी। इस दौरान वे एक बार फिर आजमाए हुए हथियार अनशन का इस्तेमाल करेंगे। उल्लेखनीय है कि अन्ना ने लोकपाल और लोकायुक्त की नियुक्ति की मांग करते हुए पहले जंतर मंतर और बाद में रामलीला मैदान में अनशन के जरिए पूरे देश की राजनीतिक चेतना को झकझोर कर यूपीए सरकार की ताबूत में आखिरी कील ठोंक देने का काम किया था।
हजारे के इस आंदोलन का सीधा लाभ भाजपा को मिला। लोकसभा चुनाव 2014 के दौरान यूपीए सरकार के भ्रष्टाचार से आजिज देश की जनता ने कच्छ से कामरूप तक व कश्मीर से कन्याकुमारी तक अब की बार मोदी सरकार पर जमकर मुहर लगाई। परिणाम, नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में लगभग तीन दशक बाद केंद्र में किसी एक पार्टी की बहुमत वाली सरकार बनी। यही नहीं, आजादी के बाद पहली बार केंद्र में पूर्ण बहुमत के साथ भाजपा को शासन करने का मौका मिला। खुद मोदी ने इस चुनाव में भ्रष्टाचार को ही मुख्य मुद्दा बनाया था।
इसके अलावा अन्ना आंदोलन की कोख से निकली अरविंद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी ने भी दिल्ली में ऐतिहासिक जीत दर्ज की। दिल्ली की 70 सीटों में से उसके खाते में 67 सीटें आई। लेकिन अफसोस, न तो अन्ना आंदोलन की पैदाइश आम आदमी पार्टी ने लोकपाल की दिशा में कोई काम किया और न ही विपक्षी पार्टी के रूप में लोकायुक्त व लोकपाल की नियुक्ति का पुरजोर समर्थन करने वाली भाजपा ने ही इस ओर कदम बढ़ाया। हद तो यह कि दिल्ली में सरकार बनाने के महीने भर के भीतर ही दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने पार्टी के आंतरिक लोकपाल का ही पत्ता साफ कर दिया था।
लोकपाल व लोकायुक्त के मुद्दे पर मिले सरकार के धोखे से मर्माहत गांधीवादी अन्ना हजारे एक बार फिर अनशन की राह पर चलने को मजबूर हैं। इस बाबत उन्होंने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को पत्र लिखकर दिल्ली में आंदोलन करने की जानकारी दी है। लोकपाल और लोकायुक्त की नियुक्ति पर अमल नहीं किये जाने का केंद्र सरकार पर आरोप लगाते हुए हजारे ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को लिखे पत्र में कहा है कि भ्रष्टाचार मुक्त भारत का सपना देखते हुए अगस्त 2011 में रामलीला मैदान और पूरे देश में ऐतिहासिक आंदोलन हुआ था। इस आंदोलन को देखते हुए संसद ने सदन की भावना के अनुरूप प्रस्ताव पारित किया था जिसमें केंद्र में लोकपाल और राज्यों में लोकायुक्त की नियुक्ति के साथ सिटिजन चार्टर जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों पर जल्द से जल्द कानून बनाने का निर्णय किया गया था। इस प्रस्ताव पर केंद्र सरकार के लिखित आश्वासन के बाद मैंने 28 अगस्त को अपना आंदोलन स्थगित कर दिया था। इस घटना के छह वर्ष गुजर जाने के बाद भी भ्रष्टाचार को रोकने वाले एक भी कानून पर अमल नहीं हो पाया है।
हद तो यह कि पिछले तीन वर्षों में लोकपाल और लोकायुक्त की नियुक्ति के संबंध में अगस्त 2014, जनवरी 2015, जनवरी 2016, जनवरी 2017 और मार्च 2017 को अन्ना ने लगातार पत्राचार किया लेकिन सरकार की तरफ से कार्रवाई के तौर पर कोई जवाब नहीं आया। जबकि लोकपाल और लोकायुक्त कानून बनते समय संसद के दोनों सदनों में विपक्ष की भूमिका में रहे भाजपा नेताओं ने इस कानून को पूरा समर्थन दिया था। देश की जनता ने इसके बाद 2014 में बड़ी उम्मीद के साथ नई सरकार को चुना। खुद प्रधानमंत्री मोदी ने देश की जनता को भ्रष्टाचार मुक्त भारत का आश्वासन दिया था। सच है कि मोदी सरकार पर अब तक भ्रष्टाचार का कोई बड़ा आरोप अब तक नहीं लगा है लेकिन एक बड़ा सच यह भी है कि आज भी जनता का काम पैसे दिये बिना नहीं होता। टीम अन्ना का दावा है कि लोकपाल और लोकायुक्त कानून पर अमल होने से 50 से 60 प्रतिशत भ्रष्टाचार पर रोक लग सकती है लेकिन इस पर अमल की दिशा में कोई काम ही नहीं हो रहा है।
आश्चर्य की बात है कि जिन राज्यों में विपक्ष की सरकार है, वहां तो लोकपाल नहीं ही है, जहां भाजपा की सरकार है, वहां भी लोकपाल और लोकायुक्त कानून पर अमल नहीं हुआ है। हजारे ने प्रधानमंत्री को लिखे पत्र में कहा है कि भारत कृषि प्रधान देश है और देश में प्रतिदिन किसान आत्महत्या कर रहे हैं। किसानों को लागत के मुताबिक कृषि उपज का दाम मिले इस बारे में भी मैंने आपको पत्र लिखा। लेकिन इस बारे में कोई जवाब नहीं आया और स्वामिनाथन आयोग की रिपोर्ट पर कोई कार्रवाई नहीं हुई।
बहरहाल, देखना है कि अन्ना की आंदोलन की चेतावनी पर सरकार क्या रुख अपनाती है। सवाल यह भी है कि क्या अन्ना 2011 का तूफान एक बार फिर खड़ा कर पाने में कामयाब होंगे। ऐसा इसलिए क्योंकि जिस टीम की बदौलत यह आंदोलन देश के कोने कोने तक पहुंच गया था वह टीम उनसे दूर सत्ता का सुख भोग रही है। आंदोलन के दौरान किये गये सारे वादे वह टीम कब का भूल चुकी है। ऐसे में देखना दिलचस्प होगा कि अन्ना इस बार भी अपने आंदोलन की तपिश पूरे देश में महसूस करा पाते हैं या नहीं।

बद्रीनाथ वर्मा

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