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जनसंख्या नियंत्रण कानून पर गरमाई सियासत

देश में जनसँख्या नियंत्रण को लेकर नेताओं की बयानबाजी से सियासत गरमा उठी है। केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह ने तो यहाँ तक कह दिया की इस पर कानून बनने के बाद वे राजनीति से सन्यास ले लेंगे। सत्तारूढ़ भाजपा के अनेक नेता और सांसदों सहित राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ भी जनसँख्या नियंत्रण कानून के पक्ष में है। इन लोगों का कहना है कि देश की बढ़ती जनसंख्या पर नियंत्रण लगाने के लिए भारत सरकार को जल्द ही सख्त कानून बनाना चाहिए। समय रहते जनसंख्या विस्फोट को रोका नहीं गया तो आने वाली पीढियां खाद्यान्न, जल, शिक्षा, चिकित्सा सहित कई प्राथमिक संसाधनों और रोजगार के लिए तरसेगी। जनसँख्या नियंत्रण कानून के कुछ पक्षधरों का यह भी कहना है भारत भी चीन की तरह एक बच्चा नीति को कानून के रूप में लागू करें तभी देश को बचाया जा सकता है।
आज विश्व की जनसंख्या सात अरब 63 करोड़ से ज्यादा है। अकेले भारत की जनसंख्या लगभग 1 अरब 36 करोड़ के आसपास है। भारत विश्व का दूसरा सबसे अधिक जनसंख्या वाला देश है। आजादी के समय भारत की जनसंख्या 33 करोड़ थी जो आज चार गुना तक बढ़ गयी है। परिवार नियोजन के कमजोर तरीकों, अशिक्षा, स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता के अभाव, अंधविश्वास और विकासात्मक असंतुलन के चलते आबादी तेजी से बढ़ी है। संभावना है कि 2050 तक देश की जनसंख्या 1.6 अरब हो जायेगी। फिलहाल भारत की जनसंख्या विश्व जनसंख्या का 17.5 फीसद है. भूभाग के लिहाज के हमारे पास 2.5 फीसद जमीन है। 4 फीसद जल संसाधन है जबकि विश्व में बीमारियों का जितना बोझ है, उसका 20 फीसद अकेले भारत पर है।
हमारी आबादी में अभी भी हर दिन पचास हजार की वृद्धि हो रही है। इतनी बड़ी जनसंख्या को भोजन मुहैया कराने के लिए यह आवश्यक है कि हमारा खाद्यान्न उत्पादन प्रतिवर्ष 54 लाख टन से बढे जबकि वह औसतन केवल 40 लाख टन प्रतिवर्ष की दर से ही बढ़ पाता है। जनसंख्या वृद्धि के दो मूल कारण अशिक्षा एवं गरीबी है। लगातार बढ़ती आबादी के चलते बड़े पैमाने पर बेरोजगारी तो पैदा हो ही रही है, कई तरह की अन्य आर्थिक और सामाजिक समस्याएं भी पैदा हो रही हैं। भारत के सामने अनेक समस्याएँ चुनौती बनकर खड़ी हैं। जनसंख्या-विस्फोट उनमें से सर्वाधिक है। एक अरब भारतियों के पास धरती, खनिज, साधन आज भी वही हैं जो 50 साल पहले थे परिणामस्वरूप लोगों के पास जमीन कम, आय कम और समस्याएँ अधिक बढ़ती जा रही हैं भारत के पास विश्व की समस्त भूमि का केवल 2.4 प्रतिशत भाग ही है जबकि विश्व की 16.7 प्रतिशत जनसंख्या भारत में निवास करती है। जनसंख्या में वृद्धि होने के साथ-साथ प्राकृतिक संसाधनों पर और भार बढ़ जाएगा। जनसंख्या दबाव के कारण कृषि के लिए व्यक्ति को भूमि कम उपलब्ध होगी जिससे खाद्यान्न, पेय जल की उपलब्धता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा, इसके अलावा लाखों लोग स्वास्थ्य और शिक्षा के लाभों एवं समाज के उत्पादक सदस्य होने के अवसर से वंचित हो जाएंगे। आधे बिलियन से अधिक भारतीय 25 वर्ष से कम आयु के हैं।
जनसंख्या वृद्धि एक नयी चुनौती बनकर हमारे सामने आई हैं और आज भी इस पर काबू पाने में सरकार को कठिनाई हो रही है। जनसंख्या वृद्धि के दुष्परिणाम देश को भोगने पड़ रहे हैं। बढ़ती जनसंख्या की दुश्वारियां सिर चढ़कर बोलने लगी है। भूखों की संख्यां निरंतर बढ़ रही है। विकास कार्य सिकुड़ रहे है। रोटी, कपडा और मकान की बुनियादी सुविधाओं की बात करना बेमानी हो गया है। विकास का स्थान विनाश ने ले लिया है। अधिक जनसंख्या के कारण बेरोजगारी की विकराल समस्या उत्पन्न हो गयी है। लोगों के आवास के लिए कृषि योग्य भूमि और जंगलों को उजाड़ा जा रहा है । इससे बचने का एक मात्र उपाय यही है की हम येन केन प्रकारेण बढ़ती आबादी को रोके। अन्यथा विकास का स्थान विनाश को लेते अधिक देर नहीं लगेगी।

बाल मुकुन्द ओझा
वरिष्ठ लेखक एवं पत्रकार
क्.32, माॅडल टाउन, मालवीय नगर, जयपुर
मो.- 9414441218

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