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जम्मू-कश्मीर के राज्यपाल जिला प्रशासन को कानूनी मर्यादाओं के अनुसार सम्मानपूर्वक जनसम्पर्क करने का निर्देश दें

जम्मू कश्मीर। नेशनल पैंथर्स पार्टी के मुख्य संरक्षक प्रो.भीमसिंह ने जम्मू-कश्मीर के राज्यपाल श्री एन.एन. वोहरा को लिखे पत्र में उनसे आग्रह किया कि वे पूरे राज्य में जिला प्रशासन को कानूनी मर्यादाओं के अनुसार सम्मानपूर्वक जनसम्पर्क करने का निर्देश दें और जिला अधिकारियों को पिछली सरकारों के तानाशाही रवैये से मुक्त रहने की आवश्यकता है। प्रो.भीमसिंह ने अपने एक तत्काल पत्र में जम्मू-कश्मीर के राज्यपाल श्री एन.एन. वोहरा को लिखा कि–
‘‘मुझे लगता है कि स्थानीय मीडिया में वरिष्ठ पैंथर्स पार्टी के नेताओं के साथ उधमपुर जिला प्रशासन के टकराव के बारे में जो भी मनगढंत कहानी छापी गयी है, उसके बारे में राज्यपाल का ध्यान आकर्षित करना चाहता हूं।
मैं ऊधमपुर जिले से संबंधित हूं और मैंने लगभग 15 वर्षों तक यहां के लोगों का एक विधायक के रूप में प्रतिनिधित्व किया है। 1980 में एक समय था जब मुझे तत्कालीन मुख्यमंत्री शेख मोहम्मद अब्दुल्ला की आधिकारिक बैठक से बाहर निकाल दिया गया था। उस समय भी शेख मोहम्मद अब्दुल्ला एक मजबूत मुख्यमंत्री बावजूद भी उन्होंने जिला प्रशासन को मेरे खिलाफ बल प्रयोग करने की इजाजत नहीं दी। जिला आयुक्त के व्यवहार के साथ-साथ जिला, उधमपुर में वरिष्ठ पुलिस प्रमुख के व्यवहार पर सदमे को व्यक्त करने के लिए मैं इस पत्र को आपको लिख रहा हूं। यह आश्चर्य की बात है कि जिला वरिष्ठ अधिकारी जम्मू-कश्मीर नेशनल पैंथर्स पार्टी के वरिष्ठ नेतृत्व से निपटने के दौरान भाषा और उनके तानाशाही आदेश का उपयोग करने के लिए आगे बढ़े। मैं इस नोट से परे टिप्पणी करना पसंद नहीं करता हूं कि आपकी महामहिम ने राज्य स्तर से नई दिल्ली में केंद्रीय सचिवालय से कई बार इस तरह के अवसरों का सामना किया होगा, परंतु कभी भी प्रशासन में रहने वाले अधिकारियों ने एफआईआर दर्ज नहीं की ना ही प्रेस में हमारे खिलाफ समाचार छपावाए।
मैं इस नोट को महामहिम को भेज रहा हूं ताकि वे सभी तथ्यों को स्वतंत्र रूप से जांच करके यह फैसला करें कि ठीक कौन था और गलत कौन। इसमें कोई संदेह नहीं कि ऊधमपुर के उपायुक्त और एसएसपी दोनों युवास्था में हैं और उन्हें जनसम्पर्क करने के लिए बहुत इंतजार करना है। नए आईएएस और आईपीएस अफसरों को केवल लाठी चलानी, धमकी देनी या एफआईआर लगाने से जनसम्पर्क समझना आसान नहीं है। मैं इसके बारे में ज्यादा नहीं कहना चाहता सिर्फ यह कि यदि पैंथर्स पार्टी के वरिष्ठ नेताओं से वरिष्ठ अधिकारियों ने सम्मानपूर्वक बात की होती तो कोई भी शिकायत का मौका नहीं मिलता।
1982 से पैंथर्स पार्टी कार्यकर्ताओं ने दर्जनों बार अपने न्याय-अधिकार का मामला उच्च न्यायालय से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचाया है और ऐसे निर्णय बड़ी अदालतों से पैंथर्स पार्टी ने लाए, जिससे प्रशासन की आंखें खुल जाती थी। पैंथर्स पार्टी के न्याय-अधिकार का युद्ध सड़कों से सुप्रीम कोर्ट तक 50 वर्षों से चल रहा है और चलता रहेगा। सरकार के बड़े अधिकारियों ने भी जमकर अदालतों में अपना पक्ष रखा परंतु कभी पैंथर्स पार्टी के कार्यकर्ताओं या नेताओं ने प्रशासन के किसी भी छोटे से बड़े अधिकारी से व्यक्तिगत विवाद नहीं उठाया। मैं हैरान हूं कि मेरे जिले में जिला उपायुक्त के दफ्तर में पैंथर्स पार्टी के जानेमाने नेता जो लोकप्रिय शिक्षा मंत्री भी रहे और वकील भी हैं, उनके जाने पर इतना विवाद क्यों? इस बात की जानकारी राज्यपाल को अवश्य जंाच करनी होगी कि क्या कहीं प्रशासन में किसी का राजनीतिक एजेंडा तो नहीं था, क्योंकि पैंथर्स पार्टी मान्यताप्राप्त राजनीतिक दल है और लोगों में सबसे ज्यादा लोकप्रिय है।
मैं राज्यपाल जी के सुझाव देना चाहूंगा कि जम्मू-कश्मीर में जितने भी जिला प्रशासन पिछली सरकार में नियुक्त किये गये थे उनको किसी अन्य जिले में स्थानांतरित करना इसलिए भी जरूरी है कि क्या कहीं पिछली सरकार का छाया का प्रभाव किसी जिले में तो अभी तक नहीं चल रहा है। क्या जिला प्रशासन अभी तक सरकारी पार्टी के विधायकों के छाये में तो नहीं चल रहा है। इन सारे प्रश्नों का उत्तर सभी जिला अधिकारियों को अंतर हस्तातरण करना आवश्यक है तथा उपायुक्त और एसएसपी को दूसरे जिले में भेजना आवश्यक होगा।
प्रो.भीमसिंह ने अपने पत्र में राज्यपाल जी को इस बात का अफसोस जाहिर किया है कि जम्मू-कश्मीर ही भारत का एक प्रांत है, जिसमें मानवाधिकार का अध्याय मौजूद ही नहीं है, क्योंकि जम्मू-कश्मीर संविधान भारत के संविधान से अलग है और भारत के संविधान में दिये गये मानवाधिकार के अध्याय में भारत सरकार ने 1954 में अनुच्छेद 35(ए) जोड़ दिया था, जिसके अनुसार जम्मू-कश्मीर की सरकार पूरे मानवाधिकार पर प्रतिबंध लगा सकती है। इसीलिए जम्मू-कश्मीर में भारत के संविधान में दिये गये मानवाधिकार मौजूद नहीं है, क्योंकि जम्मू-कश्मीर का संविधान 1957 से अलग है और यही कारण है कि बाहर के आये हुए वरिष्ठ अधिकारी चाहे वे आईएएस या आईपीएस हों, वे जम्मू-कश्मीर के लोगों को मानवाधिकार की छाया तक देने को तैयार नहीं हैं।
पैंथर्स पार्टी इसी मानवाधिकार के लिए सड़कों से सुप्रीम कोर्ट तक पांच दशकों से लड़ती आयी है और तब तक लड़ती रहेगी जब तक भारत के संविधान में दिये हुए मानवाधिकार का अध्याय जम्मू-कश्मीर में लागू न हो। उन्होंने राज्यपाल से कहा कि एक ऊधमपुर में पैंथर्स नेताओं के खिलाफ एफआईआर लगाने से सरकार को कोई राहत नहीं मिल सकती। वरिष्ठ अधिकारियों को अपनी सोच में परिवर्तन लाना पड़ेगा। ऊधमपुर में लगायी एफआईआर के मुकाबले में पैंथर्स कार्यकर्ताओं बड़ी-बड़ी एफआईआर का मुकाबला किया है और उन्हें सुप्रीम कोर्ट के आदेश से खारिज करवाया।

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