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जरा सोचो किसान को मार डालोगे, तो रोटी कहाँ से लाओगे

लोग कहते हैं बेटी को मार डालोगे,तो बहू कहाँ से पाओगे? जरा सोचो किसान को मार डालोगे, तो रोटी कहाँ से लाओगे? फ़िर भी किसान मर रहें हैं, तो आज देश के सामने एक बड़ी समस्या उत्पन्न हुई है, ब्लू व्हेल नामक ऑनलाइन गेम की। जिसमें मौत ही आखिरी चारा होती है। तो क्यों न हम कृषि को भी उसी फेहरिस्त में जोड़ ले, क्योंकि आज किसान का अंत भी तो मौत के रूप में होती है। बड़े-बड़े वादे, फ़िर भी किसान सड़कों पर, फ़िर क्या समझे आज की समांतर राजनीति व्यवस्था को। वह किसानों के लिए खलनायक के रूप में उभर कर सामने आ रही है। किसान कहाँ नहीं सड़कों पर हैं। जो अन्नदाता दूसरों का पेट भरता है। आज ही नहीं वर्षों से सड़कों पर है। फ़िर बात चाहें वह कश्मीर से शुरू और कन्याकुमारी तक की जाए। तमिलनाडु से लेकर महाराष्ट्र की। पंजाब से लेकर मध्यप्रदेश की। कहाँ नहीं किसान तंग और फटेहाल में है। उसके बाद उस पर राजनीति सेकने वाले नेताओं का हुजूम भी पनपा, लेकिन वास्तविकता के धरातल पर हुआ किया। वहीं ढाक के तीन पात। कर्ज़ माफ़ी का लॉलीपॉप, उचित मूल्य दिलाने का ढाढस बांधने के अलावा किया किया, भारतीय राजनीति ने। जब मौका मिला, किसानों का नाम लेकर सत्ता हथियाने का काम किया। देश में इससे बढ़कर कभी किसानों का प्रयोग हुआ? नहीं उनकी दुश्वारियों और समस्याओं को तो राजनीति करने का जरिया बना लिया गया। तमिलनाडु, महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश और राजस्थान तो अभी उभरकर सामने आए हैं, जिसने विपक्ष को अपनी राजनीतिक बिसात बिछाने का मौका दे दिया है। वास्तव में आज तक किसानों के लिए भारतीय राजनीतिक परिपाटी ने कर्जमाफी के अलावा कोई दूसरी दवा ढूढ़ ही नहीं सकी।

एक बार आकर देख कैसा, ह्रदय विदारक मंजर हैं,
पसलियों से लग गयी हैं आंते, खेत अभी भी बंजर हैं। फ़िर यह पंक्ति आज के दौर में सटीक बैठती है। सरकारी आंकड़े के मुताबिक हर वर्ष 12 हजार किसान अपनी जिंदगी खत्म कर रहे हैं। जिसका मुख्य कारण कर्ज में डूबे किसान और खेती में हो रहा घाटा है । एक अन्य सरकारी आंकड़े के अनुसार 2015 में कृषि क्षेत्र से जुड़े कुल 12,602 लोगों ने आत्महत्या की। जिसमें लगभग आठ हजार उत्पादक किसान थे, जबकि 4,595 लोग कृषि संबंधी श्रमिक के तौर पर काम कर रहे थे। 2015 में सबसे ज्यादा 4,291 किसानों ने महाराष्ट्र में आत्महत्या की। उसके बाद कर्नाटक में 1,569 किसानों ने आत्महत्या की। इसी कड़ी में 2014 में आत्महत्या करने वाले किसानों की संख्या 12,360 थी, और 2013 में 11,772 किसानों ने आत्महत्या को गले लगाना उचित समझा।

आज के दौर में किसानों की स्थिति को देखकर ये चंद पंक्ति याद आती है। ये सिलसिला क्या यूँ ही चलता रहेगा, सियासत अपनी चालों से कब तक किसान को छलता रहेगा। पिछले एक दशक के दौरान किसानों की आत्महत्या के हजारों मामले प्रकाश में आते रहें हैं, लेकिन राजनीति तो न्यू इंडिया को परवान देने में जुटी हुई है। देश का दुर्भाग्य देखिए, कि जितने का देश में कुल बजट शिक्षा और स्वास्थ्य का नहीं है, उससे अधिक के बजट में न्यू इंडिया बुलेट ट्रैन पर बैठने को तत्पर है। किसानों पर सबसे अधिक मार बेमौसम बारिश और सूखे से पड़ती है और कई बार दाम गिरने से भी इनकी कमाई पर असर पड़ता है। इसके अलावा तमाम कारण है, जो किसान को मौत तक पहुँचने के लिए विवश करते हैं, लेकिन हमारी राजनीतिक परिपाटी मात्र कर्जमाफी करके अपने कर्तव्यों से इतिश्री कर लेती है। किसानों की बदहाली की एक तस्वीर पिछले दिनों दिल्ली में दिखी, तो एक मध्यप्रदेश और अब राजस्थान में किसानों ने सड़क को घेरकर विरोध किया, लेकिन अंत क्या हुआ। किसी के थाली में कर्जमाफी के रूप में मामूली दवा , तो किसी की थाली में कुछ भी नही।

राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो के इस वर्ष के ताजा आंकड़ों के मुताबिक, किसान आत्महत्याओं में 42% की बढ़ोतरी हुई है । इन आंकड़ों में सबसे ज्यादा मामले महाराष्ट्र में देखने को मिले हैं। 30 दिसंबर 2016 को जारी एनसीआरबी के रिपोर्ट ‘एक्सिडेंटल डेथ्स एंड सुसाइड इन इंडिया 2015’ के मुताबिक साल 2015 में 12,602 किसानों और खेती से जुड़े मजदूरों ने आत्महत्या की है। एनसीआरबी की रिपोर्ट के अनुसार किसानों की आत्महत्या के मुख्य कारण कर्ज, कंगाली, और खेती से जुड़ी दिक्कतें हैं। फ़िर सरकारे मात्र कर्जमाफी का शगुफ़ा छोड़कर अपने कर्तव्यों को तिलांजलि क्यों दे देती हैं।

आर्थिक विशेषज्ञों की माने , तो कर्ज माफी तो दर्द निवारक दवा की तरह है जिसका फ़ौरी लाभ तो होता है, लेकिन दूरगामी असर बेअसर हो जाता है। फ़िर राजनीति किसानों की दशा सुधारने की कोई दूसरी तरक़ीब क्यों नहीं ढूंढ रही। मनमोहन सरकार ने भी देश भर के किसानों का 71,000 करोड का कर्ज माफ़ किया था, और रवायत जारी है। फ़िर भी किसान सबल नहीं हो रहा, फ़िर मात्र कर्ज़ माफी पर ही जोर क्यों? आज के दौर में नैतिक रूप से देखें तो कर्जमाफी की नीति वोटरों को रिझाने और दारू बांट कर वोट लेने से कम नहीं, क्योंकि ख़ास अंतर जब आता नहीं, किसानों की दशा में फ़िर कोई दूसरा रास्ता डिजिटल युग में सरकारें किसानों के लिए क्यों नहीं ढूंढ पा रही हैं? आज के दौर में कृषि को पशुपालन से क्यों नहीं जोड़ा जा रहा है? ऐसी फ़सलों के उत्पादन को बढ़ावा क्यों नहीं दिया जा रहा, जो किसानों के लिए लाभ का सौदा हो सकती हैं?

किसानों को सस्ती खाद और उर्वरकों को उपलब्ध कराने पर जोर क्यों नहीं? अगर देश की सरकारें गौहत्या को लेकर कड़ा रुख़ अख्तियार कर रहीं हैं, फ़िर पशुपालन और कृषि के बीच समन्वय की नीति पर जोर देना चाहिए। जिससे गौहत्या भी कम होगी, और किसान हत्या भी। आज गाय जब दूध देने लायक नहीं बचती, तो वह किसी अर्थ की समझ में नहीं आती। फ़िर क्यों न ऐसी जागरूकता फैलाई जाए, कि गाय के गोबर की भी क़ीमत निर्धारित करके ग्रामीण स्तर पर ख़रीददारी की जाए। जिससे गाय पशु मालिकों पर बोझ भी नहीं होगी, और वह दूध न देने की स्थिति में भी किसानों को दोहरा लाभ दे सकती है। एक तो उसे गोबर की कीमत भी मिल जाएगी, साथ में उसे सस्ती दर पर जैविक खाद भी उपलब्ध होगी। सरकार को इसके साथ लोगो को जैविक खेती के साथ उन्नत कृषि यंत्रों को उपलब्ध कराने की व्यवस्था करनी चाहिए। साथ ही साथ फल- सब्जियों की खेती के प्रति भी जागरूक करना होगा, तभी खेती को लाभ का सौदा बनाया जा सकता है। ऐसे में अगर किसान पर मात्र राजनीति ही होती रहेंगी, तो ये पंक्तियां याद आती है–भगवान का सौदा करता हैं, इंसान की क़ीमत क्या जाने? जो धान की क़ीमत दे न सका, वो जान की क़ीमत क्या जाने?

महेश तिवारी
सामाजिक और राजनीतिक विषयो पर लेखन
स्वतंत्र टिप्पणीकार
9457560896

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