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जातिगत नहीं, आर्थिक आधार पर आरक्षण, समय की मांग

कर्जमाफी के नाम पर हुआ बहुत अब तलक का खेल
किसान दर- दर भटक रहा, मौज कर रही सरकार

कब तलक ये तमाशा चलेगा, नहीं पता है शायद किसी को, लेकिन लगभग जनता जिस दिन समझ ले। अपने मत का अधिकार, बहुत बहुत से खेल उसी दिन बन्द हो सकते हैं, क्योंकि जनता के मत में है वह शक्ति, जो चूरचूर कर सकती सत्ता के मद को। आज देखिए सत्ता के मतवालों का खेल अजीब, किसान फांसी पर चढ़ रहा, राजनीति के रखवालों को अपनी सेज की फिक्र रही। ऐसे लोकतंत्र का क्या अर्थ हुआ, जिस तंत्र में राजनीति के लिए जनता गई हो मर । आज के दौर की राजनीति और समानांतर व्यवस्था में उपर्युक्त पंक्तियां कहीं से भी अतिश्योक्ति नहीं लगती। देश की आबादी का लगभग साठ फ़ीसद हिस्सा 35 वर्ष से कम उम्र का है। जिस पर देश की राजनीति को भी गुमान है। जिसको विकास की धारा से जोड़ना जरूरी है। रोजगार, सुविधाओं का ज़खीरा तैयार करना आवश्यक है। उस दौर में भी अगर राजनीति अपने वोटबैंक के लिए राजनीतिक कलाबाजियों का प्रदर्शन करती है। तो यह देश के साथ किसी छल और कपट से कम नहीं। लेकिन दुर्भाग्य तो यहीं है, देश की राजनीति ने आज़ादी के बाद से अपंगता का जो बीज देश में बोया।

आज वह पुष्पित और पल्लवित होकर फल देने लगा है, क्योंकि आज के वैश्विक दौर में देश के भीतर कुछ समुदायों और राज्यों में खुद को पिछड़ा साबित करने की होड़ लगी है। पिछड़ापन साबित करने की नई- नई अवधारणा और मतों का विकास हो रहा है। क्या पिछड़ापन साबित करके देश और समाज उन्नति कर सकता है। अगर ऐसा ही पिछड़ापन साबित करने की होड़ समाज में लगी रही, तो राजनीतिक दुकानदारों की दुकान और चल निकलेगी, क्योंकि उनका तो एक ही उद्देश्य है, जनता को अकर्मण्यता का शिकार बनाओ , और राज करो। आज के दौर में कई राज्यों में विभिन्न समुदाय अपने को पिछड़ा घोषित करने के लिए आंदोलन कर रहे हैं। जिसमें गुजरात में पाटीदार, राजस्थान में गुर्जर और महाराष्ट्र में मराठा समुदाय के आंदोलन इसके ज्वलंत उदाहरण हैं। तो ऐसी परिस्थितियों में बहुतेरे सवाल जन्म लेते हैं। क्या पिछड़ेपन का तमगा लग जाने से इन आंदोलित समाज की सामाजिक और आर्थिक स्थिति सुदृढ़ हो जाएगी? अगर पिछड़ापन ही उन्नति की पहली सीढ़ी होती, तो आज उत्तरप्रदेश, बिहार और ओडिशा जैसे राज्य क्यों नहीं मुम्बई जैसे राज्यों के बराबर आ जाते? और हां अगर आरक्षण और राजनीतिक लाभ के लिए पिछड़ापन का सहारा चाहिए, तो इनको यह भी तो देखना चाहिए, इन राजनीतिक हथकण्डों का फ़ायदा देश की सामाजिक संरचना को अभी तक हुआ क्या?

दस वर्ष तक के लिए लागू किया गया, आरक्षण, आज राजनीति करने का साधन बनने के अलावा कुछ मालूम नही होता। आरक्षण ने अगर समाज को जोड़ने का काम नहीं किया, तो समाज को तोड़ने का काम जरूर किया। फ़िर पिछड़ापन साबित करने की होड़ क्यों? 49 फ़ीसद आरक्षण की बात संवैधानिक दायरे में होती है, तो उसकी मियाद तो पूरी हो चुकी है, तो उसको कहाँ तक ले जाएंगे? आज आरक्षण समाज को हीनभावना की तरफ़ ले जा रहा है। आज के वक़्त में जिस रवायत पर देश बढ़ रहा है, क्या हमारे महापुरुषों ने इसी की कल्पना की थी। हर चीज़ की एक सीमा होती है। उसका उल्लंघन विनाश की तरफ़ कदम बढ़ाना होता है। इसलिए अब पिछड़ेपन की रवायत को छोड़ना होगा। आज जब वैश्विक व्यवस्था अपने ज्ञान और विवेक के बलबूते पर विश्वपटल पर विजय पताका लहरा रही है, उस दौर में अगर हमारे देश के नागरिक और राज्य की सरकारें पिछडेपन का तमग़ा लगाकर उन्नति की सीढ़ी चढ़ना चाहती हैं, तो वह सम्भव नहीं है। देश के लोगों को विकास और समृद्धि प्राप्त करने की तरफ़ अग्रसर होना चाहिए, लेकिन हम तो खुद को पिछड़ा साबित करने में लगे हैं। जिसका कारण भी स्याह स्पष्ट है, इसकी शुरुआत भी तो राजनीति ने किया, तभी अपंगता का शिकार हमारा समाज हो रहा है। अगर सरकारें अपने राजनीतिक स्वार्थों के लिए अभी तक पिछड़ेपन की मांग मानती आ रही थी, और अगर अब ऐसी रवायत को बंद करने की आवाज़ महसूस राजनीति ने नहीं किया। तो देश की स्थिति विकट होने वाली है।

जाति और सम्प्रदाय के अलावा बिहार और आंध्र प्रदेश की सरकारें भी केंद्र से आग्रह कर रही हैं कि उनके राज्य को पिछड़े प्रदेश का दर्जा दिया जाए। तो इस दौर में सब भिखमंगे ही हो जाएंगे, तो फ़िर देश प्रगति कैसे करेगा। जब देश के प्रधानमंत्री समृद्ध भारत की बात करते हैं, फिर इस पिछड़ेपन की मानसिकता से हमें बाहर आना होगा, क्योंकि यह रवायत देश की छवि को चोट पहुँचाने का काम कर रही है। केंद्र सरकार अगर ऐसी मांगों को मानती हैं तो आने वाले समय में अन्य समुदाय भी खुद को पिछड़ा साबित करने के लिए यही रास्ता अख्तियार करेंगे। लिहाजा, हमारे राजनीतिक नीति नियंताओं को ऐसी नीतियां लागू करने की दिशा में अग्रसर होना चाहिए जिनसे समावेशी और समग्र विकास हो सके। समाज के अंतिम पायदान पर खड़े व्यक्ति तक भी विकास की पहुंच सुनिश्चित हो सके। तभी इस पिछड़ेपन की होड़ से बचा जा सकता है। रोजगार निर्माण, शिक्षा के क्षेत्र और नौकरी आदि में आरक्षण को खत्म करने या फ़िर तार्किकता के आधार पर सभी वर्ग के दबे- कुचले और सुयोग्य व्यक्तियों के लिए आरक्षण की सुविधा उपलब्ध हो, नहीं तो आरक्षण रूपी आग एक दिन देश को जला देगा।

महेश तिवारी
स्वतंत्र टिप्पणीकार
सामाजिक और राजनीतिक विषयों पर लेखन
9457560896

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